रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ रामायणमीमांसा प्रथम उसे मैं सब भूतों से सर्वथा अभय प्रदान करता हूँ, यह मेरा व्रत है। सुग्रीव ! तुम विभीषण को लाओ, मैंने उसे अभय-प्रदान कर दिया है। विभीषण ही क्या रावण भी यदि शरण में आये तो उसे भी मेरी ओर से अभय प्राप्त हो सकता है (वा० रा० ६।१८।२, २२, २३, ३३, ३४) । रावण का गुप्तचर कहता है—मैं आगम-योग से भली भाँति जानता हूँ कि श्रीराम हरि (विष्णु) हैं। उनके बल, रूप तथा प्रभाव का वर्णन करना मेरी शक्ति के बाहर है। जिनसे कभी भी धर्म चलित नहीं होता और जो धर्म का कभी भी अतिक्रमण नहीं करते, जो वेदविदों में श्रेष्ठ हैं, वेदों और ब्राह्मणों को जानते हैं वे अपने बाणों से आकाश को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं, पर्वतों को विदीर्ण कर सकते हैं (वा०रा० ६।२८।१६, १९, २०) । उन राम के सदृश पराक्रम में पृथ्वी में कोई भी नहीं है। भूतल में कोई भी श्रीराम के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता (वा० रा० ६।३०।२९, ३०) । मानव-देह में विष्णु ही अवतीर्ण हैं। विपुल विक्रमशाली राम मानवमात्र नहीं हैं (वा० रा० ६।३५।३६) । तदनन्तर गरुड़ भगवान् राम और लक्ष्मण को देखकर प्रसन्न हुए ओर बोले—काकुत्स्थ ! मैं गरुत्मान् हूँ । मैं आपका बहिश्चर प्राण के तुल्य प्रिय सखा हूँ। आपकी सहायता के लिए आया हूँ (वा० रा० ६।५०।४६) । श्रीलक्ष्मण ने रावण की शक्ति लगने पर विष्णु के अचिन्त्य अर्ध-भाग के रूप में अपना स्मरण करते हुए शक्ति को सहन किया। रावण अपनी बाहुओं से पूरा बल लगाने पर भी उन्हें उठा नहीं सका, परन्तु श्रीहनुमान् की भक्ति एवं सौहार्द से शत्रुओं के लिए अप्रकम्प्य होने पर भी वे परम लघु हो गये (वा० रा० ६।५९।११०, १११, ११७) । मन्दोदरी ने रावण के मरने पर विलाप करते हुए कहा था—जब वानरों ने महासमुद्र में सेतु बाँध लिया तभी मैंने समझ लिया था कि राम मनुष्य नहीं हैं। ये निस्सन्देह महायोगी, योगेश्वर, सनातन परमात्मा ही हैं। इनका आदि और अन्त नहीं है। ये अज्ञानरूपी तम से परे साक्षात् परमेश्वर हैं। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले विष्णु हैं। इनके वक्षःस्थल में श्रीवत्स है। ये नित्यश्री, अजेय एवं शाश्वत ध्रुव हैं। सत्य-पराक्रम विष्णु ही मानव-वपु धारण कर वानर-भाव को प्राप्त देवताओं से परिवृत होकर श्रीराम के रूप में प्रकट हुए हैं। विजन वन में स्थित वसुधा को वसुधा एवं श्री की भी श्री निरवद्याङ्गी सर्व कल्याणकारिणी सीता को छल से, लङ्का में लाकर आपने अनर्थ किया है। (वा० रा० ६।११४।१४-२२) । तदनन्तर राजा कुबेर, अमित्रकर्षण यम, सहस्राक्ष महेन्द्र, परन्तप वरुण, तीन नेत्रवाले श्रीमान् वृषभध्वज महादेव तथा सर्वलोक-निर्माता ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा ये सब लोग सूर्यतुल्य विमानों में बैठकर लङ्कापुरी में रघुकुल- तिलक राम के समीप आये और बोले—श्रीराम, आप सब लोकों के कर्त्ता विष्णु हैं, ज्ञानवानों में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता की उपेक्षा कैसे कर रहे हैं ? सब देवताओं में श्रेष्ठ आप अपने को क्यों नहीं समझ रहे हैं ? सत्य ही आपका स्वरूपभूत धाम है। वसुओं के आप पूर्व वसु हैं। आप प्रजापति हैं। तीनों लोकोंके आप आदिकर्त्ता एवं स्वयंप्रभु हैं। आप सबके प्रभु हैं, आपका प्रभु कोई नहीं है। अश्विनीकुमार आपके दोनों श्रोत्र हैं, चन्द्र और सूर्य दोनों आपके नेत्र हैं। हे परन्तप ! सब लोकों के आदि, अन्त एवं मध्य में सर्वद्रष्टा, सर्वाधाररूप से ज्ञानियों द्वारा आप ही परिलक्षित होते हैं। आप प्राकृत मनुष्य की भाँति सीता की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ? इसी प्रकार सब लोकपालों ने भी लोक-स्वामी श्रीराम से कहा एवं ब्रह्मा ने भी कहा—आप चक्रधारी नारायण देव हैं, विभु हैं। आप ही एकशृङ्ग (एक दंष्ट्रावाले) वराहरूप में प्रकट होते हैं। आप अतीत तथा अनागत सब शत्रुओं को जीतनेवाले हैं। आप अक्षर परब्रह्म हैं। सब लोकों के आदि, मध्य और अन्त में आप ही परम सत्यरूप से विद्यमान रहते हैं। सब लोकों के लिए आप ही परम धर्मस्वरूप हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन हैं। आप ही शार्ङ्गधन्वा हृषीकेश हैं। आप ही पुराण पुरुषोत्तम हैं—