भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय परब्रह्मरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य १३ 'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः' । ( भ० गी० १५।१८ ) अर्थात् क्षराक्षरातीत पुरुषोत्तम ही वेदान्त-वेद्य शुद्धपरब्रह्म-तत्त्व हैं । आप अजित हैं, खड्गधारी विष्णु हैं एवं बृहद्दल कृष्ण हैं । आप ही सेनानी, नेता, मन्त्री, बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, दम तथा सबके प्रभव एवं अप्यय हैं । आप ही उपेन्द्र वामन तथा मधुहन्ता मधुसूदन हैं । आप सर्वात्मा होने के कारण इन्द्रकर्मा महेन्द्र हैं । आप ही पद्मनाभ तथा रण में शत्रुओं का अन्त करनेवाले हैं । दिव्य महर्षि लोग आपको शरणार्ह शरण ( आश्रय ) कहते हैं । हजारों शाखावाले वेद एवं सैकड़ों जिह्वावाले शेष तथा अपरिगणित महर्षि भी आपको ही शरण्य कहते हैं । आप तीनों लोकों के आदिकर्त्ता और स्वयम्प्रभु हैं । सिद्धों, साध्यों आदि सबके परम-आश्रय और सबके पूर्वज आप ही हैं । आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार, ॐकार तथा परन्तप हैं । आप कौन हैं, आपका प्रभाव एवं अन्त कहाँ है, यह कोई नहीं जानता । ज्ञानियों को ज्ञान-दृष्टि से सब भूतों में विशेषतः ब्राह्मणों में, गायों में सभी दिशाओं में, गगन में, पर्वतों में वनों में, सर्वात्मरूप में तथा विशिष्ट विभूतियों के रूप में आपका दर्शन होता है । आप महाविराड्रूप से सहस्रों चरण, सहस्रों मस्तक एवं सहस्रों नेत्रवाले होकर शोभित होते हैं । आप सभी भूतों तथा पर्वतों वाली पृथ्वी को धारण करते हैं । प्रलय होने पर जल में महोरग—शेषरूप से आप दिखायी देते हैं । हे राम ! देव, दानव और गन्धर्वों सहित तीनों लोकों को आप धारण करते हैं । ब्रह्मा कहते हैं—राम ! मैं आपका हृदय ( बुद्धि ) हूँ । सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं, । सब देवता आपके गात्र में रोमों के रूप में मुझसे निर्मित हैं । आपके निमेष से रात्रि तथा उन्मेष से दिन होता है । आपके नित्य ज्ञान से अनुविद्ध शब्द ही वेद हैं । किंबहुना आपके बिना कहीं भी, कोई भी वस्तु नहीं है— “लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ।” ( वा० रा० २।३७।३२ ) लोकमें ऐसा कोई नहीं है जो आपका निष्ठावान् भक्त न हो । सारा संसार ही आपका शरीर है । आपका स्थैर्य ही वसुधा है । अग्नि आपका रोष है । आपका प्रसाद ही श्रीवत्सरूप सोम है । प्राचीन काल में आपने ही तीन डगों से तीनों लोकों को नापा था और महान् असुर बलि को बाँध कर महेन्द्र को राजा बनाया था । श्रीसीता साक्षात् लक्ष्मी हैं । आप विष्णु एवं प्रजापति कृष्ण हैं । रावण के वधार्थ आप मानुषी तनु में प्रविष्ट हुए हैं । धार्मिक- श्रेष्ठ ! हम लोगों का रावण-वधादि कार्य आपने सम्पन्न कर दिया है । अब आप अपने दिव्य धाम में आइये । आपका बल एवं वीर्य अमोघ है । आपका दर्शन तथा स्तुति भी अमोघ है । आपके प्रति भक्तिसम्पन्न मनुष्य भी अमोघ ( सफल कामनावाले ) होंगे । ( वा० रा० ६।११९।२-३१ ) । ये इन्द्र सहित तीनों लोक, सिद्ध, परमर्षि पुरुषोत्तम-स्वरूप आपका अभिवादन कर अर्चन कर रहे हैं । हे सौम्य, इस रामरूप परम तत्त्वको तुम जानो, जिसे भगवती श्रुति ने देवताओंका हृदय कहा है और देवताओं का परम गुह्य महोपनिषद् कहा है । सम्पूर्ण जगतों का कारण नित्य अव्यक्त जो ब्रह्म है वही परन्तप राम हैं ( वा० रा० ६।१२२।३०,३१ ) । श्रीराम ने कहा—सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न है जैसे भास्कर से प्रभा । जनक-पुत्री मैथिली तीनों लोकों में अत्यन्त विशुद्ध हैं । जैसे आत्मवान् प्राणी द्वारा कीर्ति का त्याग अशक्य है वैसे ही सीता का त्याग भी अशक्य है ( वा० रा० ६।१२०।१८,१९ ) । इस रामायण के पढ़ने और सुनने से श्रीराम सतत प्रसन्न होते हैं और वे राम सनातन विष्णु हैं । वे महाबाहु आदि देव हरि एवं प्रभु नारायण हैं ( वा० रा० ६।१३०।११७ ) ।