भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 832

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५५ अज्ञातज्ञापक होने से ही प्रमाण का प्रामाण्य होता है। चक्षु के बिना अन्य प्रमाणों से रूप का बोध नहीं होता। इसी लिए रूपज्ञान में नेत्र ही प्रमाण है। घ्राण के बिना गन्ध का बोध नहीं होता। इसी लिए गन्ध- ज्ञान में घ्राण का प्रामाण्य है । तुलसी के शब्दों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिससे वेदों का अनादर हो, वे तो स्वयं निरतवेदपथ लोगों का ही महत्त्व मानते हैं। भक्ति में ही निरतश्रुतिनीति का ही महत्त्व मानते हैं। वेद की निन्दा करने से बुद्ध अवतार धारण करनेवाला ईश्वर भी निन्दित होकर उपेक्षणीय हो जाता है— “जेहि निन्दत निन्दित भयो विदित बुद्ध अवतार।” वेदनिन्दकों की उन्होंने निम्नोक्त शब्दों में खबर ली है— “शब्दी साखी दोहरा कहि नाना उपखान कहहिं खल निन्दहिं वेद पुरान ।” आश्चर्य है—तुलसी मानस के आधार पर सुख-सुविधाओं को प्राप्त करनेवाले लोग ऐसी बातें कैसे करते हैं ! यह कहना सर्वथा असङ्गत ही है कि कोई भी प्रमाण प्रत्यक्ष का स्थान नहीं ले सकता । क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान तो केवल लौकिक वस्तुओं तक ही सीमित रहते हैं। वेदादि प्रमाण ही वस्तुतः प्रमाण हैं । अतएव प्रत्यक्ष तथा अनुमान का अतात्त्विक सां व्यावहारिक ही प्रामाण्य है । तात्त्विक प्रामाण्य तो वेदों का ही है। क्योंकि प्रत्यक्षादि के विषय घटादि व्यवहारकाल में ही अबाधित होते हैं। परमार्थतः ब्रह्मातिरिक्त सब वस्तुएँ बाधित होती हैं, वे अत्यन्त अबाध्य नहीं हैं। अत्यन्त अबाध्य तो केवल भगवान् ही हैं। अतएव तात्त्विक प्रामाण्य ब्रह्मबोधक वेद का ही है । अन्य प्रमाणों का अतात्त्विक सां व्यावहारिक ही प्रामाण्य है । प्रत्यक्ष प्रमाण ज्येष्ठ प्रमाण ही आगम और अनुमान से प्रथम ही प्राणियों के व्यवहार में उपयुक्त होता है । परन्तु यह ज्येष्ठत्व बाध्यता का हेतु है अबाध्यता का नहीं है । अतएव शुक्तिका में रजतज्ञान यद्यपि ज्येष्ठ है तथापि पश्चाद्भावी कनीयान् शुक्ति ज्ञान से बाधित हो जाता है। प्रामाण्यवाद का परिचय न होने से ही ऐसी बातें कही जा सकती हैं। आँखों की तो बात ही क्या ? वर्णाश्रमानुसारी धर्मों एवं उपास्य स्वरूपों तथा शुद्ध ब्रह्म का प्रबोध तो वेद से अतिरिक्त प्रमाणों से हो ही नहीं सकता है । वेदोपनिषद् शास्त्राचार्योपदेश से संस्कृत निर्मल मन या एकाग्रमनःसहकृत उपनिषद्-महावाक्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन हैं, आँख नहीं । सगुण साकार ब्रह्म का साक्षात्कार भी भगवच्चरणपङ्कज में समर्पण बुद्धि से अनुष्ठित स्वधर्मों से प्रसन्न हुए भगवान् के द्वारा दत्त दिव्य दृष्टि से ही सम्भव होता है सामान्य चक्षुओं से नहीं । आश्चर्य तो यह है एक रामायण वक्ता वेदशास्त्र को प्रमाण न मानकर कबीर को मानते हैं । यह कहना भी असङ्गत है कि “जो ऋषि ब्रह्म का साक्षात्कार कर चुके हैं। उन मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने जो वाक्य कहे हैं वे प्रामाणिक हैं।” मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के वाक्य नहीं, किन्तु वे मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद ही प्रमाण हैं जिनका ऋषि लोग दर्शन करते हैं । ऋषियों के वे ही वाक्य प्रमाण हैं जो उन मन्त्रों और ब्राह्मणों के अविरुद्ध हैं । उनके विरुद्ध ऋषि वचन भी प्रमाण नहीं हो सकते । “इस तर्क को सर्वथा अस्वीकार नहीं किया जा सकता । फिर भी शास्त्रों की प्रामाणिकता को असंदिग्ध बनाने के लिए यह आवश्यक है कि लेखी को देखी के रूप में परिणत किया जाय ।” यह कथन भी असङ्गत ही है,