भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 833

७५६ रामायणमीमांसा एकविंश क्योंकि यह तर्क नहीं है । तर्क कोई प्रमाण नहीं होता । तर्क तो केवल व्याप्तिग्रह का सहायकमात्र होता है । किसी भी अंश में भी वेदप्रामाण्य को अस्वीकार करना नास्तिकता है । मनु के अनुसार वेद-निन्दक नास्तिक— —“नास्तिको वेदनिन्दकः ।” ( मनु० २।११ ) “जो कोइ दूषहिं श्रुति करि तरका । परहि ते कोटि कल्पभरि नरका ॥” ( रा० मा० ७।९९।२ ) शास्त्र का प्रामाण्य सापेक्ष नहीं होता । सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः होता है, परतः नहीं । यदि परतः प्रमाण कहेंगे तो प्रथम प्रमाण की प्रमाणता के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता होगी और दूसरे प्रमाण के प्रामाण्य के लिए तीसरा प्रमाण ढूंढ़ना पड़ेगा । इसी तरह चौथे, पाँचवें, छठे आदि प्रमाणों की अपेक्षा होने से अनवस्था- प्रसङ्ग होगा । यदि किसी अन्तिम प्रमाण को स्वतः प्रमाण मानना ही है तो प्रथम प्रमाण को ही स्वतः प्रमाण क्यों न माना जाय ? अतः विषयबाध एवं करणदोष का ज्ञान होने से अप्रामाण्य का निर्णय होता है । अतः अप्रामाण्य परतः होता है । प्रमाण का प्रामाण्य तो स्वतः ही होता है । अर्थक्रियाकारित्व या प्रमाणान्तरसंवाद के कारण संसंदिग्धता की निवृत्ति परतः प्रामाण्यवाद में होती है, स्वतः प्रामाण्यवाद में नहीं । यह भी कहना गलत है कि “योगी ग्रन्थों के आधार पर नहीं, किन्तु अनुभूति के आधार पर स्वीकार करता है”, क्योंकि बुद्ध और महावीर भी योगी थे । उन्होंने ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं की । अतः योग भी स्वतन्त्ररूप से ईश्वर साक्षात्कार का हेतु नहीं है । किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया है । वेदान्तादिसहकृत योगयुक्त मन या योगयुक्तमनःसापेक्ष वेदवेदान्त ही ब्रह्म-साक्षात्कार का हेतु है । “शब्दप्रमाण परोक्षज्ञान का ही जनक होता है”, यह कहना भी गलत है, क्योंकि शब्द का विषय परोक्ष है तो वहां परोक्ष ही ज्ञान होता है जैसे धर्म, अपूर्व, अदृष्ट तथा वैदिक क्रियाओं का उनके फलों के साथ कार्यकारणभाव का ज्ञान परोक्ष रहता है । परन्तु ब्रह्मात्मा का ज्ञान वेदान्त शब्दों से उत्पन्न होने पर भी वह ज्ञान अपरोक्ष होता है परोक्ष नहीं, क्योंकि उसका विषय ब्रह्म अपरोक्ष ही है । दशमस्त्वमसि इस वाक्य से जनित ‘दशमोऽहमस्मि’ यह ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान ही होता है । सुख के वर्तमान होने पर ‘त्वं सुखी’ इस वाक्य से जन्य ‘अहं सुखी’ इत्याकारक ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान ही होता है । उपनिषदों के अनुसार साक्षात् अपरोक्ष व्यवधानशून्य प्रत्यक्ष ब्रह्म ही होता है । घटादि तो चक्षु एवं तज्जन्य अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं । परन्तु बोधरूप ब्रह्म तो बोधरूप होने से वृत्ति-व्यवधान के बिना ही अपरोक्ष है । कहा जाता है कि “ईश्वर को देखने के लिए जिस दृष्टि की अपेक्षा है तुलसी की भाषा में उसका नाम है—श्रद्धा और विश्वास ।” परन्तु यह अत्यन्त असङ्गत है, कारण प्रमा चाहे परोक्ष हो चाहे अपरोक्ष हो उसका कारण प्रमाण ही होता है । श्रद्धा और विश्वास स्वयं प्रमाण नहीं हैं । प्रमा-करण ही प्रमाण है । तर्क भी प्रमाण नहीं है । इसी लिए तो गुरु और वेदान्तवाक्यों में विश्वास का नाम श्रद्धा है । श्रद् विश्वासं दधातीति श्रद्धा । कई बार असम्भावना आदि दोषों के कारण निर्दोष प्रमाण से उत्पन्न प्रमाज्ञान भी निरर्थक हो जाता है । भच्छूनाम के व्यक्ति के सम्बन्ध में यह धारणा दृढ़ बन गयी थी कि वह मर कर प्रेत हो गया है । इसी के कारण उसके मित्र राजा को अपने निर्दोष चक्षु से यह भच्छू है ऐसा ज्ञान होने पर भी उसी विपरीत भावना के कारण उसको अपने आँखों पर भी विश्वास नहीं हुआ और वह उसे प्रेत समझकर भाग चला । अतः परीक्षित प्रामाण्य- वाले प्रमाणों से किसी वस्तु का ज्ञान होने पर भी अविश्वास और अश्रद्धा की बात उठ सकती है । अतः निर्दोष प्रमाण

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