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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 834

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५७ से निश्चित वस्तुनिश्चय को अडिग रखना संशय, विपर्यय आदि से उपप्लुत न होने देना विश्वास और श्रद्धा का ही काम है। प्रामाणिक वस्तु में दृढ़ आस्था दृढ़ अस्तित्वबुद्धि विश्वास है। वही विश्वास जब स्नेह से द्रवीभूत प्रीतियुक्त बुद्धि में उद्भूत होता है तब श्रद्धापद से व्यपदेश्य होने लगता है। अतएव धर्म और ब्रह्म के सम्बन्ध में श्रद्धा एवं विश्वास परम महत्त्वपूर्ण प्राणतुल्य हैं। उनके बिना सब प्रमाण भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिए उन्हें भवानी और शङ्कर के तुल्य कहा गया है। योगभाष्यकार का कहना है कि "श्रद्धा जननीव योगिनं पाति" जैसे जननी पुत्र की रक्षा करती है वैसे ही श्रद्धा उत्साहशक्ति योगी की रक्षा करती है। "पार्वती का जन्म हुआ है। परन्तु शिव अजन्मा हैं" यह कहना असङ्गत है। क्योंकि स्वरूप से दोनों एक ही अनादि अनन्त परमात्मा हैं। अवतार की दृष्टि से जैसे भगवती के अवतार होते हैं वैसे ही शिव के भी अवतार होते हैं। भगवान् शिव भी ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं। वैसे ही जैसे राम दशरथ से उत्पन्न हुए। जैसे सीता उत्पन्न होती हैं वैसे ही सती और उमा का भी अवतार ही होता है। अतएव यह कहना भी सङ्गत नहीं है कि "श्रद्धा का जन्म होता है विश्वास का जन्म नहीं होता है।" क्योंकि आस्तिकों के वातावरण में रहने से वेदादिशास्त्रों के संस्कार से ही विश्वास और श्रद्धा दोनों ही उत्पन्न होनेवाली चीज हैं। बुद्धि भी उत्पन्न होनेवाली चीज है तो फिर उसका कोई भी धर्म अनुत्पन्न कैसे कहा जा सकता है? हां, परम्पराप्राप्त आस्तिकता के संस्कार के समान विश्वास एवं श्रद्धा के संस्कार भी परम्पराप्राप्त हो सकते हैं। तर्क केवल शास्त्रोक्त जटिल अर्थों को बुद्ध्यारूढ़ करने के लिए ही तर्क का उपयोग मनन के रूप में किया जाता है। 'श्रोतव्यः' के पश्चात् 'मन्तव्यः' की स्थिति आती है। मनन ही तर्क है। परन्तु उच्छृङ्खल तर्क का आदर न कर शास्त्रसम्मत तर्कों का उपयोग करना चाहिये। अतएव यह कहना अनुचित है कि "तर्क व्यक्ति के अहं को तुष्ट करने का ही एक साधन है। मनन, युक्ति, उपपत्ति शास्त्रसिद्ध वस्तु को बुद्ध्यारूढ़ करने का श्रुत्युक्त उपाय है अहङ्कार की तुष्टि का उपाय नहीं।" उदयनाचार्य के अनुसार न्यायचर्चा या तर्क श्रवण के अनन्तर आनेवाली मननरूप उपासना ही है— "न्यायचर्चेयमीशस्य मननव्यपदेशभाक्। उपासनैव क्रियते श्रवणानन्तरागता।" (न्यायकुसुमाञ्जलि)। बुद्धि "बुद्धि प्रत्येक वस्तु को कार्यकारणभाव के आधारपर स्वीकार करती है। किन्तु हृदय की स्वीकृति के पीछे कोई तर्क नहीं होता।" यह कहना असङ्गत है, क्योंकि हृदयपद से हृदयस्थ बुद्धि ही कही जाती है। हृदयपद का वाच्यार्थपुण्डरीक के आकार का मांसपिण्ड ही है। 'मञ्चाः क्रोशन्ति' के समान गौण वृत्ति से ही 'हृदयेनाभिजानाति' आदि प्रयोग होते हैं। वस्तुतः मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार ये चारों ही अन्तःकरण हैं। ज्ञान-साधनरूप में अन्तः- करण, मन, बुद्धि या चित्त ही प्रसिद्ध हैं। स्वस्थ श्रद्धालु बुद्धि ही कभी कभी हृदयशब्द से कही जाती है। श्रद्धा "श्रद्धा पूर्वजन्म में दक्षपुत्री है। दक्ष चतुर हैं। उन्हें अपनी योग्यता एवं बुद्धिमत्ता पर गर्व था। सती जिज्ञासा हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति में जिज्ञासा का पैदा होना स्वाभाविक है। परन्तु इस जिज्ञासा का सदुपयोग क्या है? लोकपितामह ब्रह्मा ने दक्ष को आदेश दिया। अपनी पुत्री शिव को अर्पित कर दो। जिज्ञासा की पूर्ति तो है—संशय का विनाश और विश्वास की उपलब्धि इत्यादि", परन्तु यह सब अटकलपच्चू भिड़न्त भिड़ानामात्र है।

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