रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 835, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंवस्तुतः दक्षता गुण है दोष नहीं। अतएव गीता में भगवान् ने उच्च कोटि के ज्ञानी के लक्षणों में 'अनपेक्षः शुचिर्दक्षः' (गीता १२।१६) दक्ष होना भी कहा है। भगवान् के अनेक नामों में दक्ष भी भगवान् का एक नाम है—'उग्रः संवत्सरो दक्षः' (विष्णुसहस्रनाम) । गर्व एवं अभिमान तो अविवेक का ही परिणाम है। अविवेक से कोई ज्ञानी होने का या कोई दक्ष होने का घमण्ड कर सकता है। कोई भक्त होने का भी तो अभिमान करता है। परन्तु क्या यह भक्ति का दोष है। यह कहा जा चुका कि सती तथा उमा भगवान् शिव की स्वरूपभूता शक्ति हैं। उनके माया या मोह के वर्णन का तात्पर्य राम की महिमा बतलाने में है। भगवान् विष्णु और ब्रह्मा शिवजी के दिव्य ज्योतिर्लिङ्ग का ओर- छोर देखने के लिए गये। परन्तु पार न पाकर लौट आये। इस वर्णन का तात्पर्य विष्णु के अपकर्ष-वर्णन में नहीं है, किन्तु शिव की महिमा के वर्णन में है। वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये। यह कहा जा चुका है कि श्रद्धा, विश्वास, जिज्ञासा आदि सब अन्तःकरण की उत्कृष्ट वृत्तियाँ हैं। आदरणीयता की दृष्टि से उन्हें भवानी तथा शङ्कर से सन्तुलित किया जाता है। इसी कारण सती का जिज्ञासु या संशयालु होना नहीं कहा जा सकता है। लोककल्याणार्थ तन्त्रों और आगमों में शिव-पार्वती-संवाद के रूप में बहुत से प्रश्नों एवं उत्तरों का वर्णन है। श्रीकृष्ण भगवान् नारदजी से अनेक प्रश्न राजनीतिक व्यवहार के सम्बन्ध में करते हैं। श्रीनारदजी उनका समाधान करते हैं। यह सब उनकी लीला ही है। उनको कोई संशय एवं जिज्ञासा नहीं है। तभी तो श्रीसीताजी पार्वती की स्तुति में उन्हें भव (विश्व) के भव, विभव और पराभव का कारण बतलाती हुई उन्हें स्ववशविहारिणी कहती हैं— “भव भव विभव पराभवकारिणि। बिश्वबिमोहिनि स्ववशबिहारिणि ॥” (रा० मा० १।१३४।४) अतएव सती के सम्बन्ध में निम्नोक्त दुष्कल्पनाएँ करना बुद्धि का दुरुपयोग ही है। “जिज्ञासा और विश्वास का परिणय लोकमङ्गल के लिए आवश्यक है। यही ब्रह्मा का दृष्टिकोण था। किन्तु विवाह का परिणाम यह नहीं हुआ, जिसकी कल्पना ब्रह्मा के मन में थी। यद्यपि सती ने समग्र समर्पण की भावना से ही शिव का वरण किया था। किन्तु वह अन्तश्चेतना की गहराइयों में छिपे हुए पिता के संस्कारों से स्वयं को मुक्त न कर पायी थीं। जबतक जिज्ञासा अहंशून्य नहीं होगी तबतक विश्वास के लिए अर्पित होना सम्भव भी नहीं है।” क्योंकि दक्ष होना कथमपि दोष नहीं है। दक्ष भगवान् विष्णु के परमभक्त थे। क्रियादक्ष तो थे ही। किन्तु वह शिवद्रोही थे। यही एक उनमें मुख्य दोष था। यह संस्कार सती में बिल्कुल ही नहीं था। तभी तो उन्होंने शिवद्रोही दक्ष से सम्भूत अपने शरीर को रखना अपने लिए लज्जाजनक माना था। सतीजी का राम के सम्बन्ध में किया हुआ संशय ही पार्वती-जन्म में रामसम्बन्धी जिज्ञासाओं का मूल बना था। जिज्ञासा का बीज ही संशय होता है। पूर्वोत्तरमीमांसाओं में प्रत्येक अधिकरण में विषय, विशय (संशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष तथा पूर्वपक्ष-निरासन-पूर्वक सिद्धान्त-व्यवस्थापन होता है। व्यावहारिक दृष्टि से शिवजी ने सती के उस मोह का कारण भगवान् की माया को ही माना था— “बहुरि हरि मायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहि झूठ कहावा ॥” (रा० मा० १।५५।३) अन्यथा शिव के कहने पर भी संशय क्यों न मिटता। माया का भी कुछ दोष नहीं था। इसी प्रकार