भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

वस्तुतः दक्षता गुण है दोष नहीं। अतएव गीता में भगवान् ने उच्च कोटि के ज्ञानी के लक्षणों में 'अनपेक्षः शुचिर्दक्षः' (गीता १२।१६) दक्ष होना भी कहा है। भगवान् के अनेक नामों में दक्ष भी भगवान् का एक नाम है—'उग्रः संवत्सरो दक्षः' (विष्णुसहस्रनाम) । गर्व एवं अभिमान तो अविवेक का ही परिणाम है। अविवेक से कोई ज्ञानी होने का या कोई दक्ष होने का घमण्ड कर सकता है। कोई भक्त होने का भी तो अभिमान करता है। परन्तु क्या यह भक्ति का दोष है। यह कहा जा चुका कि सती तथा उमा भगवान् शिव की स्वरूपभूता शक्ति हैं। उनके माया या मोह के वर्णन का तात्पर्य राम की महिमा बतलाने में है। भगवान् विष्णु और ब्रह्मा शिवजी के दिव्य ज्योतिर्लिङ्ग का ओर- छोर देखने के लिए गये। परन्तु पार न पाकर लौट आये। इस वर्णन का तात्पर्य विष्णु के अपकर्ष-वर्णन में नहीं है, किन्तु शिव की महिमा के वर्णन में है। वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये। यह कहा जा चुका है कि श्रद्धा, विश्वास, जिज्ञासा आदि सब अन्तःकरण की उत्कृष्ट वृत्तियाँ हैं। आदरणीयता की दृष्टि से उन्हें भवानी तथा शङ्कर से सन्तुलित किया जाता है। इसी कारण सती का जिज्ञासु या संशयालु होना नहीं कहा जा सकता है। लोककल्याणार्थ तन्त्रों और आगमों में शिव-पार्वती-संवाद के रूप में बहुत से प्रश्नों एवं उत्तरों का वर्णन है। श्रीकृष्ण भगवान् नारदजी से अनेक प्रश्न राजनीतिक व्यवहार के सम्बन्ध में करते हैं। श्रीनारदजी उनका समाधान करते हैं। यह सब उनकी लीला ही है। उनको कोई संशय एवं जिज्ञासा नहीं है। तभी तो श्रीसीताजी पार्वती की स्तुति में उन्हें भव (विश्व) के भव, विभव और पराभव का कारण बतलाती हुई उन्हें स्ववशविहारिणी कहती हैं— “भव भव विभव पराभवकारिणि। बिश्वबिमोहिनि स्ववशबिहारिणि ॥” (रा० मा० १।१३४।४) अतएव सती के सम्बन्ध में निम्नोक्त दुष्कल्पनाएँ करना बुद्धि का दुरुपयोग ही है। “जिज्ञासा और विश्वास का परिणय लोकमङ्गल के लिए आवश्यक है। यही ब्रह्मा का दृष्टिकोण था। किन्तु विवाह का परिणाम यह नहीं हुआ, जिसकी कल्पना ब्रह्मा के मन में थी। यद्यपि सती ने समग्र समर्पण की भावना से ही शिव का वरण किया था। किन्तु वह अन्तश्चेतना की गहराइयों में छिपे हुए पिता के संस्कारों से स्वयं को मुक्त न कर पायी थीं। जबतक जिज्ञासा अहंशून्य नहीं होगी तबतक विश्वास के लिए अर्पित होना सम्भव भी नहीं है।” क्योंकि दक्ष होना कथमपि दोष नहीं है। दक्ष भगवान् विष्णु के परमभक्त थे। क्रियादक्ष तो थे ही। किन्तु वह शिवद्रोही थे। यही एक उनमें मुख्य दोष था। यह संस्कार सती में बिल्कुल ही नहीं था। तभी तो उन्होंने शिवद्रोही दक्ष से सम्भूत अपने शरीर को रखना अपने लिए लज्जाजनक माना था। सतीजी का राम के सम्बन्ध में किया हुआ संशय ही पार्वती-जन्म में रामसम्बन्धी जिज्ञासाओं का मूल बना था। जिज्ञासा का बीज ही संशय होता है। पूर्वोत्तरमीमांसाओं में प्रत्येक अधिकरण में विषय, विशय (संशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष तथा पूर्वपक्ष-निरासन-पूर्वक सिद्धान्त-व्यवस्थापन होता है। व्यावहारिक दृष्टि से शिवजी ने सती के उस मोह का कारण भगवान् की माया को ही माना था— “बहुरि हरि मायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहि झूठ कहावा ॥” (रा० मा० १।५५।३) अन्यथा शिव के कहने पर भी संशय क्यों न मिटता। माया का भी कुछ दोष नहीं था। इसी प्रकार

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५९ माया भगवान् के सम्बन्ध में संशय जिज्ञासा के द्वारा रामायण का विस्तृत वर्णन कराना चाहती थी । सती स्वयं भी मायामोहित होने का नाटक कर के श्रीराम की अत्यन्त महिमा का प्रख्यापन कराना चाहती थीं । तर्क तथा प्रतितर्क से वैदिक सिद्धान्त का पूर्वोत्तरमीमांसाओं से परीक्षण किया जाता है। मीमांसा शब्द का पूजित विचार ही अर्थ है। इसी तरह बुद्धि को मस्तिष्कनिवासिनी कहना भी निर्मूल है। शास्त्रानुसार बुद्धि का निवासस्थान हृदय ही होता है। मस्तक में ही श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना इन चार ज्ञानेन्द्रियों का निवास होता है । मस्तिष्क में बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानतन्तुओं का बाहुल्य होने से भ्रान्तिवश ही कई लोग बुद्धि को मस्तिष्क-निवासिनी कहते हैं, अतएव दक्षपुत्री से चतुराई और शैलपुत्री होने से जड़ता की कल्पना भी निर्मूल है। यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि "जो स्वयं को काव्य के प्राकट्य का माध्यममात्र स्वीकार करते हैं, उनके हृदयप्राङ्गण में ईश्वर की प्रेरणा से सरस्वती नृत्य करती है । "जेहि पर कृपा करहि जन जानी । कबि उर अजिर नचावहि बानी ।।" (रा० मा० १।१०४।३) ऐसे काव्य के अमित अर्थ की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। रचयिता के उद्देश्य की सीमाओं का पता लगाना अनावश्यक श्रममात्र है । वाटिका में खिले हुए गुलाब का क्या अर्थ है ? कवि उसमें मुस्कुराहट देखता है। माली को वाटिका के शृङ्गार के रूप में दिखायी देता है। कामिनी को शृंगार का प्रसाधन प्रतीत होता है। एक चिकित्सक को उसमें ओषधि का तत्त्व दिखायी देता है। क्या कोई देखने के साथ कह सकता है कि रचयिता का इसमें मुख्य उद्देश्य कौन था ? रचयिता के असीम उद्देश्यों को किसी सीमा में बाँध पाना सम्भव नहीं है। ईश्वर-प्रेरणा से निर्मित काव्य के विषय में भी यही बात है कि जब काव्य का प्रतिपाद्य भी ब्रह्म हो तब उसकी सीमाएँ खींच पाना और भी असम्भव है— 'हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता । कहहिं सुनहिं बहुविधि सब सन्ता ।।' (रा० मा० १।१३९।३) बहुविधि कहने सुनने की स्वतन्त्रता भी रामचरित में इसी लिए प्राप्त है कि शब्द यहाँ केवल सरोवर के रूप में नहीं है जिसके अर्थ जल की कोई सीमा हो । सीमित सरोवर के जल का सूख जाना अवश्यम्भावी है, किन्तु शब्द जहाँ नदी की मूल धारा के समान हैं वहाँ शब्द मूलस्रोत की भाँति नूतन अर्थ का जल प्रवाहित करता रहता है । शाश्वत काव्य का स्वरूप भी यही है ।" ( मा० मु० १४ ) उपर्युक्त बातें अविचारित रमणीय ही हैं, क्योंकि यदि शब्दों का कोई निश्चित अर्थ न होगा तब तो भिन्न- भिन्न वक्ता अपनी अपनी बुद्धि और रुचि के अनुसार ही उनका नया नया मनमानी अर्थ करते जायेंगे । फिर तो तर्क और आगम में कोई भेद ही न रह जायगा । जैसे एक तार्किक अपनी बुद्धि से दूसरे तर्क द्वारा पहले तर्क को काट देता है। वैसे ही बुद्धिमान् लोग अपनी अपनी बुद्धि के बल पर आविर्भूत नये अर्थ से पुराने अर्थ को काट देंगे । फिर किसी भी वचन का निश्चित अर्थ ही न हो सकेगा। यह शब्द के लिए भूषण नहीं, किन्तु दूषण ही है। गुलाब का फूल शब्द नहीं है वह तो अर्थ ही है। उसका कोई अर्थ नहीं । उसके प्रयोजन तो अनेक हो ही सकते हैं। वह वाटिका का शृंगार भी है, कलिका की मुस्कुराहट भी है, कामिनी का शृंगार भी है एवं भक्त के पूजा का उपकरण भी है। चिकित्सक के लिए वह ओषधि भी हो सकता है। परन्तु यही बात शब्दों और वाक्यों के लिए नहीं । 'गतोऽस्तमर्कः' इन शब्दों का अर्थ तो यही है कि सूर्य अस्ताचल को गये । पर अपनी अपनी परिस्थिति के अनुसार उससे चोर चोरी का समय समझे, ब्राह्मण सन्ध्या करने का समय समझे और अभिसारिका अभिसार की बात सोचे. परन्तु यह शब्दार्थ नहीं है ।

७६० रामायणमीमांसा एकविंश अनादि अपौरुषेय वेद ईश्वर की प्रेरणा से किसी कवि की वाणी नहीं हैं, किन्तु साक्षात् ईश्वर की वाणी हैं। यह वेदप्रमाण से सिद्ध है। परन्तु वेद के सम्बन्ध में यह विचार उठता है कि क्या वैदिक शब्द और वैदिक अर्थ अत्यन्त अलौकिक हैं या लौकिक हैं ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा तब तो उनके अर्थज्ञान का कोई उपाय नहीं है । क्योंकि लौकिक मनुष्यों को तो लौकिक शब्दों और लौकिक अर्थों के साथ ही सङ्गतिग्रह होता है। अलौकिक शब्दों और अलौकिक अर्थों का उन्हें ज्ञान ही नहीं, फिर शक्तिग्रह कैसे होगा ? शक्तिग्रह के बिना वाक्यार्थबोध कैसे होगा ? बौद्ध आदि कहते हैं कि शब्द और अर्थ का कोई सम्बन्ध निश्चित नहीं होता । उसका यथेष्ट विनियोग किया जा सकता है । इसी लिए वे कहते हैं कि 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' इस वाक्य का 'श्वमांसं भक्षयेत्' ऐसा अर्थ क्यों न हो ? सिद्धान्ततः इसका उत्तर यही है कि लौकिक शब्द ही वैदिक शब्द होते हैं । अतएव अलग से शक्तिग्रह की भी अपेक्षा नहीं होती । पद तथा पदार्थ लौकिक एवं वैदिक समान ही होते हैं । अपूर्व स्वर्ग तथा उनका यज्ञायागादि के साथ कार्य-कारणभाव अलौकिक वाक्यार्थ है पदार्थमात्र नहीं है । "यत्परः शब्दः स शब्दार्थः" शब्दों का जिसमें तात्पर्य होता है वही वास्तविक शब्दार्थ होता है । तात्पर्यनिर्णय के लिए उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति का विचार करना पड़ता है । इस दृष्टि से ही कर्म, उपासना का अनुष्ठान वेदार्थनिर्णय पर ही निर्भर है। यदि निश्चित वेदार्थ निर्धारित न होगा तो कर्मोपासना का अनुष्ठान कैसे होगा ? ब्रह्मात्म-साक्षात्कार भी निश्चित शब्दार्थ के निर्धारण के बिना असम्भव है । अतः किसी काव्य का अमित अर्थ है, यह कहना असम्भव है। हाँ अमित का अर्थ ब्रह्म है । अतएव श्रीभगवान् कहते हैं कि--'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ । भगवान् अनन्त हैं, उनके जन्म अनन्त हैं, चरित्र अनन्त हैं । परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि कोई मन- मानी कल्पना करने में स्वतन्त्र है । चरित्र का भी मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि इतिहासों, संहिताओं, तन्त्रों एवं आगमों के आधार पर ही निर्धारण होता है। स्वतन्त्र कल्पनाएँ कल्पना ही समझी जायेंगी । अपौरुषेय वेद एवं तदाश्रित आर्ष सद्ग्रन्थ ही धर्म और ब्रह्म में प्रमाण हैं। अन्य सन्त- महात्माओं के वचन भी उन्हीं पर निर्भर हैं । संस्कृत पर मिथ्या आक्षेप "वर्णाश्रमधर्म में ब्राह्मण ही वैश्य थे । संस्कृत भाषा उनके द्वारा प्रयुक्त थी ।" (मानसमुक्तावली पृ० ६३) संस्कृत भाषा या संस्कृत शब्द अनादि हैं। अन्य शब्द भी इसके अपभ्रंश एवं प्रवाह रूप से अनादि ही होते हैं । वेदाङ्ग व्याकरण के द्वारा अपभ्रष्ट असाधु शब्दों से साधु संस्कृत शब्दों का पृथक्करण ही उसका संस्कार है । इसी लिए वह संस्कृत कहलाती है। जैसे छलनी गालनी या चालनी ग्राह्य वस्तुओं से अग्राह्य वस्तुओं को पृथक् कर देती है । वैसे ही प्रकृत में व्याकरण के सूत्रों द्वारा साधु-असाधु शब्दों का पृथक्करण होता है । वेद अनादि अपौरुषेय सबके कल्याणकारी हैं। वे सबके हैं। संस्कृत ब्राह्मणों की ही नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों की भाषा है । इतना ही क्यों वह प्राणीमात्र की धर्मभाषा है। शूद्र बन्धुओं का उनके अधिकारा- नुसार संस्कृत के नमोऽन्त मन्त्रों में अधिकार है । वेदादिशास्त्रों के उपदेशों को ही विभिन्न भाषाओं में सन्त-सज्जन सबके कल्याणार्थ दुहराते हैं । अरे यह तो पाश्चात्यों का प्रचार है कि संस्कृत एक वर्ग विशेष की भाषा है । वर्णाश्रमधर्म तो सबका ही धर्म है । तुलसी इसी के तो पोषक हैं । संस्कृत ग्रन्थों में स्वकीयत्व अपनत्व की भावना मिट जाना यह पाश्चात्य प्रचार का प्रभाव है ।

कहा जाता है कि "संस्कृत के ग्रन्थों का आनन्द लेने के लिए विद्वान् की आवश्यकता होती है। विद्वान् व्याख्याता और ग्रन्थ उनकी परिधि से इतने दूर थे कि उन्हें स्पर्श करने का साहस भी नहीं सकते थे। यह स्थिति कुछ लोगों को अभीष्ट हो सकती थी। क्योंकि उसमें उनका व्यावहारिक स्वार्थ भी जुड़ गया था। पर लोक-मङ्गल की दृष्टि से यह स्थिति एक ऐसी अभिशाप थी जिसके द्वारा समाज धर्म से चला गया।" यह सब द्वेषपूर्ण प्रचार है। यह कहने और लिखनेवालों का भी स्वार्थ इस प्रचार से जुड़ा है। आखिर तुलसीरामायण के बन जाने पर भी जनता को कथा चाहिये और तुलसीरामायण के भी सहस्रों वक्ता कथा कहने लगे और उसी से लाखों रुपये कमाने लगे। हाँ, जहाँ कथा के नाम पर मूल वेद, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि की चर्चा विद्वानों द्वारा चलती थी वह अब बन्द हो गयी। अब अधिकांश संस्कृतानभिज्ञ वक्ताओं तथा सिद्धान्त से अनभिज्ञ वक्ताओं द्वारा भाषाग्रन्थों की कथा चल पड़ी। उच्च वर्गों के अहङ्कार और दुर्व्यवहार से जिस प्रतिक्रिया का उदय हुआ उससे ब्राह्मण, संस्कृत और वेद तीनों ही के प्रति तिरस्कार की भावना जैसे कबीर आदिकों में आयी थी वही आज मानस-वक्ताओं में भी आ रही है, यह आश्चर्य है। "वेद कन्तेव की गम्म नाही तहाँ। कहै कबीर कोई रमै सूरा॥" कबीर की ऐसी उक्तियाँ कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित रह गयी हैं। परन्तु तुलसी वेद-प्रामाण्यवादी हैं। उनका नास्तिकता से समन्वय नहीं हो सकता था। "तुलसी के इष्ट राम केवल तुलसी के ही इष्ट नहीं थे, किन्तु वेदादि शास्त्रों के सर्वस्व थे। राम ऋषियों, मुनियों की पूजा करते थे। किन्तु प्राचीन परम्परा के प्रति उनका यह समादर केवल कोल, भील और बन्दरों से उनकी मित्रता के बीच बाधक नहीं बना।" (मा० मु० ६४) यह तुलसी की कोई नयी बात नहीं है। तुलसी ने वेदशास्त्र, पुराण, रामायण और भारत के विरुद्ध कुछ कहा ही नहीं। फिर इसमें प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। यह तो सुधारक रामायणियों के मस्तिष्क का फितूरमात्र है। यह कहना भी कुटिलता ही है कि "भले ही महर्षि वाल्मीकि की देवभाषा में प्रयुक्त वाणी भगवान् को प्रिय लगती है। पर केवट के ग्राम्य बोली में भी राम उतना ही आनन्द लेते थे। एक ओर यदि वे वाल्मीकि की वाणी सुनकर मुस्कराते हैं- "सुनि मुनि वचन प्रेमरस साने। सकुचि राम मन महँ मुस्काने॥" (रा० मा० २।११६।१) तो दूसरी ओर केवट की वाणी उनमें उन्मुक्त आनन्द भर देती है- "सुनि केवट के वैन प्रेम लपेटे अटपटे। विहँसे राजिवनैन चितइ जानकी लखन तन॥" (रा० मा० २।१००) मुस्कराहट में आनन्द की मर्यादित अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार देवभाषा में संस्कृत भी व्याकरण से अनुशासित है। विहँसना आनन्द की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है। यह तो केवट की व्याकरणमुक्त ग्राम्यभाषा के अनुरूप है।" (मा० मु० ६५) यह केवल बुद्धि का दुरुपयोग ही है, क्योंकि तुलसी के वाल्मीकि राम से जिस भाषा में बात कर रहे हैं ९६

७६२ रामायणमीमांसा एकविंश वह तो संस्कृत भाषा नहीं थी। वह तो तुलसी के मानस की ही भाषा थी, क्योंकि मानस के वाल्मीकि और राम के संवाद की चर्चा वाल्मीकिरामायण में है भी नहीं। फिर मन महँ मुस्काने के आधार पर भी व्याकरण से अनुशासित देवभाषा के अनुरूप राम के मर्यादित आनन्द की अभिव्यक्ति का क्या सम्बन्ध है ? तुलसी तो ऐसे दाँव- पेंच की बात न कर सीधे कहते हैं— "बेदबचन मुनिमन अगम ते प्रभु करुना अयन। सुनत किरातन के वचन जिमि पितु बालक बयन ।।" ( रा० मा० २।१३५ ) "जिमि बालक कह तोतरि बाता। सुनत मुदित मन पितु अरु माता ।।" ( रा० मा० १।७।५ ) माता-पिता अपने बच्चों को तोतरी बातों को प्रसन्न मन से सुनते हैं। विहँसते भी हैं। परन्तु किसी ऋषि-मुनि या गुरुजनों की बातें तो गम्भीरता से ही सुनी जाती है। उसी तरह श्रीराम केवट, कोल, भिल्ल और किरातों के प्रेमलपेटे अटपटे वचनों को सुनकर विहँसते हैं। मुनियों की गम्भीर बातों को सुनकर मुस्कराते हैं। वहाँ खिलखिलाकर हँसना अनुचित भी है। इतना ही क्यों संस्कृत के कवियों ने भी प्रेम की एक विचित्र अवस्था का वर्णन किया है। जिसमें भगवान् की अटपटी लीला का चित्रण है। पर इसमें संस्कृत एवं ग्राम्यभाषा के विषाक्त संघर्ष का लेश भी नहीं है— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैः मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु जाने कृष्ण तवाद्भुतं प्रियमहो भक्तैः परच्छन्दितम् ॥” भक्त कहता है कि हे गोपाल, आप गोमूत्र और गोमय के कर्दमयुक्त गोपालों के प्राङ्गण में तो स्वच्छन्द विहार करते हैं। परन्तु विप्रों के ज्योतिष्टोम, वाजपेय आदि अध्वरों में पधारने में लज्जित होते हैं। गायों एवं बछड़ों के हुंकारों से बोल पड़ते हैं, परन्तु सन्तों की सैकड़ों स्तुतियों के सुनने पर भी मौनभङ्ग नहीं करते हैं। अरे आप गोकुल-पुंश्चलियों का तो खुशी से दास्य अङ्गीकार करते हैं, परन्तु बड़े बड़े जितेन्द्रिय महामुनियों का स्वामित्व भी अङ्गीकार नहीं करते हैं यह क्या है ? हे कृष्ण ! हम आपके उस अद्भुत भक्तिपराधीनता को जानते हैं। वस्तुतः यह सिद्धान्त सर्वसम्मत है कि देववाणी परमपवित्र पुण्यजनक है। वेदवाणी उससे भी पवित्र साक्षात् परमेश्वर की वाणी है। अगर भगवान् की महिमा भगवान् का यश वेद के अधिकारियों को वेदवाणी में प्राप्त हो तो बहुत ही श्रेष्ठ है। संस्कृत भाषा में मिले तब भी श्रेष्ठ है। परन्तु यदि वही वस्तु अन्य भाषा में मिले तो भी वह श्रेष्ठ ही है। यदि संस्कृत भाषा में ईश्वर का खण्डन सुनने को मिले, परन्तु प्राकृत ग्राम्य भाषा में भगवान् की महिमा सुनने को मिले तो सहज ही में यहाँ विषय की महत्ता के सामने भाषा का प्रश्न गौण हो जाता है। परन्तु यदि वही उत्कृष्ट तत्त्व वैदिक भाषा में मिले और प्राप्त करनेवाला उसका अधिकारी भी हो तब तो उसका उत्कर्ष निर्विवाद है ही। "मणि भाजन विष पारई पूरन अमिअ निहारु। का छोड़िय का संग्रहहि देखु बिबेक बिचारु ॥” मणिपात्र में विष भरा हुआ हो और मिट्टी के पात्र में अमृत रखा हुआ हो तो विवेकी किसे ग्रहण करेगा एवं किसे छोड़ेगा ? यह कहने की जरूरत नहीं है।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६३ पर इससे बाल्मीकिरामायण और मानस की तुलना करना निरी अनभिज्ञता ही होगी। यदि उत्तम मणिपात्र में अमृत ही रखा हो तो उसे छोड़कर मृण्मय पात्र के अमृत को कौन ग्रहण करेगा ? क्योंकि वहाँ भाषा और विषय दोनों का ही उत्कर्ष है । भाषा संस्कृत हो विषय निकृष्ट हो तो वहाँ जितना उत्कृष्ट भाषा से पुण्य होगा उससे अधिक निकृष्ट विषय के अनुसन्धान से पाप होगा । किन्तु जहाँ भाषा ग्राम्य भी हो, किन्तु विषय हो भगवान् का मङ्गलमय नाम, गुण, यश तथा स्वरूप तो वहाँ विषय के उत्कर्ष से भाषा के यत्किञ्चित् दोष भी निरस्त हो जायेंगे । इससे संस्कृत एवं ग्राम्य गिरा के उत्कर्षापकर्ष की कल्पना नही करनी चाहिये । जब देवताओं और लोक के कल्याणार्थ देवाधिदेव भगवान् विष्णु नर के रूप में प्रकट होते हैं तो देवताओं का भी उनकी सहायता-सेवा के लिए वानर तथा भालू के रूप में आविर्भाव होता है। देवताओं का पद मनुष्यों से ऊँचा है । फिर भी परमतह्मपद वैकुण्ठपद उससे भी ऊँचा हैं । देवतापद का सुख सातिशय हैं, निरतिशय नहीं है । सुतरां उत्कर्षापकर्ष के कारण वहाँ ईर्ष्या, द्वेष आदि दोषों की सत्ता रहती है। इसी लिए देवतापद से आगे बढ़ने की अपेक्षा होती है। देवता भी हिरण्यगर्भ के अंश हैं । हिरण्यगर्भ परमेश्वर का ही समष्टि सूक्ष्म शरीर विशिष्ट सोपाधिक रूप हैं । फलतः देवराज इन्द्र ब्रह्मविद्वरिष्ठ ज्ञानी भी होते हैं । परमेश्वर की कथा, स्तुति आदि तो अपनी अपनी भाषा में अपनी अपनी शक्ति के अनुसार सदा ही सभी करते हैं । तामिल, तेलगू, गुजराती, मराठी, पञ्जाबी, काश्मीरी, बङ्गला, उड़िया, मैथिली, हिन्दी आदि भाषाओं में ही नहीं अनेक अन्य भाषाओं में अनेक कवियों ने प्रभु के गुणगणों का वर्णन किया है। परन्तु उन सबका आधार वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र, आगम आदि ही हैं। अतः अपने मूलभूत वेदादि शास्त्रों से कोई अलग नहीं था । इतना ही क्यों अरबी के डेढ़ हजार वर्ष पूर्व कुरान आदि के द्वारा, अपनी भावना के अनुसार इङ्गलिश भाषा में दो हजार वर्ष पूर्व तथा जेन्दावेस्ता द्वारा उससे भी पहले भक्तों ने ईश्वर का गुणगान किया ही है । “कबीर की जीवनी के आधार पर कहा जाता है कि कबीर के मन में उस वर्णव्यवस्था के प्रति कैसे राग हो सकता था जो उनको एक सन्त के निकट पहुँचाने में बाधक बनी । साथ ही श्रीरामचरित्र का वह अंश भी उनके स्मृति में रहा ही होगा जिसमें शम्बूक नाम के शूद्र तपस्वी का इसलिये वध कर दिया गया कि वह वर्णाश्रमव्यवस्था का उल्लङ्घन करके तपस्या में संलग्न था । कबीर ऐसी परिस्थिति में उन राम को कैसे स्वीकार कर सकते थे जो एक शूद्र को सत्कर्म करने का अधिकार भी देने को प्रस्तुत नहीं हैं। दूसरी ओर राम-नाम की साधना से उन्हें अमित लाभ हुआ था । उसे अस्वी- कार कर पाना उनके लिए सम्भव न था । अतः रामनाम को स्वीकार करते हुए भी दशरथनन्दन राम को ईश्वर के रूप में स्वीकार न करना उनके लिए स्वाभाविक था ।'' यह सब शास्त्रीय व्यवस्था न समझने का ही दुष्परिणाम है । शास्त्रोक्त वर्णाश्रमव्यवस्था किसी का भी अपमान करना नहीं सिखलाती । श्रीरन्तिदेव ने पुल्कस जैसे अतिशूद्रों का भी ससम्मान आतिथ्य किया था । आतिथ्यवेला में नाम और गोत्र के प्रश्न के बिना ही वैश्वानर बुद्धि से किमी भी अतिथि का सम्मान करना शास्त्र- सम्मत है । शिवनाम, रामनाम सबके ही लिए कल्याणकारी हैं, यही वेदादि शास्त्रों का निश्चित मत है । पुराण में सहस्रों उदाहरण भरे पड़े हैं। श्रीभागवत का अजामिलोपाख्यान उनमें ज्वलन्त प्रमाण है । अतः श्रीरामानन्दाचार्य के पास जाकर कबीर अपनी जिज्ञासा नहीं प्रकट कर सकते थे, ऐसा इतिहास मनगढ़न्त ही है । महाभारत के अनुसार तो विदुर शूद्र थे । परन्तु भगवान् कृष्ण उनके अतिथि होते थे । धर्मव्याध के समीप धर्मतत्त्वज्ञान के लिए पतिव्रता के वचन से ब्रह्मचारी भी जाकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है । फिर कबीर का रामानन्दा- चार्य के समीप तक पहुँचना कठिन था, यह कहना असङ्गत ही है ।

शास्त्रों के अनुसार निराकार निर्गुणोपासना भी विहित है। उससे भी दोष दूर होते हैं। एक निर्गुणो- पासक के हृदय में प्रतिशोध की भावना सङ्गत नहीं है। गुह की उपासना के विपरीत निराकारवादी कबीर की प्रवृत्ति धर्मयुक्त नहीं हो सकती। यदि निराकार राम सगुण साकार राम हो सकते हैं तो यह सत्य वस्तुस्थिति सिद्ध संत कबीर के मन में अवश्य आनी चाहिये थी। सिद्ध के मन में ऐसी प्रतिक्रिया हो जिससे वह सत्य से मुंह मोड़ ले, यह कैसी सङ्गति और कैसी सिद्धि है ? वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार वैसे ही सम्भव नहीं, जैसे नेत्र के बिना रूपसाक्षात्कार असम्भव है। “दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय । घर की चकिया कोई ना पूजे जाकर पीसा खाय ॥” यह कबीर का कथन असङ्गत है, क्योंकि आस्तिक पत्थर नहीं पूजते । किन्तु वेद प्रमाण के अनुसार पाषाणमयी प्रतिमा में आवाहित परमेश्वर की ही पूजा करते हैं। फिर कबीर को तो इतना भी ज्ञान नहीं था कि हिन्दू चाकी ही नहीं अपितु कुम्हार के चाक को भी पूजते हैं। श्रीराम ने शम्बूक को सत्कर्म करने का अनधिकारी कभी नहीं माना। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। वर्णा- श्रम-मर्यादा का उल्लङ्घन करने के कारण ही श्रीराम रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड देने को बाध्य हुए थे। फिर यदि वे वर्णाश्रममर्यादोल्लङ्घी किसी को दण्ड दें तो उनका क्या दोष है ? शास्त्रानुसार ब्राह्मण भले अखण्ड भूमण्ड का स्वामी हो, राजा हो, परन्तु उसे राजसूय यज्ञ का अधिकार नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय जाति का राजा ही राजसूय यज्ञ कर सकता है, अन्य नहीं । इस सत्य निष्पक्ष स्थिति में कबीर अगर दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम को ईश्वर नहीं मानते तो क्या प्रतिक्रियावादी या दुराग्रही नहीं कहे जायेंगे ? श्रीराम ने तो वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए भी शबरी, गीध, कोल, भिल्ल, किरात, वानरों और भालुओं से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था। फिर, उन्हें किसी प्रकार भी अनीश्वर कैसे कहा जा सकता है ? “एक दारुगत देखिय एकू । पावक युग सम ब्रह्मबिबेकू ॥” ( रा० मा० १।२२।२ ) दारुगत अग्नि निराकार है। पर वही दाहकत्व और प्रकाशकत्व विशिष्ट होकर साकार भी हो जाता है । “जो गुणरहित सगुन सो कैसे । जिमि हिम उपल बिलग नहिं जैसे ॥” (रा० मा० १।११५।२) जब दशरथनन्दन रघुवर ईश्वर हो सकते हैं तब राम को अनैतिहासिक भी कैसे कहा जा सकता है ? यदि कोई रघुवंश नहीं हो तो व्यापक नित्य राम को दशरथनन्दन कैसे कहा जा सकता था ? “बन्दहुँ राम नाम रघुवर को” ( रा० मा० १।१८।१ ) “महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। यदि उन्हें उनमें पूर्ण मानवता का साक्षात्कार हुआ था तो वह स्वाभाविक ही था। किन्तु तुलसी ने राम को देखा तब उन्हें वे केवल मानव के रूप में कैसे दिख सकते थे । काल की इस विशाल परिधि में स्वयं अपने को अभिव्यक्त करनेवाला ईश्वर को छोड़कर अन्य कोई नहीं हो सकता था।” परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकि श्रीराम को माधुर्यभाव की दृष्टि से, राजकुमार की दृष्टि से वर्णन करते हुए भी परमेश्वर ही मानते हैं। “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । जज्ञे विष्णुर्महातेजा आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६५ "भवान्नारायणो देवः" ( वा० रा० यु० का० ) तुलसीदास उक्त तर्क के आधार पर नहीं, किन्तु वेद और पुराण, महाभारत के आधार पर राम को परमेश्वर मानते थे । क्योंकि काल की इस विशाल परिधि के पार तो कई सिद्ध भी अपने को अभिव्यक्त कर सकते थे । योगभाष्य के अनुसार जैगीषव्य दस महाकल्पों के अनन्तर भी अपने को व्यक्त कर सकते थे । "दशसु महाकल्पेषु विपरिवर्तमानेन मया यत्किञ्चिदनुभूतं तद् दुःखमेव ।" तभी तो तुलसीदास श्रीराम का कोशलपाल के रूप में ही स्मरण करते हैं । "तुलसी तो को कृपालु जो कियो कोशलपाल । चित्रकूट को चरित्र चेत चित करि सो ॥" यह कहना भी गलत है कि "गोस्वामी के मन में इतिहास के प्रति कोई आकर्षण नहीं था । उनके लिए राम पुराण या त्रेतायुग के बीते हुए पात्र नहीं हैं। वह तो उनके शाश्वत विद्यमान रहनेवाले राम हैं ।" क्योंकि उनकी दृष्टि में वाल्मीकि के अनुसार राम केवल त्रेतायुग के ही नहीं हैं। वे विष्णु, नारायण या वेदवेद्य परमात्मा ही थे । अतएव शाश्वत हैं । तभी तो राम को रघुवंशमणि एवं कोशलपाल कृपालु कहते हैं। अतः त्रेता युग में चक्रवर्ती दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम ही तुलसी के शाश्वत राम भी हैं । वस्तुतः तुलसी के निर्मल पवित्र भाव पर जो उन्हें वर्णाश्रमधर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते हैं ऐसे वक्ताओं से जनता को ईश्वर ही बचाये । वे कहते हैं कि "राघवेन्द्र केवट के उस दैन्य को मिटा देना चाहते थे, जिसे समाज ने उसपर लाद दिया था । वह धन की दृष्टि से ही नहीं, हर तरह से हीन कर दिया गया था । वह अस्पृश्य था । "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ।" वह किसी राजा के समक्ष मुख खोलने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।" यह वही सुधारवाद है जिसका भूत आधुनिक लोगों पर सवार होता है । कथावाचक सज्जन भी उसके अपवाद नहीं हैं। परन्तु उनके अनुसार राम एवं तुलसी को अवश्य ही नयी आचारसंहिता प्रचलित करनी चाहिये थी । कम से कम "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा" का उत्तर अवश्य देना चाहिये था । वक्ता कह सकता है कि भगवान् ने उसे गले लगाकर ही इसका उत्तर दे दिया था । परन्तु वह भूल करता है । क्योंकि शास्त्रसंस्कारी तो यह समझ लेगा कि आचार में धर्मशास्त्र प्रमाण होता है, इतिहास नहीं। हिन्दी व्यवहार में आदरणीय नहीं, किन्तु कांस्टिट्यूशन ही व्यवहार में आदरणीय है । ईश्वरों का सब आचरण काम में नहीं लाना चाहिये, किन्तु उनकी आज्ञा का ही पालन करना चाहिये— "ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।" (भाग० १०।३३।३२) शास्त्राविरुद्ध ही आचरण अनुष्ठानयोग्य होता है। वैदिक भी यही कहते हैं— "यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि ।" (तै० उ० १।११।२) जो हमारे अनवद्य निर्दोष शास्त्राविरुद्ध आचरण हैं उनका ही आदर करना चाहिये अन्य का नहीं । समाज ने कोई चीज किसी पर लाद दी, यह निष्प्रमाण है। विशेषतः वह शास्त्रानुसारी समाज जिसमें श्रीराम का अवतरण हुआ उसने कोई अनुचित स्थिति किसी पर लादी होती तो क्या उसमें राम का प्रादुर्भाव होना

७६६ रामायणमीमांसा एकविंश उचित था ? शास्त्रानुसारी समाज सदा से प्राणीमात्र को आदर देता है । 'वासुदेवः सर्वमिति' सब वासुदेव ही हैं । यह उसका दर्शन है । रन्तिदेव आदि का उदाहरण दिया जा चुका है । तुलसी ने 'गिरा ग्राम्य सिय राम जस' इस वचन से नम्रता प्रकट की है । परन्तु वक्ता इससे भी संस्कृत काव्यों पर छीटाकसी करता है । 'जिनके अन्तःकरण में यह भय था कि वाल्मीकि, व्यास, भवभूति तथा कालिदास की दिव्य देवभाषा से अलंकृत रामकथा की तुलना में तुलसी के 'ग्राम्य गिरा सियराम जस' में आकर्षण होगा ? किन्तु समय ने उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी शङ्का कितनी निर्मूल थी । कभी-कभी वस्त्रालङ्कार हमारी दृष्टि को इतना उलझा देते हैं कि अन्तराल में छिपे हुए सौन्दर्य को सहज रूप में देख पाना कठिन हो जाता है । आभूषणों का सौन्दर्य हमें व्यक्ति के स्थान पर आभूषणनिर्माता के कौशल की ओर ही ले जाता है । काव्य के रचयिता का पाण्डित्य भी कभी-कभी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न कर देता है । किसी महाकाव्य को पढ़ते हुए यदि हमारी दृष्टि नायक के स्थान पर काव्यकौशल की ओर अधिक जाती हो तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह किसी कवि की सफलता है ? यदि किसी रचनाकार का उद्देश्य अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन हो तो उसको उसमें सफलता की अनुभूति हो सकती है । किन्तु एक भक्त के लिए यह स्थिति सर्वथा असह्य होगी । रचना का वास्तविक उद्देश्य तो नायक को ही पाठक के अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करना होना चाहिये । गोस्वामीजी का दृष्टिकोण यही था । गोस्वामीजी को ऐसा लगा कि वस्त्र और आभूषणों को हटा देने पर राघवेन्द्र का सौन्दर्य उसी रूप में झलक उठे जैसे काई को हटा देने पर जल । राम के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ ।” आधुनिक लोग समझते हैं कि संसार की सारी बुद्धि हमारे ही पास है और कुछ जानते ही नहीं । पर वस्तुतः आधुनिक तथोक्त अभिमानी ही सर्वज्ञान शून्य हैं, क्योंकि कोई भी भूषण, अलङ्कार मुख्य नायक का उपकरण है, अङ्ग है, स्वयं अङ्गी नहीं है । उस अञ्जन की कीमत नहीं जिससे आँख फूट जाय । उस अलङ्कार का कोई महत्त्व नहीं जिससे अलङ्करणीय की शोभा, आभा, प्रभा छिप जाय । श्रीभागवत में स्पष्ट ही कहा है कि —'परं पदं भूषण- भूषणाङ्गम् ।' भगवान् का मङ्गलमय अङ्ग भूषणों का भूषण है। अलङ्कारों से भगवान् के श्रीअङ्ग अलंकृत नहीं होते अपितु अलङ्कार ही भगवान् के अङ्गों से अलंकृत होते हैं । अतएव वैसे भले ही अलङ्कार काई के तुल्य सौन्दर्य के आवरक हों, किन्तु प्रभु के अङ्गों से अलंकृत होने से वे कोटि-कोटि गुणित चमत्कृत होकर भगवान् के अङ्ग को अलंकृत करनेवाले हो जाते हैं । तभी दृश्य, अदृश्य, लौकिक, अलौकिक भगवान् के सभी श्रीविग्रहों को विविध वस्त्रालङ्कारों से विभूषित सुसज्जित अलंकृत किया ही जाता हैं। भूषणों की ही बात क्या ? गुणों का भी तो यही हाल है । प्रभु स्वयं कहते हैं कि—'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम् ।' मुझ निरपेक्ष निर्गुण को गुण ही भजते हैं । जैसे प्रभु के मुकुट, किरीट, कुण्डल, कौस्तुभादि अलङ्कार जन्मजन्मान्तरों की तपस्याओं से प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्ध जोड़कर धन्य धन्य होते हैं । वैसे ही गुण भी तपस्याओं के द्वारा प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्धित होकर धन्य धन्य होते हैं । क्योंकि जैसे सीमित सौन्दर्यवाले व्यक्ति में ही अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान हो सकता है। निःसीम सौन्दर्य में अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान नहीं हो सकता है। वैसे ही गुण भी सातिशय महत्त्ववाले स्वाश्रय में महत्त्वातिशय का आधान कर सकते हैं । सीमित आनन्दवाले में आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं । परन्तु जिसका निःसीम स्वाभाविक महत्त्व तथा निःसीम स्वाभाविक आनन्द है उसमें गुण किस प्रकार महत्त्वातिशय या आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं ? अनर्थ-निवर्हण भी गुण वहीं कर सकते हैं जहाँ अनर्थ की सत्ता हो, भगवान् तो नित्य निरस्तसमस्तानर्थ- सत्ताक हैं । वे ब्रह्म निरतिशय बृहत् हैं । अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्मपद से तो निरतिशय निरुपाधिक देश, काल और

वस्तुपरिच्छेद से रहित वृहत् ब्रह्म वस्तु ही बोधित होती है और वे निरतिशयानन्दस्वरूप हैं। फिर प्राकृत या अप्राकृत कोई भी गुण महत्त्वातिशयाधान द्वारा या अनर्थनिवर्हण द्वारा भगवान् में कैसे सार्थक हो सकते हैं। तो भी गुण जन्म- जन्मान्तरों की तपस्याओं एवं उपासनाओं द्वारा प्रभु से सम्बन्धित होते ही हैं। तुलसी के मानस में भी काव्यगुणों की कमी नहीं है। एतावता भी उसकी उद्देश्यपूर्ति में बाधा नहीं पड़ी। फिर वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि के काव्यगुणों से भगवान् के स्वरूप का आवरण कैसे होता है ? अतः व्यर्थ ही यहाँ वाल्मीकि, व्यास, भवभूति और कालिदास के काव्यों एवं तुलसी के-“गिराग्राम्य सियराम जस” के तारतम्य वर्णन का प्रयास किया गया है। तुलसी स्वयं जिन्हें पूज्य और वन्दनीय मानते हैं, उनके विरुद्ध तुलसी की पंक्तियों को जोड़ना धृष्टता ही नहीं, अक्षम्य अपराध भी है। यह कथन नितरां असङ्गत है कि “भूतभावन शिव और तुलसीदास दोनों की दृढ़ मान्यता है कि श्रीराम एक व्यक्ति न होकर साक्षात् ईश्वर हैं। इसी लिए व्यक्ति के इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।” क्योंकि यह बात शिवजी एवं तुलसी की ही क्यों वसिष्ठ, वाल्मीकि और व्यास को भी यही सम्मत था। लेखक तो केवल तुलसी के मानस के अनुसार तुलसी और शिव के सम्बन्ध में राय प्रकट कर सकता है। अलग से तो शिवजी की मान्यता के सम्बन्ध में उसके पास कोई प्रमाण ही नहीं है। यदि इतिहास और पुराणों के आधार पर कुछ कहेगा तो वह इतिहास-पुराणों का ही मत समझा जायगा। वस्तुतः यदि तुलसी के ही कथनानुसार तुलसी की बात मान्य है तब उसी तरह कबीर, सूर, नानक आदि की मान्यताएँ ठहरेंगी। उस स्थिति में मानस की कोई विशेषता नहीं सिद्ध होगी। वस्तुतः बेसिरपैर की निराधार ' कल्पनाओं की अपेक्षा तुलसी के अनुसार उनके मानस का आधार नानापुराणनिगमागम ही है। तुलसी की परम्परा और उनके मूल शिव का भी आधार नानापुराणनिगमागम ही है। प्रत्यक्ष में भी सहस्रों चौपाइयों का आधार अध्यात्मरामायण एवं श्रीभागवत में ज्यों का त्यों मिलता है। वाल्मीकिरामायण को वे स्वयं महान् सेतु मानकर उसी के आधार पर चलनेवाली पिपीलिका के समान अपने आपको मानते हैं। वेद, वाल्मीकिरामायण और व्यास के पुराण डङ्के की चोट पर इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत करते हैं। “एक व्यक्ति जन्म लेकर कुछ वर्षों के पश्चात् मृत्यु का ग्रास बन जाता है। उसके जीवन में जो घटनाएँ घटती हैं, उन्हीं को इतिहास में रखा जाता है। व्यक्ति पुनः उसी रूप में लौट कर पृथिवी पर नहीं आ सकता।” यह कोई वेदाज्ञा या राजाज्ञा नहीं। ‘इति ह आस ऐतिह्य’ यही इतिहास है। वेद में भी इतिहास है। ‘इतिहासः पुराणम्’ बृहदारण्यकोपनिषद्, उर्वशी-पुरूरवा-संवाद, यम-यमीसंवाद, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीसंवाद, याज्ञवल्क्यगार्गीसंवाद इतिहास है। परन्तु वेद अनादि हैं—‘अनादिनिधना नित्या’ (म० भा० शा० २३३।२४), ‘वाचा विरूपनित्यया’, ‘अतएव च नित्यत्वम्’ (ब्र० सू० १।३।२९) इत्यादि वैदिक प्रमाण स्पष्ट हैं। यहाँ घटना के अनन्तर इस इतिहास का उल्लेख नहीं हुआ। वेद और मनु के अनुसार वेदशब्दों के अनुसार सृष्टि होती है। यही बात “शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से कही गयी है। ऐसे इतिहास नित्य इतिहास कहे जाते हैं। जैसे सामान्य नियम है कि कोई देहधारी नित्य नहीं होता। किन्तु राम, कृष्ण आदि के शरीरों के सम्बन्ध में यह अपवाद है। उनके शरीर नित्य हो सकते हैं। उसी तरह सामान्य ऐतिहासिक व्यक्ति उत्पन्न और नष्ट होने-

७६८ रामायणमीमांसा एकविंश वाले होते हैं । वे फिर लौटकर नहीं आते, किन्तु वैदिक तथा रामायण और महाभारत, पुराण आदि के अनुसार श्रीराम, कृष्ण आदि ऐतिहासिक होते हुए भी नित्य हैं । वे ईश्वर के अवतार हैं, साक्षात् ब्रह्म ही हैं । यह सब उन्हीं ग्रन्थों से सिद्ध है । साथ ही यह भी सिद्ध है कि वे बार-बार लौटकर भी आते ही हैं । वेद में घटनाओं के अनुसार आख्यान नहीं होते, किन्तु आख्यानों के अनुसार घटनाएँ होती हैं । अतएव वाल्मीकिरामायण पूर्व वर्णित होने पर भी तदनुसार अवतार घटना सम्पन्न हुई थी । ‘कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं।’ ( रा० मा० १।१३९।१ ) यह भी वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों से ही सिद्ध है । केवल तुलसी की वाणी ही प्रमाण नहीं हो सकती है । तुलसी तो क्या कृष्ण साक्षात् परब्रह्म ही थे, फिर गीता केवल उनकी वाणी होने से ही प्रमाण नहीं मानी जाती । किन्तु वह उपनिषद्रूप गायों का दुग्ध है । कृष्ण उसके दोग्धा हैं— “सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।” इसलिए वेदमूलक होने से ही उसका प्रामाण्य है । बुद्ध भी भगवान् ही थे । फिर वेदनिन्दा के कारण वे स्वयं निन्दित हो गये । उनकी वाणी का प्रामाण्य वैदिक जनों में मान्य नहीं है । यह तुलसी का मत है— “जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ।” “विभिन्न रामायणों के घटनाक्रमों में बिलगाव क्यों ? इसका उत्तर इतिहास की दृष्टि से प्राप्त नहीं होता है । इसके स्पष्टीकरण के लिए गोस्वामीजी ने लीला शब्द का आश्रयण किया है ।” परन्तु यह कहना निरर्थक है क्योंकि लीला शब्द भी तुलसी का अपना नहीं है । यह भी व्यास के पुराणों का ही शब्द है— “लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्” ( ब्र० सू० २।१।३३ ), “लीलावतारचरितं पुरुषोत्तमस्य ।” मन्त्र, ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं और उपनिषद् भी वेद हैं । रामतापनीय उपनिषद् में भी रामचरित्र वर्णित है । उसमें भी इतिहास के रूप में रामचरित्र का वर्णन है और उसमें राम का परात्पर ब्रह्मरूप से ही वर्णन किया गया है । मन्त्रों में भी रामचरित्र तथा अयोध्या आदि का वर्णन है । किं बहुना, राम परमेश्वर हैं और शाश्वत हैं । वे लीलाविग्रह धारण करते हैं । यह भी इतिहास है । राम की ब्रह्मरूपता और अवतरण यह सब वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवतादि पुराणों से ही सिद्ध हैं । “भगवान् शङ्कर के द्वारा रचित रामचरितमानस के रचनाकाल के विषय में मेरी सुनिश्चित धारणा है कि वह श्रीराम के अवतार के पूर्व ही निर्मित हुआ है । इसके समर्थन के लिए भगवान् शङ्कर की त्रिकालज्ञता की दुहाई नहीं देना चाहूँगा । भगवान् शङ्कर ने सारे रामचरित्र को लीला नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है । इतिहास व्यक्ति के बाद लिखा जाता है । किन्तु नाटक तो लिखे जाने के पश्चात् ही खेला जाता है । भगवान् शिव ने रामचरितमानस के रूप में एक महानाटक की रचना की और त्रेतायुग में अवतरित होकर भगवान् राम ने उसे विश्वरङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किया ।” यह सब भी कोई नयी बात नहीं है । ‘लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्’ के अनुसार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के निर्माण की घटना भी परमेश्वर की लीला ही है । फिर उनका ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में प्रकट होना भी लीला ही है । यह केवल तुलसी की ही मान्यता नहीं है । तुलसी ने तो पुरानी मान्यता को ही दुहराया है ।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६९ भगवान् के चरित्र का सम्यग् ज्ञान प्राप्त करने के लिए त्रिकालज्ञता की दुहाई की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती है। इसी लिए तो भले वाल्मीकि राम के समकालिक भी हों तो भी वे सुनी सुनायी बातों के आधार पर रामायण लिखते तब तो सीता-चरित्र के सम्बन्ध में भी उन्हें वैसी ही बात लिखनी पड़ती जैसी कुछ भ्रान्त जनों की धारणा थी । परन्तु उन्होंने तो ब्रह्मा के आज्ञानुसार समाधि द्वारा अतीत, अनागत और वर्तमान सब चरित्रों का साक्षात्कार करके ही रामायण ग्रन्थ लिखा था और उनके अनुसार भी वह इतिहास भी है और लीला भी है। महानाट्य-निर्माता को भी त्रिकालज्ञ नहीं तो अतीतज्ञ तो होना ही चाहिये, क्योंकि नाट्य भो किसी ऐतिहासिक आधार पर ही होता है। भरत मुनि के अनुसार यही नाटक का रूप होता है। 'सति कुड्ये चित्रोल्लेखः' भित्ति होने पर ही चित्र का निर्माण होता है। अतः इतिहासप्रसिद्ध राम के आधार पर श्रीराम का नाटक लिखा जा सकता था। यदि ऐतिहासिक राम भिन्न हैं और उनका अनुकरण करनेवाले राम उनसे भिन्न हैं। तब दशरथ-सुत से भिन्न कोई राम हैं ? पार्वती के इस प्रश्न से शिवजी को क्षोभ क्यों होता । फिर तो जैसे अभिनेता जिसका अभिनय करता है उससे भिन्न होता है। उसी तरह दशरथनन्दन राम का अभिनय करनेवाले राम स्पष्टतः उनसे भिन्न ही होंगे। उस स्थिति में "रघुकुलमणि सोइ स्वामि मम" इस कथन का क्या अर्थ रह जायगा । फिर त्रेतायुग में अभिनेता राम ने उस नाट्य का अनुसरण दशरथगृह में ही जन्म लेकर क्यों किया ? नाटक में तो स्पष्टतः अभिनेय से अभिनेता भिन्न ही होता है। फिर आज के अभिनेता भी तो वैसे ही अभिनेय से भिन्न हैं। उनमें क्या भेद होगा ? श्रीशिवजी तो रघुपति चरित ही का वर्णन करते हैं— "रघुपति चरित महेश तब हरषित वरनै लीन ।" (रा० मा० १।१११।४) चरित शब्द भी इतिहास का बोधक है। सतीजा का प्रश्न रघुपति-कथा प्रसङ्ग का ही है— "पूछउ रघुपति कथा प्रसङ्गा ।" (रा० मा० १।१११।४) "तुम्ह रघुवीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रश्न जगतहित लागी ॥" (रा० मा० १।१११।४) "बरनहुँ रघुपति बिसद जस श्रुतिसिद्धान्त निचोरि ।" (रा० मा० १।१०९) श्रीशिवजी ऐतिहासिक राम और सर्वव्यापी राम की एकता का ही वर्णन करते हैं— "पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ ॥" (रा० मा० १।११६) जो प्रसिद्ध पुरुष पुरुषोत्तम हैं, जो प्रकाशनिधि हैं, जो परावरनाथ हैं वही रघुकुलमणि मेरे स्वामी हैं। संस्कृत में 'सोऽयम्' वही यह इस प्रत्यभिज्ञा के द्वारा 'स एव अयम्' इन दोनों पदार्थों की एकता का बोध कराया जाता है। ऊँचे से ऊँचे वेदान्तवेद्य ब्रह्म के रूप का निरूपण करके शिवजी उसको अवधपति कहते हैं। "सब कर परम प्रकाशक जोई। राम अनादि अवधपति सोई ॥" (रा० मा० १।११६।३) "जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरजा सोइ कृपालु रघुराई ॥" (रा० मा० १।११६।२) "बिन पद चले सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बक्ता बड़ जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहे घ्रान बिनु बास असेषा ॥ अस सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहि बरनी ॥" (रा०मा० १।११७।३,४) ९७

७७० रामायणमीमांसा एकविंश "जेहि इमि गावहिं बेद जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान ॥" (रा० मा० १।११।८) याद रहे कि रघुकुलमणि, अवधपति, रघुराई, दशरथनन्दन, कोशलपति आदि सभी शब्द ऐतिहासिक हैं— "सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुवर सब उर अंतरयामी ॥" (रा० मा० १।११०।१) इसमें स्पष्ट ही रघुवर को अन्तरयामी कहा गया है । "भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती।" (रा० मा० १।११८।४) इतना ही नहीं, जो ऐतिहासिक रघुपति राम से पृथक् किसी सर्वव्यापी राम को मानते हैं उनका निरा- करण करते हुए शिवजी स्वयं कहते हैं। एक बात तुम्हारी हमको अच्छी नहीं लगी । यद्यपि तुमने मोह के वश होकर ही वैसा कहा था। तुमने जो यह कहा था कि वह राम दशरथसुत राम से कोई अन्य हैं। जिनका मुनि ध्यान करते हैं। भगवान् श्रीराम शाश्वत हैं इसमें दो मत नहीं हैं। फिर भी रघुकुलमणि रघुवंशभूषण, दशरथ- नन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन, दशरथ-अजिरविहारी और अवधेश उनके असाधारण नाम हैं और रघुकुल, दशरथ, कौसल्या आदि की ऐतिहासिकता का अपलाप करना सर्वथा असङ्गत ही है। शाश्वत सिद्ध करने की धुन में इन नामों का अपलाप भी अनभिज्ञता ही होगी। फिर तो श्रीराम को आधुनिकतम बनाने की दृष्टि से श्रीराम के हाथ से धनुष-बाण हटाकर उनके हाथ में बन्दूक, तोप, परमाणु बम और हाइड्रोजन बम देना पड़ेगा। धनुष-बाण आदि तो पुराने जमाने की वस्तुएँ हैं। अतः यही मानना युक्त है कि भगवान् अनादि होते हुए भी ऐतिहासिक हैं और ऐतिहासिक होते हुए भी शाश्वत हैं। जैसे भगवान् का पञ्चायतन श्रीविग्रह नित्य है। वैसे ही उनके लीलापरिकर भी नित्य ही हैं। धाम भी नित्य हैं। इस दृष्टि से अयोध्या, दशरथ, कौशल्या आदि भी नित्य ही हैं। श्रीराम तथा सभी अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य हैं। अतः ऐतिहासिक होने से उनमें जरा, मरण आदि की कल्पना करना भी अनभिज्ञता है। भगवान् के जन्म और कर्म का चिन्तन भवबन्धन काटने का परम उपाय है। कहा जाता है— "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह । जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह ॥" (वा० रा० १।१२१) कहा जाता है कि सती वृन्दा का व्रत भगवान् विष्णु ने छलपूर्वक नष्ट किया। जब उसने इस रहस्य को जाना तब उसने क्रुद्ध होकर शाप दिया। भगवान् ने केवल वृन्दा को ही पातिव्रत से च्युत किया, इतना ही नहीं, अपितु रामचरितमानस में ही ब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ देवर्षि नारद को अपनी विश्वमोहिनी माया के द्वारा वासना- भिभूत कर दिया। नारद को ब्रह्मचर्य से च्युत करना अथवा वृन्दा के पातिव्रत को नष्ट करना वस्तुतः एक ही सत्य को प्रकट करता है। देवर्षि का ब्रह्मचर्य यदि उन्हें अहङ्कारी बनाकर असुर बनने की प्रेरणा देता है तो ऐसे ब्रह्मचर्य को विनष्ट कर देना ही नारद के लिए और लोक के लिए परम कल्याणकारी था।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७१ कामजय के पश्चात् जहाँ देवर्षि अहङ्कार में उन्मत्त हो उठते हैं, वहाँ कामग्रस्त होने के पश्चात् भगवान् के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी त्रुटि स्वीकार करते हैं। पतिव्रता वृन्दा का व्रत नष्ट करना भी इसी सत्य को प्रकट करने के लिए था। निष्ठा का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि व्यक्ति अपनी उस शक्ति के द्वारा अधर्म को अमर बनाने की चेष्टा करे। निष्ठा का केन्द्र भी व्यक्ति नहीं आदर्श को ही होना चाहिये। जब तक दोनों का समन्वय नहीं होगा तब तक ऐसा धर्म किसी व्यक्ति के अहं को, उसके गौरव को प्रतिष्ठापित तो कर सकता है, किन्तु उस व्यक्ति का वह धर्म लोकमङ्गल के लिए घातक सिद्ध होता है। निष्ठा का वास्तविक तात्पर्य सर्वव्यापक ब्रह्म को एक केन्द्र से अभिव्यक्त करना चाहिये। जब पतिव्रता पति के प्रति निष्ठावती बनती है तब इसका अभिप्राय पति में ईश्वर का साक्षात्कार करना है। यदि पति के प्रति ऐसी पूर्णता की भावना पतिव्रता के मन में न हो तब उसके लिए निष्ठा का निर्वाह असम्भव है। यदि व्यक्ति किसी आराध्य के चित्र को सामने रखकर पूजा कर रहा हो और उसी का आराध्य देव आकर द्वार खटखटाने लगे तब क्या पुजारी चित्र की पूजा ही करता रहे, अथवा उठकर आराध्य का स्वागत करे ? निष्ठा की अन्तिम परिणति ईश्वर की उपलब्धि है। वृन्दा ने जिसे अपने पातिव्रत की च्युति मान लिया था वस्तुतः वह उसकी निष्ठा की सच्ची सार्थकता थी। इसी लिए वृन्दा तुलसी के रूप में परिणत हो गयी और भगवान् विष्णु शालिग्राम के रूप में तुलसी को मस्तक पर धारण करते हैं। विष्णु ने वैसा करके पतिव्रता को अतुल गौरव प्रदान किया। तुलसी के रूप में अपनी सङ्गिनी बनाकर वृन्दा को भी इस सत्य का साक्षात्कार करा दिया कि निष्ठा का चरम लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार है। निष्ठा साधन है साध्य नहीं। पातिव्रत की शक्ति जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से प्रेरित हो जिस व्यक्ति का जीवन समाज के लिए घातक हो उस समय धर्म और अधर्म के सूक्ष्म विवाद का अवसर आता है। वहाँ पतिव्रता की शक्ति का दुरुपयोग हो रहा था। ऐसी स्थिति में धर्म अधर्म का कवच बनकर उसे अनिष्ट से बचाने की चेष्टा करता है। युद्ध में योद्धा पर विजय प्राप्त करने के लिए कवच को नष्ट करना ही पड़ता है, क्योंकि कवच व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है। जब धर्म अधर्म के लिए कवच का कार्य करे तो उस समय धर्म पर प्रहार न करने से अधर्म ही विजयी होता है। ऐसा धर्म जो अधर्म के विजय में सहायक हो, जो धर्म को ही नष्ट करने में सहायता दे तो क्या उसे धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये ? जालन्धर की मृत्यु से अगणित स्त्रियों के पातिव्रत का रक्षण हुआ है। अतः लोकधर्म की रक्षा के लिए एक व्यक्ति की निष्ठा को मिटाना आवश्यक ही था। उक्त समाधान बहुत अंशों में ठीक हो सकता है। परन्तु इसपर भी सूक्ष्म विचार आवश्यक है। कई लोग तो इसी कारण कहते हैं कि वह विष्णु जो वृन्दा का पातिव्रत नष्ट करता है, ईश्वर ही नहीं है। वह कोई विषयी जीव था। इसी लिए उनकी दृष्टि में पुराणों पर अधिक विश्वास करना ही उचित नहीं है। इतना ही नहीं वे शास्त्रप्रामाण्य केवल व्याकरण तक ही सीमित मानते हैं। “शब्दप्रमाणका वयं तस्माद् यदाह शब्दः तदेव नः प्रमाणम्” परन्तु उनका उक्त कथन भ्रमपूर्ण है। महाभाष्य से भी अधिक प्राचीन और प्राणभूत गीता तो हर एक कार्य और अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र को ही प्रमाण कहती है। उसकी दृष्टि में शास्त्रविधि को छोड़कर मनमानी चेष्टा करनेवाले को सिद्धि, सुख, परागति इनमें कुछ भी नहीं मिलता है—

७७२ रामायणमीमांसा एकविंश “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” (गीता १६।२३,२४) यदि वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य स्वीकृत न होगा तो विष्णु, जालन्धर, वृन्दा आदि का अस्तित्व भी सिद्ध न हो सकेगा । यह नहीं हो सकता कि मुर्गी का आधा हिस्सा पकाकर खा लें और आधा भाग अण्डा देने के लिए छोड़ दें । शास्त्र के एक अंश को मान लें और अन्य अंश को छोड़ दें । नितरां स्थिति को ही निष्ठा कहा जाता है । सब निष्ठाओं का पर्यवसान भगवान् में नहीं होता । अधर्मनिष्ठा प्राणी को नरक ही ले जाती है । काम्यकर्मनिष्ठ प्राणी को स्वर्गादि में पहुँचाती है । भक्ति, ज्ञाननिष्ठा तथा निष्काम शास्त्रोक्त कर्मनिष्ठा साक्षात् या परम्परा से ब्रह्मप्राप्ति में हेतु होती है। नारद की ब्रह्मचर्यनिष्ठा का कोई दोष नहीं था । दोष था अहङ्कार का । यदि किसी को भक्त होने का अहङ्कार हो तो उससे भी हानि ही होती है । भगवान् ने देवर्षि नारद के ब्रह्मचर्यव्रत को नष्ट नहीं किया था, किन्तु नष्ट होने से बचाया था । यदि विवाह हो जाने दिया जाता तो देवर्षि का ब्रह्मचर्य भङ्ग हो जाता । जैसे कुपथ्य मांगनेवाले रोगी को कुपथ्य न देकर हितैषी उसकी रक्षा ही करता है । वैसे ही भगवान् ने नारद की कुपथ्यसम्बन्धी माँग को न देकर उनकी ब्रह्मचर्यनिष्ठा की रक्षा की थी । परन्तु शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अधर्म प्रतीत होने पर भी धर्म ही होते हैं । जैसे झूठ बोलना पाप, सत्य बोलना धर्म है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध है— “सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप ।” “अश्वमेधसहस्रञ्च सत्यञ्च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥” सहस्रों अश्वमेधों की अपेक्षा एक सत्य ही श्रेष्ठ होता है, फिर अगर उसी सत्य से किसी गाय या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो वह सत्य ही पाप है । वहाँ वैसी गोहत्या और ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ ही बोलना उचित है । किसी महात्मा के सामने से कोई गाय या सन्त एवं सज्जन ब्राह्मण भागकर जङ्गल में छिप गया हो और उसका पीछा करनेवाला हत्यारा (घातक) आकर उसके सम्बन्ध में पूछ-ताछ करता है तो महात्मा को चाहिये कि यदि मौन रहने से काम चल जाता हो तो मौन रहकर वैसे सज्जनों के प्राण बचाने चाहिये । परन्तु यदि मौन रहने में घातकों के उस मार्ग से अपने शिकार के पास पहुँच जाने का सन्देह पैदा होता हो तो झूठ बोलकर भी उनकी रक्षा करनी चाहिये । “येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ॥ अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथञ्चन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन् वाऽप्यकूजनात् ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।” (म० भा० शा० प० १०९।१४, १५) जो चोर, डाकू आदि अन्याय से किसी का धन लेना चाहते हैं। उन्हें धनिक का पता नहीं बताना चाहिये । जो दान, भिक्षादि द्वारा धन लेना चाहते हैं । उन्हें बताने में कोई दोष नहीं है। इतना ही नहीं यदि मौन

रहने से काम चल जाय तो मौन रहना ठीक है। यदि मौन से साधु पुरुषों की रक्षा नहीं होती हो, न बोलने से शङ्का होती हो और अवश्य बोलना पड़े तो झूठ बोलकर भी सत्पुरुषों का बचाव करना चाहिये । “यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथादपि । न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथञ्चन ॥ पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।” (म० भा० शान्ति प० १०९।१६,१७) झूठी शपथ द्वारा भी दुष्टों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिये । यहाँ सत्य की अपेक्षा झूठ ही श्रेष्ठ है, क्योंकि दुष्टों को दिया हुआ धन दाता को भी पीड़ा ही पहुँचाता है। “मा हिंस्यात्” इस वेदवचन से निषिद्ध होने के कारण यद्यपि हिंसा अधर्म है तथापि “अग्नीषोमीयं पशुमालभेत” के अनुसार क्रतु के उपकार के लिए की गयी हिंसा धर्म ही है। यह सब “अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्” ( ब्र० सू० ३।१।२५ ) में स्पष्ट है। कहीं सत्य कहीं अनृत ही बोलना चाहिये। जहाँ अहिंसा के कारण अनृत सत्य हो जाता हो और हिंसा के कारण सत्य अनृत हो जाता हो, जहाँ सत्य अहिंसा, उपकार आदि में पर्यवसित न होता हो उस स्थल में मूढ़ सत्यवादी भी बाधित होता है। सत्य और अनृत का यथावत् जाननेवाला धर्मतत्त्वज्ञ होता है। इसी आधार पर अकृतप्रज्ञ अतिदारुण अनार्य भी उसी तरह महान् पुण्य का भागी होता है जैसे वलाक सब प्राणियों के वधार्थ उद्यत अन्ध घ्राणचक्षु के वध से पुण्य का भागी हुआ था। इसमें आश्चर्य क्या है ? धर्म की कामनावाला भी सत्यवादी अधर्म निश्चय के कारण डाकुओं एवं गोघातकों को साधुओं एवं गायों का पता बताकर पाप का भागी हुआ था। तत्त्वज्ञ उसी प्रकार पुण्य का भागी होता है, जैसे गङ्गातीर में सर्पिणी के अण्डों को नष्ट करके उलूक पुण्य का भागी हुआ था— “भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् । यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिश्चितम् । सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ।। अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः । सुमहत् प्राप्नुयात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ।। किमाश्चर्यञ्च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् । सुमहत्प्राप्नुयात्पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ।।”(म०भा० राजधर्मानुशासनपर्व १०९।५-८) वस्तुतः प्राणियों में प्रभव के लिए अर्थात् अभ्युदय, अहिंसा, अपीडन और धारण के लिए ही धर्म का प्रवचन किया गया है। अतः व्यापक रूप से प्राणियों का अभ्युदय, अपीडन और संरक्षण जिससे होता है, वह चाहे सत्य हो चाहे असत्य, किन्तु वही धर्म है। यद्यपि अहिंसा और सत्य दोनों ही शास्त्रविहित हैं तथापि अहिंसाविरोधी सत्य अग्राह्य है। इसी लिए गीता ने हित, मित, प्रिय और सत्य भाषण को ही सत्य कहा है, केवल सत्य को नहीं— “प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यात्प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मेण विधृताः प्रजाः । यः स्याद्धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यादहिंसासंपृक्तः स धर्मं इति निश्चयः ।।"

७७४ रामायणमीमांसा एकविंश जहाँ सत्य निरपराधों का संरक्षक न होकर उनके नाश का कारण बनता हो वह धर्म नहीं है ! इसी दृष्टि से यदि किसी एक स्त्री के पातिव्रत से सुरक्षित जालन्धर लाखों स्त्रियों का पातिव्रत्य-भङ्ग करता हो और शिव की पार्वती को अपनी पत्नी बनाने का प्रयत्न करता हो और संसार में हिंसा का विस्तार कर के सम्पूर्ण वैदिक धर्म-कर्म को नष्ट कर के लोक का उत्सादन करता हो और जिस पातिव्रत्य के कारण शिवजी के लिए भी अजेय बना हो उस एक स्त्री के पातिव्रत्य का भङ्ग करना धर्म ही है अधर्म नहीं, क्योंकि उससे लाखों का पाति- व्रत्य बचेगा, लाखों की जानें बचेंगी । वेदोक्त धर्म-कर्म की रक्षा होगी । उससे उस अन्यायी असुर का विनाश होगा जिसके द्वारा अहिंसा, धर्म, न्याय और संसार की रक्षा को खतरा उत्पन्न हुआ है । अधर्म का बचाव करनेवाले कवच- रूपी धर्म का विनाश करना ही उचित है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसमें वृन्दा का क्या दोष है ? जो दोष है वह जालन्धर का है । वृन्दा तो अपना धर्म पालन करती है । पति को परमेश्वर मानकर पूजती है । यही उसका धर्म है । उस अपने इष्ट की रक्षा करना भी उसका कर्त्तव्य ही है । पर उसका उद्देश्य अधर्म, हिंसा या व्यभिचार फैलाना तो नहीं है । पर जिस किसी तरह से भी हो चाहे न चाहे उसके पातिव्रत्य से उसका अत्याचारी हिंसक जब अपरिगणित पतिव्रताओं का पातिव्रत्य नाशक असुर अमर होता है, अवध्य होता है तो उसके मूलभूत एक पातिव्रत्य का कोटि-कोटि पातिव्रत्यों की रक्षा के लिए ध्वंस होना ही उचित है । लाघव और गौरव की दृष्टि से भी यही धर्म है । फिर भी जैसे अनधिकृत व्यक्ति द्वारा हत्यारे की भी हत्या पाप ही है । हत्यारे की हत्या करनेवाला अन- धिकृत व्यक्ति भी मृत्युदण्ड पाता है । राजा ही दण्ड देने का अधिकारी होता है । उसके द्वारा नियुक्त अधिकृत व्यक्ति ही हत्यारे को प्राणदण्ड दे सकता है, अन्य नहीं । इसी तरह कर्मफल दाता भगवान् विष्णु ही हैं । वे ही लाखों के पातिव्रत्य के रक्षणार्थ, लोकरक्षणार्थ तथा धर्मरक्षणार्थ एक वृन्दा का पातिव्रत्य-भङ्ग कर सकते हैं और वृन्दा को पातिव्रत्य धर्म का सर्वोत्कृष्ट फल भी प्रदान कर सकते हैं । आखिर सभी धर्मों का अन्तिम परमफल तो भगवत्प्राप्ति ही है । भगवान् ने सीधे उसके धर्म का हरण करके उसके धर्म का परमफल भगवत्प्राप्ति उसे सुलभ करा दिया । शास्त्रों के अनुसार जैसे विष्णु, विष्णुप्रतिमा शालग्राम की पूजा करते करते प्राणी विष्णु की प्राप्ति कर लेता है वैसे ही स्त्री परम मुख्य पति विष्णु की प्रतिमास्वरूप लौकिक पति की पूजा करते करते परम मुख्य पति विष्णु को प्राप्त कर लेती है । विवाह में वर को विष्णुरूप मानकर उसे लक्ष्मीरूपा कन्या का प्रदान किया जाता है । वैसा ही संकल्प पढ़ा जाता है—"इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे" । इस स्थिति में जैसे विष्णु-प्राप्ति होने पर शालग्राम की पूजा का छूट जाना कोई दोष नहीं है उसी तरह परमपति विष्णु की प्राप्ति में वृन्दा का जालन्धरसम्बन्धी पातिव्रत्य-भङ्ग हो जाना कोई दोष नहीं है, क्योंकि उसका फल उसे प्राप्त हो गया । भगवान् शङ्कराचार्य के अनुसार और तुलसी के अनुसार ईश्वर जीव का सम्बन्ध वारिवीचिसम्बन्ध जैसा ही है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) "सो तैं ताहि तोहि नहि भेदा । बारि बीचि जिमि गावहि बेदा ॥” (रा०मा० ७।११०।३) हे नाथ ! यद्यपि हमारा आपका भेद नहीं है तथापि मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं । जैसे समुद्र का तरङ्ग कहा जाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहा जाता है । वह तू है उसमें तुझमें भेद नहीं है । भेद वैसा ही है जैसा वारि और वीचि का भेद है ।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७५ इस दृष्टि से विष्णु सच्चिदानन्द-समुद्र हैं । अनन्तानन्त जीव उनकी अनन्तानन्त तरङ्ग ही हैं । अतएव वे भी चेतन, अमल, सहजसुखराशि हैं । संसार के सभी जीव तरङ्ग ही हैं । पति, पुत्रादि जीव का आपसी सम्बन्ध वैसा ही है जैसे तरङ्गों का आपसी सम्बन्ध । एक तरङ्ग का अपर तरङ्गों के साथ सम्बन्ध स्थायी नहीं होता है । तरङ्गों के समान ही संयोग-वियोग होता ही रहता है । जैसे चौराहे के प्याऊ पर चारों तरफ से राहगीर आकर इकट्ठे होते हैं । आपस में मेलजोल और प्रेम की बातें करते हैं । फिर अपने-अपने रास्ते सब चले जाते हैं । किसी का कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं होता । “कति नाम सुता न लालिताः कति वा नेह वधूरभुञ्जि हिं । क्व नु ते क्व नु ताश्च के वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः ॥” कितने पुत्रों का लालन-पालन नहीं किया, कितनी ही वधुओं का सम्बन्ध नहीं किया । परन्तु आज कहाँ वे सब हैं कहाँ हम हैं । निश्चित भवसङ्गम पान्थ-सङ्गम ही है । नदी की बाढ़ में इधर-उधर से आकर काष्ठ मिल जाते हैं । कुछ दूर तक मिले भी रहते हैं । परन्तु प्रवाह के थपेड़ों से सब पुनः विभक्त होकर बह जाते हैं । वैसे ही जीव कर्मों के अनुसार पति-पत्नी आदि रूप से मिल जाते हैं— “यथा काष्ठञ्च काष्ठञ्च समेयातां महोदधौ । संयुज्य च व्यपेयातां तद्वज्जीवसमागमः ॥” परन्तु किसी भी हालत में तरङ्ग का जैसे जल के साथ वियोग नहीं होता है, उसी तरह जीवों का परमेश्वर के साथ वियोग नहीं होता । अतएव जीवों के सच्चे सङ्गी-साथी परमेश्वर ही हैं । जीव नहीं । मुख्य पति- पत्नी का सम्बन्ध भी वारि-वीचि जैसा ही है । “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीतारामपद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) सीता और राम का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा गिरा एवं अर्थ का तथा जल एवं वीचि का । इस दृष्टि से सब तरङ्गरूप जीवों के परम पति समुद्रस्वरूप भगवान् ही हैं । उनमें मुख्य निष्ठा ही मुख्य पातिव्रत्य है । उन्हें छोड़कर अन्य जीवों से सम्बन्ध जोड़ना ही पातिव्रत्य-भङ्ग है । इस तरह लौकिक पातिव्रत्य धर्म है तो परम परमेश्वर के साथ अखण्डसम्बन्ध-निष्ठारूप परम पातिव्रत्य परम धर्म है । इस तरह वृन्दा के. लौकिक पातिव्रत्य को भङ्ग कर के जहाँ भगवान् ने जालन्धर का वध कराकर अगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य और लोक की रक्षा की वहीं वृन्दा को परम पातिव्रत्यरूप परम धर्म प्रदान कर उसे कृतार्थ कर लोकोत्तर पद प्रदान किया । बड़े बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र जिस भगवान् से प्रेम की भीख माँगते हैं वही भगवान् वृन्दा से प्रेम की भीख माँगते हैं । वृन्दा के लिए पागल होकर अपने लौकिक पति के साथ भस्मीभूत वृन्दा की चिता की भस्म में महीनों लोटते रहे । इसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया है कि भगवान् प्रेमास्पद ही नहीं, किन्तु प्रेमाश्रय भी हैं । जैसे भगवान् से मिलने के लिए भक्त लालायित होते हैं वैसे ही भगवान् वृन्दा से मिलने के लिए लालायित होते हैं । यहाँ तक कि छल-छद्म से भी वृन्दा की प्राप्ति के लिए सचेष्ट होते हैं । उसके प्रेम न करने पर भी उससे प्रेम करते हैं । उसके शाप देने पर भी उसके शाप को अङ्गीकार कर के शालग्राम शिला बनकर भी तुलसी का वियोग नहीं सहन कर सकते । हजारों व्यञ्जन समर्पण करने पर भी तुलसी बिना कोई नैवेद्य ग्रहण नहीं करते हैं ।

७७६ रामायणमीमांसा एकविंश तुलसी के पातिव्रत्य धर्म से ही सन्तुष्ट होकर अथवा उसके जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों एवं भक्ति-भावनाओं के वशीभूत होकर ही भगवान् तुलसीरूप में भी वृन्दा को अपनाते हैं। उसके रूपसौन्दर्य या यौवन के वशीभूत होकर नहीं। सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी जिसकी दासी है। सौन्दर्य-माधुर्य सारसर्वस्व राधारानी जिसकी अनन्य आराधिका है। अनन्त अनन्त लक्ष्मीरूप गोपाङ्गनाएँ जिसके पीछे पीछे पागल हुई भटकती हैं, उसे वृन्दा के रूप और यौवन की अपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। गोपाङ्गना ऊपर से नन्दरानी के पास गोपाल की शिकायत करने जाती थीं, परन्तु भीतर से चाहती थीं कि कृष्ण हमारे घरों में दधि, नवनीत की चोरी के लिए पधारें और उनकी बाट जोहती थीं। कृष्ण उनसे छाछ मांगते थे। दधि और नवनीत की चोरी करते थे। तभी तो भक्त कहता है कि— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैर्मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु” यह ठीक है कि वेदविहित कर्म पुण्य है और वेदनिषिद्ध कर्म अधर्म है— “वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।” ( भाग० ६।१।४० ) इस दृष्टि से पत्नी का एकपतिनिष्ठ होना शास्त्र विहित है, अतः पातिव्रत्य धर्म है और उत्कृष्ट धर्म है। उसके प्रभाव से सावित्री ने अपने पति को यम के हाथों से लौटा लिया था। उसी के प्रभाव से शाण्डिली ने सूर्योदय रोक दिया था। उसी के प्रभाव से वृन्दा का पति जालन्धर अजेय हो गया था। फिर भी वही विहित कृत्य धर्म है जो अनर्थशून्य हो। वेदविहित भी वही कृत्य धर्म है, जो फलकाल में भी अनर्थ से सम्बद्ध न हो। जो केवल प्रीति का हेतु हो। इसी लिए—‘‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’’ ( जै० सू० १।१।२ ) इस धर्मलक्षणबोधक जैमिनिसूत्र में अर्थ इस पद का संनिवेश है। इसी कारण श्येनादि अनर्थकारण याग अर्थरूप न होने से धर्म नहीं हैं। भट्टपाद ने कहा है कि— “फलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबद्ध्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वात् तद् धर्म इति कथ्यते ॥” फल द्वारा भी जो कर्म अनर्थ से संसृष्ट नहीं होता जो केवल सुख का हेतु हो वही धर्म है। श्येनादि याग का फल है शत्रुमरण। वह अन्त में नरक का हेतु होता है। अतः वह धर्म नहीं है। “नानापुराणनिगमागमसम्मतम् ।” ( रा० मा० १। मङ्गलाचरण ७ ) ‘ तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥ तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोही ।” ( रा० मा० १।१२०।२, ३ ) “अब सुनु परम विमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ।।” ( रा० मा० ७।८५।१ ) आदि अनेक वचनों से तुलसीदासजी वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य वर्णन करते हैं और उनकी सब उक्तियों का परम आधार वेदादि शास्त्र ही हैं। उसके सम्बन्ध में आजकल के वक्ताओं का किन्तु, परन्तु सर्वथा उपेक्षणीय ही है।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७७ वृन्दा "तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्म वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥" तप, अध्ययन, स्वाभाविक वेदविधान-यज्ञ, उञ्छ, शिल आदि वृत्तियाँ सुपुण्य हैं, पाप नहीं। किन्तु वही सब भावदुष्ट होने पर पाप बन जाती हैं। भगवान् राम ने तपस्वियों के तप की रक्षा के लिए दण्डकवन की यात्रा की थी। परन्तु धुन्धु नामक दैत्य महान् तप कर रहा था। वह किसी समुद्र की रेती में विलीन रहकर प्राणायाम करता था। साल, साल के कुम्भक के बाद जब वह रेचक करता था तो धरित्री में कम्प होता था। धरित्री की धूलि चन्द्र, सूर्य को आच्छन्न कर देती थी। पर्वतों में हड़कम्प मच जाता था। समुद्र उद्वेलित हो अपनी उत्ताल तरङ्गों से विश्व को आप्लावित करने लगता था। पर उसके तप का लक्ष्य था शक्तिसम्पन्न होकर वेदादि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम धर्म का विनाश करना। इसी लिए देवता और ऋषि उसके वध के लिए प्रयत्नशील हो धुन्धुमार नामक राजा को प्रेरित कर के उसका वध कराते हैं। यज्ञ का बहुत बड़ा महत्त्व है। राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए बड़ा परिश्रम किया था। परन्तु जब लङ्का में मेघनाद और रावण का यज्ञ चल रहा था तब उसके विनाश के लिए अङ्गद, हनुमान्, लक्ष्मण आदि ने प्रयत्न किया। क्यों ? इसी लिए कि ऐसे तप एवं यज्ञ, भावदुष्ट होने के कारण, धर्म नहीं अधर्म हो गये हैं। यदि उनका यज्ञ सफल होता तो रावण और मेघनाद अजेय ही हो जाते। वस्तुतः उनका यज्ञ तो दूसरों की बहू-बेटियों के अपहरण के लिए ही था। ऐसा यज्ञ धर्म नहीं। इसी तरह वृन्दा का पातिव्रत्य-धर्म भी हजारों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु हो रहा था। अतः वह अधर्मप्राय हो गया था। उसका विध्वंस ही उस परिस्थिति में धर्म था। भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम एवं परम निष्काम थे। अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी उनकी पत्नी थी। माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता और राधा श्रीराम और श्रीकृष्ण रूप में उनकी पत्नी थीं। काम, वसन्त तथा अप्सराएँ उनके मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सके थे। लोग क्रोधवृत्ति से काम को नष्ट कर सकते हैं। परन्तु क्रोध का उपशमन करना उनके लिए कठिन ही है। वह क्रोध जिनके मन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनसे डरता है; उनके मन में काम कहाँ से कैसे आ सकता है ? भगवान् ने काम से और अप्सराओं से वर माँगने के लिए कहा और अपने ऊरु से उर्वशी जैसी दिव्य अप्सरा को प्रकट कर के इन्द्रलोक के लिए भूषण के रूप में प्रदान किया था। उसका सौन्दर्य, माधुर्य एवं कान्ति निहारकर देवता और अप्सराएँ दोनों हतप्रभ हो गये थे, अतः वे विषयभोग की दृष्टि से जालन्धर की पत्नी के पातिव्रत्य-भङ्ग के लिए प्रयत्न क्यों करते ? उन्होंने अकीर्ति या शाप आदि की चिन्ता न करके लोककल्याण ही किया- "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।" ( रा० मा० १।१२३ ) माता, पिता, गुरु और पति की महिमा शास्त्रों में बहुत वर्णित है। परन्तु वे ही सब यदि श्रीराम-प्राप्ति में बाधक हों तो उन सबका त्याग ही प्रशस्त है- "जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये तिनहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही ।