रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६६ रामायणमीमांसा एकविंश उचित था ? शास्त्रानुसारी समाज सदा से प्राणीमात्र को आदर देता है । 'वासुदेवः सर्वमिति' सब वासुदेव ही हैं । यह उसका दर्शन है । रन्तिदेव आदि का उदाहरण दिया जा चुका है । तुलसी ने 'गिरा ग्राम्य सिय राम जस' इस वचन से नम्रता प्रकट की है । परन्तु वक्ता इससे भी संस्कृत काव्यों पर छीटाकसी करता है । 'जिनके अन्तःकरण में यह भय था कि वाल्मीकि, व्यास, भवभूति तथा कालिदास की दिव्य देवभाषा से अलंकृत रामकथा की तुलना में तुलसी के 'ग्राम्य गिरा सियराम जस' में आकर्षण होगा ? किन्तु समय ने उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी शङ्का कितनी निर्मूल थी । कभी-कभी वस्त्रालङ्कार हमारी दृष्टि को इतना उलझा देते हैं कि अन्तराल में छिपे हुए सौन्दर्य को सहज रूप में देख पाना कठिन हो जाता है । आभूषणों का सौन्दर्य हमें व्यक्ति के स्थान पर आभूषणनिर्माता के कौशल की ओर ही ले जाता है । काव्य के रचयिता का पाण्डित्य भी कभी-कभी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न कर देता है । किसी महाकाव्य को पढ़ते हुए यदि हमारी दृष्टि नायक के स्थान पर काव्यकौशल की ओर अधिक जाती हो तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह किसी कवि की सफलता है ? यदि किसी रचनाकार का उद्देश्य अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन हो तो उसको उसमें सफलता की अनुभूति हो सकती है । किन्तु एक भक्त के लिए यह स्थिति सर्वथा असह्य होगी । रचना का वास्तविक उद्देश्य तो नायक को ही पाठक के अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करना होना चाहिये । गोस्वामीजी का दृष्टिकोण यही था । गोस्वामीजी को ऐसा लगा कि वस्त्र और आभूषणों को हटा देने पर राघवेन्द्र का सौन्दर्य उसी रूप में झलक उठे जैसे काई को हटा देने पर जल । राम के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ ।” आधुनिक लोग समझते हैं कि संसार की सारी बुद्धि हमारे ही पास है और कुछ जानते ही नहीं । पर वस्तुतः आधुनिक तथोक्त अभिमानी ही सर्वज्ञान शून्य हैं, क्योंकि कोई भी भूषण, अलङ्कार मुख्य नायक का उपकरण है, अङ्ग है, स्वयं अङ्गी नहीं है । उस अञ्जन की कीमत नहीं जिससे आँख फूट जाय । उस अलङ्कार का कोई महत्त्व नहीं जिससे अलङ्करणीय की शोभा, आभा, प्रभा छिप जाय । श्रीभागवत में स्पष्ट ही कहा है कि —'परं पदं भूषण- भूषणाङ्गम् ।' भगवान् का मङ्गलमय अङ्ग भूषणों का भूषण है। अलङ्कारों से भगवान् के श्रीअङ्ग अलंकृत नहीं होते अपितु अलङ्कार ही भगवान् के अङ्गों से अलंकृत होते हैं । अतएव वैसे भले ही अलङ्कार काई के तुल्य सौन्दर्य के आवरक हों, किन्तु प्रभु के अङ्गों से अलंकृत होने से वे कोटि-कोटि गुणित चमत्कृत होकर भगवान् के अङ्ग को अलंकृत करनेवाले हो जाते हैं । तभी दृश्य, अदृश्य, लौकिक, अलौकिक भगवान् के सभी श्रीविग्रहों को विविध वस्त्रालङ्कारों से विभूषित सुसज्जित अलंकृत किया ही जाता हैं। भूषणों की ही बात क्या ? गुणों का भी तो यही हाल है । प्रभु स्वयं कहते हैं कि—'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम् ।' मुझ निरपेक्ष निर्गुण को गुण ही भजते हैं । जैसे प्रभु के मुकुट, किरीट, कुण्डल, कौस्तुभादि अलङ्कार जन्मजन्मान्तरों की तपस्याओं से प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्ध जोड़कर धन्य धन्य होते हैं । वैसे ही गुण भी तपस्याओं के द्वारा प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्धित होकर धन्य धन्य होते हैं । क्योंकि जैसे सीमित सौन्दर्यवाले व्यक्ति में ही अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान हो सकता है। निःसीम सौन्दर्य में अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान नहीं हो सकता है। वैसे ही गुण भी सातिशय महत्त्ववाले स्वाश्रय में महत्त्वातिशय का आधान कर सकते हैं । सीमित आनन्दवाले में आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं । परन्तु जिसका निःसीम स्वाभाविक महत्त्व तथा निःसीम स्वाभाविक आनन्द है उसमें गुण किस प्रकार महत्त्वातिशय या आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं ? अनर्थ-निवर्हण भी गुण वहीं कर सकते हैं जहाँ अनर्थ की सत्ता हो, भगवान् तो नित्य निरस्तसमस्तानर्थ- सत्ताक हैं । वे ब्रह्म निरतिशय बृहत् हैं । अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्मपद से तो निरतिशय निरुपाधिक देश, काल और