भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 842

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६५ "भवान्नारायणो देवः" ( वा० रा० यु० का० ) तुलसीदास उक्त तर्क के आधार पर नहीं, किन्तु वेद और पुराण, महाभारत के आधार पर राम को परमेश्वर मानते थे । क्योंकि काल की इस विशाल परिधि के पार तो कई सिद्ध भी अपने को अभिव्यक्त कर सकते थे । योगभाष्य के अनुसार जैगीषव्य दस महाकल्पों के अनन्तर भी अपने को व्यक्त कर सकते थे । "दशसु महाकल्पेषु विपरिवर्तमानेन मया यत्किञ्चिदनुभूतं तद् दुःखमेव ।" तभी तो तुलसीदास श्रीराम का कोशलपाल के रूप में ही स्मरण करते हैं । "तुलसी तो को कृपालु जो कियो कोशलपाल । चित्रकूट को चरित्र चेत चित करि सो ॥" यह कहना भी गलत है कि "गोस्वामी के मन में इतिहास के प्रति कोई आकर्षण नहीं था । उनके लिए राम पुराण या त्रेतायुग के बीते हुए पात्र नहीं हैं। वह तो उनके शाश्वत विद्यमान रहनेवाले राम हैं ।" क्योंकि उनकी दृष्टि में वाल्मीकि के अनुसार राम केवल त्रेतायुग के ही नहीं हैं। वे विष्णु, नारायण या वेदवेद्य परमात्मा ही थे । अतएव शाश्वत हैं । तभी तो राम को रघुवंशमणि एवं कोशलपाल कृपालु कहते हैं। अतः त्रेता युग में चक्रवर्ती दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम ही तुलसी के शाश्वत राम भी हैं । वस्तुतः तुलसी के निर्मल पवित्र भाव पर जो उन्हें वर्णाश्रमधर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते हैं ऐसे वक्ताओं से जनता को ईश्वर ही बचाये । वे कहते हैं कि "राघवेन्द्र केवट के उस दैन्य को मिटा देना चाहते थे, जिसे समाज ने उसपर लाद दिया था । वह धन की दृष्टि से ही नहीं, हर तरह से हीन कर दिया गया था । वह अस्पृश्य था । "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ।" वह किसी राजा के समक्ष मुख खोलने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।" यह वही सुधारवाद है जिसका भूत आधुनिक लोगों पर सवार होता है । कथावाचक सज्जन भी उसके अपवाद नहीं हैं। परन्तु उनके अनुसार राम एवं तुलसी को अवश्य ही नयी आचारसंहिता प्रचलित करनी चाहिये थी । कम से कम "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा" का उत्तर अवश्य देना चाहिये था । वक्ता कह सकता है कि भगवान् ने उसे गले लगाकर ही इसका उत्तर दे दिया था । परन्तु वह भूल करता है । क्योंकि शास्त्रसंस्कारी तो यह समझ लेगा कि आचार में धर्मशास्त्र प्रमाण होता है, इतिहास नहीं। हिन्दी व्यवहार में आदरणीय नहीं, किन्तु कांस्टिट्यूशन ही व्यवहार में आदरणीय है । ईश्वरों का सब आचरण काम में नहीं लाना चाहिये, किन्तु उनकी आज्ञा का ही पालन करना चाहिये— "ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।" (भाग० १०।३३।३२) शास्त्राविरुद्ध ही आचरण अनुष्ठानयोग्य होता है। वैदिक भी यही कहते हैं— "यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि ।" (तै० उ० १।११।२) जो हमारे अनवद्य निर्दोष शास्त्राविरुद्ध आचरण हैं उनका ही आदर करना चाहिये अन्य का नहीं । समाज ने कोई चीज किसी पर लाद दी, यह निष्प्रमाण है। विशेषतः वह शास्त्रानुसारी समाज जिसमें श्रीराम का अवतरण हुआ उसने कोई अनुचित स्थिति किसी पर लादी होती तो क्या उसमें राम का प्रादुर्भाव होना