भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 841

शास्त्रों के अनुसार निराकार निर्गुणोपासना भी विहित है। उससे भी दोष दूर होते हैं। एक निर्गुणो- पासक के हृदय में प्रतिशोध की भावना सङ्गत नहीं है। गुह की उपासना के विपरीत निराकारवादी कबीर की प्रवृत्ति धर्मयुक्त नहीं हो सकती। यदि निराकार राम सगुण साकार राम हो सकते हैं तो यह सत्य वस्तुस्थिति सिद्ध संत कबीर के मन में अवश्य आनी चाहिये थी। सिद्ध के मन में ऐसी प्रतिक्रिया हो जिससे वह सत्य से मुंह मोड़ ले, यह कैसी सङ्गति और कैसी सिद्धि है ? वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार वैसे ही सम्भव नहीं, जैसे नेत्र के बिना रूपसाक्षात्कार असम्भव है। “दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय । घर की चकिया कोई ना पूजे जाकर पीसा खाय ॥” यह कबीर का कथन असङ्गत है, क्योंकि आस्तिक पत्थर नहीं पूजते । किन्तु वेद प्रमाण के अनुसार पाषाणमयी प्रतिमा में आवाहित परमेश्वर की ही पूजा करते हैं। फिर कबीर को तो इतना भी ज्ञान नहीं था कि हिन्दू चाकी ही नहीं अपितु कुम्हार के चाक को भी पूजते हैं। श्रीराम ने शम्बूक को सत्कर्म करने का अनधिकारी कभी नहीं माना। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। वर्णा- श्रम-मर्यादा का उल्लङ्घन करने के कारण ही श्रीराम रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड देने को बाध्य हुए थे। फिर यदि वे वर्णाश्रममर्यादोल्लङ्घी किसी को दण्ड दें तो उनका क्या दोष है ? शास्त्रानुसार ब्राह्मण भले अखण्ड भूमण्ड का स्वामी हो, राजा हो, परन्तु उसे राजसूय यज्ञ का अधिकार नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय जाति का राजा ही राजसूय यज्ञ कर सकता है, अन्य नहीं । इस सत्य निष्पक्ष स्थिति में कबीर अगर दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम को ईश्वर नहीं मानते तो क्या प्रतिक्रियावादी या दुराग्रही नहीं कहे जायेंगे ? श्रीराम ने तो वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए भी शबरी, गीध, कोल, भिल्ल, किरात, वानरों और भालुओं से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था। फिर, उन्हें किसी प्रकार भी अनीश्वर कैसे कहा जा सकता है ? “एक दारुगत देखिय एकू । पावक युग सम ब्रह्मबिबेकू ॥” ( रा० मा० १।२२।२ ) दारुगत अग्नि निराकार है। पर वही दाहकत्व और प्रकाशकत्व विशिष्ट होकर साकार भी हो जाता है । “जो गुणरहित सगुन सो कैसे । जिमि हिम उपल बिलग नहिं जैसे ॥” (रा० मा० १।११५।२) जब दशरथनन्दन रघुवर ईश्वर हो सकते हैं तब राम को अनैतिहासिक भी कैसे कहा जा सकता है ? यदि कोई रघुवंश नहीं हो तो व्यापक नित्य राम को दशरथनन्दन कैसे कहा जा सकता था ? “बन्दहुँ राम नाम रघुवर को” ( रा० मा० १।१८।१ ) “महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। यदि उन्हें उनमें पूर्ण मानवता का साक्षात्कार हुआ था तो वह स्वाभाविक ही था। किन्तु तुलसी ने राम को देखा तब उन्हें वे केवल मानव के रूप में कैसे दिख सकते थे । काल की इस विशाल परिधि में स्वयं अपने को अभिव्यक्त करनेवाला ईश्वर को छोड़कर अन्य कोई नहीं हो सकता था।” परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकि श्रीराम को माधुर्यभाव की दृष्टि से, राजकुमार की दृष्टि से वर्णन करते हुए भी परमेश्वर ही मानते हैं। “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । जज्ञे विष्णुर्महातेजा आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥”