रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 840, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६३ पर इससे बाल्मीकिरामायण और मानस की तुलना करना निरी अनभिज्ञता ही होगी। यदि उत्तम मणिपात्र में अमृत ही रखा हो तो उसे छोड़कर मृण्मय पात्र के अमृत को कौन ग्रहण करेगा ? क्योंकि वहाँ भाषा और विषय दोनों का ही उत्कर्ष है । भाषा संस्कृत हो विषय निकृष्ट हो तो वहाँ जितना उत्कृष्ट भाषा से पुण्य होगा उससे अधिक निकृष्ट विषय के अनुसन्धान से पाप होगा । किन्तु जहाँ भाषा ग्राम्य भी हो, किन्तु विषय हो भगवान् का मङ्गलमय नाम, गुण, यश तथा स्वरूप तो वहाँ विषय के उत्कर्ष से भाषा के यत्किञ्चित् दोष भी निरस्त हो जायेंगे । इससे संस्कृत एवं ग्राम्य गिरा के उत्कर्षापकर्ष की कल्पना नही करनी चाहिये । जब देवताओं और लोक के कल्याणार्थ देवाधिदेव भगवान् विष्णु नर के रूप में प्रकट होते हैं तो देवताओं का भी उनकी सहायता-सेवा के लिए वानर तथा भालू के रूप में आविर्भाव होता है। देवताओं का पद मनुष्यों से ऊँचा है । फिर भी परमतह्मपद वैकुण्ठपद उससे भी ऊँचा हैं । देवतापद का सुख सातिशय हैं, निरतिशय नहीं है । सुतरां उत्कर्षापकर्ष के कारण वहाँ ईर्ष्या, द्वेष आदि दोषों की सत्ता रहती है। इसी लिए देवतापद से आगे बढ़ने की अपेक्षा होती है। देवता भी हिरण्यगर्भ के अंश हैं । हिरण्यगर्भ परमेश्वर का ही समष्टि सूक्ष्म शरीर विशिष्ट सोपाधिक रूप हैं । फलतः देवराज इन्द्र ब्रह्मविद्वरिष्ठ ज्ञानी भी होते हैं । परमेश्वर की कथा, स्तुति आदि तो अपनी अपनी भाषा में अपनी अपनी शक्ति के अनुसार सदा ही सभी करते हैं । तामिल, तेलगू, गुजराती, मराठी, पञ्जाबी, काश्मीरी, बङ्गला, उड़िया, मैथिली, हिन्दी आदि भाषाओं में ही नहीं अनेक अन्य भाषाओं में अनेक कवियों ने प्रभु के गुणगणों का वर्णन किया है। परन्तु उन सबका आधार वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र, आगम आदि ही हैं। अतः अपने मूलभूत वेदादि शास्त्रों से कोई अलग नहीं था । इतना ही क्यों अरबी के डेढ़ हजार वर्ष पूर्व कुरान आदि के द्वारा, अपनी भावना के अनुसार इङ्गलिश भाषा में दो हजार वर्ष पूर्व तथा जेन्दावेस्ता द्वारा उससे भी पहले भक्तों ने ईश्वर का गुणगान किया ही है । “कबीर की जीवनी के आधार पर कहा जाता है कि कबीर के मन में उस वर्णव्यवस्था के प्रति कैसे राग हो सकता था जो उनको एक सन्त के निकट पहुँचाने में बाधक बनी । साथ ही श्रीरामचरित्र का वह अंश भी उनके स्मृति में रहा ही होगा जिसमें शम्बूक नाम के शूद्र तपस्वी का इसलिये वध कर दिया गया कि वह वर्णाश्रमव्यवस्था का उल्लङ्घन करके तपस्या में संलग्न था । कबीर ऐसी परिस्थिति में उन राम को कैसे स्वीकार कर सकते थे जो एक शूद्र को सत्कर्म करने का अधिकार भी देने को प्रस्तुत नहीं हैं। दूसरी ओर राम-नाम की साधना से उन्हें अमित लाभ हुआ था । उसे अस्वी- कार कर पाना उनके लिए सम्भव न था । अतः रामनाम को स्वीकार करते हुए भी दशरथनन्दन राम को ईश्वर के रूप में स्वीकार न करना उनके लिए स्वाभाविक था ।'' यह सब शास्त्रीय व्यवस्था न समझने का ही दुष्परिणाम है । शास्त्रोक्त वर्णाश्रमव्यवस्था किसी का भी अपमान करना नहीं सिखलाती । श्रीरन्तिदेव ने पुल्कस जैसे अतिशूद्रों का भी ससम्मान आतिथ्य किया था । आतिथ्यवेला में नाम और गोत्र के प्रश्न के बिना ही वैश्वानर बुद्धि से किमी भी अतिथि का सम्मान करना शास्त्र- सम्मत है । शिवनाम, रामनाम सबके ही लिए कल्याणकारी हैं, यही वेदादि शास्त्रों का निश्चित मत है । पुराण में सहस्रों उदाहरण भरे पड़े हैं। श्रीभागवत का अजामिलोपाख्यान उनमें ज्वलन्त प्रमाण है । अतः श्रीरामानन्दाचार्य के पास जाकर कबीर अपनी जिज्ञासा नहीं प्रकट कर सकते थे, ऐसा इतिहास मनगढ़न्त ही है । महाभारत के अनुसार तो विदुर शूद्र थे । परन्तु भगवान् कृष्ण उनके अतिथि होते थे । धर्मव्याध के समीप धर्मतत्त्वज्ञान के लिए पतिव्रता के वचन से ब्रह्मचारी भी जाकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है । फिर कबीर का रामानन्दा- चार्य के समीप तक पहुँचना कठिन था, यह कहना असङ्गत ही है ।