रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 839, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें७६२ रामायणमीमांसा एकविंश वह तो संस्कृत भाषा नहीं थी। वह तो तुलसी के मानस की ही भाषा थी, क्योंकि मानस के वाल्मीकि और राम के संवाद की चर्चा वाल्मीकिरामायण में है भी नहीं। फिर मन महँ मुस्काने के आधार पर भी व्याकरण से अनुशासित देवभाषा के अनुरूप राम के मर्यादित आनन्द की अभिव्यक्ति का क्या सम्बन्ध है ? तुलसी तो ऐसे दाँव- पेंच की बात न कर सीधे कहते हैं— "बेदबचन मुनिमन अगम ते प्रभु करुना अयन। सुनत किरातन के वचन जिमि पितु बालक बयन ।।" ( रा० मा० २।१३५ ) "जिमि बालक कह तोतरि बाता। सुनत मुदित मन पितु अरु माता ।।" ( रा० मा० १।७।५ ) माता-पिता अपने बच्चों को तोतरी बातों को प्रसन्न मन से सुनते हैं। विहँसते भी हैं। परन्तु किसी ऋषि-मुनि या गुरुजनों की बातें तो गम्भीरता से ही सुनी जाती है। उसी तरह श्रीराम केवट, कोल, भिल्ल और किरातों के प्रेमलपेटे अटपटे वचनों को सुनकर विहँसते हैं। मुनियों की गम्भीर बातों को सुनकर मुस्कराते हैं। वहाँ खिलखिलाकर हँसना अनुचित भी है। इतना ही क्यों संस्कृत के कवियों ने भी प्रेम की एक विचित्र अवस्था का वर्णन किया है। जिसमें भगवान् की अटपटी लीला का चित्रण है। पर इसमें संस्कृत एवं ग्राम्यभाषा के विषाक्त संघर्ष का लेश भी नहीं है— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैः मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु जाने कृष्ण तवाद्भुतं प्रियमहो भक्तैः परच्छन्दितम् ॥” भक्त कहता है कि हे गोपाल, आप गोमूत्र और गोमय के कर्दमयुक्त गोपालों के प्राङ्गण में तो स्वच्छन्द विहार करते हैं। परन्तु विप्रों के ज्योतिष्टोम, वाजपेय आदि अध्वरों में पधारने में लज्जित होते हैं। गायों एवं बछड़ों के हुंकारों से बोल पड़ते हैं, परन्तु सन्तों की सैकड़ों स्तुतियों के सुनने पर भी मौनभङ्ग नहीं करते हैं। अरे आप गोकुल-पुंश्चलियों का तो खुशी से दास्य अङ्गीकार करते हैं, परन्तु बड़े बड़े जितेन्द्रिय महामुनियों का स्वामित्व भी अङ्गीकार नहीं करते हैं यह क्या है ? हे कृष्ण ! हम आपके उस अद्भुत भक्तिपराधीनता को जानते हैं। वस्तुतः यह सिद्धान्त सर्वसम्मत है कि देववाणी परमपवित्र पुण्यजनक है। वेदवाणी उससे भी पवित्र साक्षात् परमेश्वर की वाणी है। अगर भगवान् की महिमा भगवान् का यश वेद के अधिकारियों को वेदवाणी में प्राप्त हो तो बहुत ही श्रेष्ठ है। संस्कृत भाषा में मिले तब भी श्रेष्ठ है। परन्तु यदि वही वस्तु अन्य भाषा में मिले तो भी वह श्रेष्ठ ही है। यदि संस्कृत भाषा में ईश्वर का खण्डन सुनने को मिले, परन्तु प्राकृत ग्राम्य भाषा में भगवान् की महिमा सुनने को मिले तो सहज ही में यहाँ विषय की महत्ता के सामने भाषा का प्रश्न गौण हो जाता है। परन्तु यदि वही उत्कृष्ट तत्त्व वैदिक भाषा में मिले और प्राप्त करनेवाला उसका अधिकारी भी हो तब तो उसका उत्कर्ष निर्विवाद है ही। "मणि भाजन विष पारई पूरन अमिअ निहारु। का छोड़िय का संग्रहहि देखु बिबेक बिचारु ॥” मणिपात्र में विष भरा हुआ हो और मिट्टी के पात्र में अमृत रखा हुआ हो तो विवेकी किसे ग्रहण करेगा एवं किसे छोड़ेगा ? यह कहने की जरूरत नहीं है।