भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 838, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 838

कहा जाता है कि "संस्कृत के ग्रन्थों का आनन्द लेने के लिए विद्वान् की आवश्यकता होती है। विद्वान् व्याख्याता और ग्रन्थ उनकी परिधि से इतने दूर थे कि उन्हें स्पर्श करने का साहस भी नहीं सकते थे। यह स्थिति कुछ लोगों को अभीष्ट हो सकती थी। क्योंकि उसमें उनका व्यावहारिक स्वार्थ भी जुड़ गया था। पर लोक-मङ्गल की दृष्टि से यह स्थिति एक ऐसी अभिशाप थी जिसके द्वारा समाज धर्म से चला गया।" यह सब द्वेषपूर्ण प्रचार है। यह कहने और लिखनेवालों का भी स्वार्थ इस प्रचार से जुड़ा है। आखिर तुलसीरामायण के बन जाने पर भी जनता को कथा चाहिये और तुलसीरामायण के भी सहस्रों वक्ता कथा कहने लगे और उसी से लाखों रुपये कमाने लगे। हाँ, जहाँ कथा के नाम पर मूल वेद, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि की चर्चा विद्वानों द्वारा चलती थी वह अब बन्द हो गयी। अब अधिकांश संस्कृतानभिज्ञ वक्ताओं तथा सिद्धान्त से अनभिज्ञ वक्ताओं द्वारा भाषाग्रन्थों की कथा चल पड़ी। उच्च वर्गों के अहङ्कार और दुर्व्यवहार से जिस प्रतिक्रिया का उदय हुआ उससे ब्राह्मण, संस्कृत और वेद तीनों ही के प्रति तिरस्कार की भावना जैसे कबीर आदिकों में आयी थी वही आज मानस-वक्ताओं में भी आ रही है, यह आश्चर्य है। "वेद कन्तेव की गम्म नाही तहाँ। कहै कबीर कोई रमै सूरा॥" कबीर की ऐसी उक्तियाँ कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित रह गयी हैं। परन्तु तुलसी वेद-प्रामाण्यवादी हैं। उनका नास्तिकता से समन्वय नहीं हो सकता था। "तुलसी के इष्ट राम केवल तुलसी के ही इष्ट नहीं थे, किन्तु वेदादि शास्त्रों के सर्वस्व थे। राम ऋषियों, मुनियों की पूजा करते थे। किन्तु प्राचीन परम्परा के प्रति उनका यह समादर केवल कोल, भील और बन्दरों से उनकी मित्रता के बीच बाधक नहीं बना।" (मा० मु० ६४) यह तुलसी की कोई नयी बात नहीं है। तुलसी ने वेदशास्त्र, पुराण, रामायण और भारत के विरुद्ध कुछ कहा ही नहीं। फिर इसमें प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। यह तो सुधारक रामायणियों के मस्तिष्क का फितूरमात्र है। यह कहना भी कुटिलता ही है कि "भले ही महर्षि वाल्मीकि की देवभाषा में प्रयुक्त वाणी भगवान् को प्रिय लगती है। पर केवट के ग्राम्य बोली में भी राम उतना ही आनन्द लेते थे। एक ओर यदि वे वाल्मीकि की वाणी सुनकर मुस्कराते हैं- "सुनि मुनि वचन प्रेमरस साने। सकुचि राम मन महँ मुस्काने॥" (रा० मा० २।११६।१) तो दूसरी ओर केवट की वाणी उनमें उन्मुक्त आनन्द भर देती है- "सुनि केवट के वैन प्रेम लपेटे अटपटे। विहँसे राजिवनैन चितइ जानकी लखन तन॥" (रा० मा० २।१००) मुस्कराहट में आनन्द की मर्यादित अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार देवभाषा में संस्कृत भी व्याकरण से अनुशासित है। विहँसना आनन्द की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है। यह तो केवट की व्याकरणमुक्त ग्राम्यभाषा के अनुरूप है।" (मा० मु० ६५) यह केवल बुद्धि का दुरुपयोग ही है, क्योंकि तुलसी के वाल्मीकि राम से जिस भाषा में बात कर रहे हैं ९६