रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 837, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें७६० रामायणमीमांसा एकविंश अनादि अपौरुषेय वेद ईश्वर की प्रेरणा से किसी कवि की वाणी नहीं हैं, किन्तु साक्षात् ईश्वर की वाणी हैं। यह वेदप्रमाण से सिद्ध है। परन्तु वेद के सम्बन्ध में यह विचार उठता है कि क्या वैदिक शब्द और वैदिक अर्थ अत्यन्त अलौकिक हैं या लौकिक हैं ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा तब तो उनके अर्थज्ञान का कोई उपाय नहीं है । क्योंकि लौकिक मनुष्यों को तो लौकिक शब्दों और लौकिक अर्थों के साथ ही सङ्गतिग्रह होता है। अलौकिक शब्दों और अलौकिक अर्थों का उन्हें ज्ञान ही नहीं, फिर शक्तिग्रह कैसे होगा ? शक्तिग्रह के बिना वाक्यार्थबोध कैसे होगा ? बौद्ध आदि कहते हैं कि शब्द और अर्थ का कोई सम्बन्ध निश्चित नहीं होता । उसका यथेष्ट विनियोग किया जा सकता है । इसी लिए वे कहते हैं कि 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' इस वाक्य का 'श्वमांसं भक्षयेत्' ऐसा अर्थ क्यों न हो ? सिद्धान्ततः इसका उत्तर यही है कि लौकिक शब्द ही वैदिक शब्द होते हैं । अतएव अलग से शक्तिग्रह की भी अपेक्षा नहीं होती । पद तथा पदार्थ लौकिक एवं वैदिक समान ही होते हैं । अपूर्व स्वर्ग तथा उनका यज्ञायागादि के साथ कार्य-कारणभाव अलौकिक वाक्यार्थ है पदार्थमात्र नहीं है । "यत्परः शब्दः स शब्दार्थः" शब्दों का जिसमें तात्पर्य होता है वही वास्तविक शब्दार्थ होता है । तात्पर्यनिर्णय के लिए उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति का विचार करना पड़ता है । इस दृष्टि से ही कर्म, उपासना का अनुष्ठान वेदार्थनिर्णय पर ही निर्भर है। यदि निश्चित वेदार्थ निर्धारित न होगा तो कर्मोपासना का अनुष्ठान कैसे होगा ? ब्रह्मात्म-साक्षात्कार भी निश्चित शब्दार्थ के निर्धारण के बिना असम्भव है । अतः किसी काव्य का अमित अर्थ है, यह कहना असम्भव है। हाँ अमित का अर्थ ब्रह्म है । अतएव श्रीभगवान् कहते हैं कि--'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ । भगवान् अनन्त हैं, उनके जन्म अनन्त हैं, चरित्र अनन्त हैं । परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि कोई मन- मानी कल्पना करने में स्वतन्त्र है । चरित्र का भी मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि इतिहासों, संहिताओं, तन्त्रों एवं आगमों के आधार पर ही निर्धारण होता है। स्वतन्त्र कल्पनाएँ कल्पना ही समझी जायेंगी । अपौरुषेय वेद एवं तदाश्रित आर्ष सद्ग्रन्थ ही धर्म और ब्रह्म में प्रमाण हैं। अन्य सन्त- महात्माओं के वचन भी उन्हीं पर निर्भर हैं । संस्कृत पर मिथ्या आक्षेप "वर्णाश्रमधर्म में ब्राह्मण ही वैश्य थे । संस्कृत भाषा उनके द्वारा प्रयुक्त थी ।" (मानसमुक्तावली पृ० ६३) संस्कृत भाषा या संस्कृत शब्द अनादि हैं। अन्य शब्द भी इसके अपभ्रंश एवं प्रवाह रूप से अनादि ही होते हैं । वेदाङ्ग व्याकरण के द्वारा अपभ्रष्ट असाधु शब्दों से साधु संस्कृत शब्दों का पृथक्करण ही उसका संस्कार है । इसी लिए वह संस्कृत कहलाती है। जैसे छलनी गालनी या चालनी ग्राह्य वस्तुओं से अग्राह्य वस्तुओं को पृथक् कर देती है । वैसे ही प्रकृत में व्याकरण के सूत्रों द्वारा साधु-असाधु शब्दों का पृथक्करण होता है । वेद अनादि अपौरुषेय सबके कल्याणकारी हैं। वे सबके हैं। संस्कृत ब्राह्मणों की ही नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों की भाषा है । इतना ही क्यों वह प्राणीमात्र की धर्मभाषा है। शूद्र बन्धुओं का उनके अधिकारा- नुसार संस्कृत के नमोऽन्त मन्त्रों में अधिकार है । वेदादिशास्त्रों के उपदेशों को ही विभिन्न भाषाओं में सन्त-सज्जन सबके कल्याणार्थ दुहराते हैं । अरे यह तो पाश्चात्यों का प्रचार है कि संस्कृत एक वर्ग विशेष की भाषा है । वर्णाश्रमधर्म तो सबका ही धर्म है । तुलसी इसी के तो पोषक हैं । संस्कृत ग्रन्थों में स्वकीयत्व अपनत्व की भावना मिट जाना यह पाश्चात्य प्रचार का प्रभाव है ।