भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 836

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५९ माया भगवान् के सम्बन्ध में संशय जिज्ञासा के द्वारा रामायण का विस्तृत वर्णन कराना चाहती थी । सती स्वयं भी मायामोहित होने का नाटक कर के श्रीराम की अत्यन्त महिमा का प्रख्यापन कराना चाहती थीं । तर्क तथा प्रतितर्क से वैदिक सिद्धान्त का पूर्वोत्तरमीमांसाओं से परीक्षण किया जाता है। मीमांसा शब्द का पूजित विचार ही अर्थ है। इसी तरह बुद्धि को मस्तिष्कनिवासिनी कहना भी निर्मूल है। शास्त्रानुसार बुद्धि का निवासस्थान हृदय ही होता है। मस्तक में ही श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना इन चार ज्ञानेन्द्रियों का निवास होता है । मस्तिष्क में बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानतन्तुओं का बाहुल्य होने से भ्रान्तिवश ही कई लोग बुद्धि को मस्तिष्क-निवासिनी कहते हैं, अतएव दक्षपुत्री से चतुराई और शैलपुत्री होने से जड़ता की कल्पना भी निर्मूल है। यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि "जो स्वयं को काव्य के प्राकट्य का माध्यममात्र स्वीकार करते हैं, उनके हृदयप्राङ्गण में ईश्वर की प्रेरणा से सरस्वती नृत्य करती है । "जेहि पर कृपा करहि जन जानी । कबि उर अजिर नचावहि बानी ।।" (रा० मा० १।१०४।३) ऐसे काव्य के अमित अर्थ की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। रचयिता के उद्देश्य की सीमाओं का पता लगाना अनावश्यक श्रममात्र है । वाटिका में खिले हुए गुलाब का क्या अर्थ है ? कवि उसमें मुस्कुराहट देखता है। माली को वाटिका के शृङ्गार के रूप में दिखायी देता है। कामिनी को शृंगार का प्रसाधन प्रतीत होता है। एक चिकित्सक को उसमें ओषधि का तत्त्व दिखायी देता है। क्या कोई देखने के साथ कह सकता है कि रचयिता का इसमें मुख्य उद्देश्य कौन था ? रचयिता के असीम उद्देश्यों को किसी सीमा में बाँध पाना सम्भव नहीं है। ईश्वर-प्रेरणा से निर्मित काव्य के विषय में भी यही बात है कि जब काव्य का प्रतिपाद्य भी ब्रह्म हो तब उसकी सीमाएँ खींच पाना और भी असम्भव है— 'हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता । कहहिं सुनहिं बहुविधि सब सन्ता ।।' (रा० मा० १।१३९।३) बहुविधि कहने सुनने की स्वतन्त्रता भी रामचरित में इसी लिए प्राप्त है कि शब्द यहाँ केवल सरोवर के रूप में नहीं है जिसके अर्थ जल की कोई सीमा हो । सीमित सरोवर के जल का सूख जाना अवश्यम्भावी है, किन्तु शब्द जहाँ नदी की मूल धारा के समान हैं वहाँ शब्द मूलस्रोत की भाँति नूतन अर्थ का जल प्रवाहित करता रहता है । शाश्वत काव्य का स्वरूप भी यही है ।" ( मा० मु० १४ ) उपर्युक्त बातें अविचारित रमणीय ही हैं, क्योंकि यदि शब्दों का कोई निश्चित अर्थ न होगा तब तो भिन्न- भिन्न वक्ता अपनी अपनी बुद्धि और रुचि के अनुसार ही उनका नया नया मनमानी अर्थ करते जायेंगे । फिर तो तर्क और आगम में कोई भेद ही न रह जायगा । जैसे एक तार्किक अपनी बुद्धि से दूसरे तर्क द्वारा पहले तर्क को काट देता है। वैसे ही बुद्धिमान् लोग अपनी अपनी बुद्धि के बल पर आविर्भूत नये अर्थ से पुराने अर्थ को काट देंगे । फिर किसी भी वचन का निश्चित अर्थ ही न हो सकेगा। यह शब्द के लिए भूषण नहीं, किन्तु दूषण ही है। गुलाब का फूल शब्द नहीं है वह तो अर्थ ही है। उसका कोई अर्थ नहीं । उसके प्रयोजन तो अनेक हो ही सकते हैं। वह वाटिका का शृंगार भी है, कलिका की मुस्कुराहट भी है, कामिनी का शृंगार भी है एवं भक्त के पूजा का उपकरण भी है। चिकित्सक के लिए वह ओषधि भी हो सकता है। परन्तु यही बात शब्दों और वाक्यों के लिए नहीं । 'गतोऽस्तमर्कः' इन शब्दों का अर्थ तो यही है कि सूर्य अस्ताचल को गये । पर अपनी अपनी परिस्थिति के अनुसार उससे चोर चोरी का समय समझे, ब्राह्मण सन्ध्या करने का समय समझे और अभिसारिका अभिसार की बात सोचे. परन्तु यह शब्दार्थ नहीं है ।