भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७७२ रामायणमीमांसा एकविंश “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” (गीता १६।२३,२४) यदि वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य स्वीकृत न होगा तो विष्णु, जालन्धर, वृन्दा आदि का अस्तित्व भी सिद्ध न हो सकेगा । यह नहीं हो सकता कि मुर्गी का आधा हिस्सा पकाकर खा लें और आधा भाग अण्डा देने के लिए छोड़ दें । शास्त्र के एक अंश को मान लें और अन्य अंश को छोड़ दें । नितरां स्थिति को ही निष्ठा कहा जाता है । सब निष्ठाओं का पर्यवसान भगवान् में नहीं होता । अधर्मनिष्ठा प्राणी को नरक ही ले जाती है । काम्यकर्मनिष्ठ प्राणी को स्वर्गादि में पहुँचाती है । भक्ति, ज्ञाननिष्ठा तथा निष्काम शास्त्रोक्त कर्मनिष्ठा साक्षात् या परम्परा से ब्रह्मप्राप्ति में हेतु होती है। नारद की ब्रह्मचर्यनिष्ठा का कोई दोष नहीं था । दोष था अहङ्कार का । यदि किसी को भक्त होने का अहङ्कार हो तो उससे भी हानि ही होती है । भगवान् ने देवर्षि नारद के ब्रह्मचर्यव्रत को नष्ट नहीं किया था, किन्तु नष्ट होने से बचाया था । यदि विवाह हो जाने दिया जाता तो देवर्षि का ब्रह्मचर्य भङ्ग हो जाता । जैसे कुपथ्य मांगनेवाले रोगी को कुपथ्य न देकर हितैषी उसकी रक्षा ही करता है । वैसे ही भगवान् ने नारद की कुपथ्यसम्बन्धी माँग को न देकर उनकी ब्रह्मचर्यनिष्ठा की रक्षा की थी । परन्तु शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अधर्म प्रतीत होने पर भी धर्म ही होते हैं । जैसे झूठ बोलना पाप, सत्य बोलना धर्म है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध है— “सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप ।” “अश्वमेधसहस्रञ्च सत्यञ्च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥” सहस्रों अश्वमेधों की अपेक्षा एक सत्य ही श्रेष्ठ होता है, फिर अगर उसी सत्य से किसी गाय या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो वह सत्य ही पाप है । वहाँ वैसी गोहत्या और ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ ही बोलना उचित है । किसी महात्मा के सामने से कोई गाय या सन्त एवं सज्जन ब्राह्मण भागकर जङ्गल में छिप गया हो और उसका पीछा करनेवाला हत्यारा (घातक) आकर उसके सम्बन्ध में पूछ-ताछ करता है तो महात्मा को चाहिये कि यदि मौन रहने से काम चल जाता हो तो मौन रहकर वैसे सज्जनों के प्राण बचाने चाहिये । परन्तु यदि मौन रहने में घातकों के उस मार्ग से अपने शिकार के पास पहुँच जाने का सन्देह पैदा होता हो तो झूठ बोलकर भी उनकी रक्षा करनी चाहिये । “येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ॥ अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथञ्चन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन् वाऽप्यकूजनात् ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।” (म० भा० शा० प० १०९।१४, १५) जो चोर, डाकू आदि अन्याय से किसी का धन लेना चाहते हैं। उन्हें धनिक का पता नहीं बताना चाहिये । जो दान, भिक्षादि द्वारा धन लेना चाहते हैं । उन्हें बताने में कोई दोष नहीं है। इतना ही नहीं यदि मौन