रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 848, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७१ कामजय के पश्चात् जहाँ देवर्षि अहङ्कार में उन्मत्त हो उठते हैं, वहाँ कामग्रस्त होने के पश्चात् भगवान् के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी त्रुटि स्वीकार करते हैं। पतिव्रता वृन्दा का व्रत नष्ट करना भी इसी सत्य को प्रकट करने के लिए था। निष्ठा का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि व्यक्ति अपनी उस शक्ति के द्वारा अधर्म को अमर बनाने की चेष्टा करे। निष्ठा का केन्द्र भी व्यक्ति नहीं आदर्श को ही होना चाहिये। जब तक दोनों का समन्वय नहीं होगा तब तक ऐसा धर्म किसी व्यक्ति के अहं को, उसके गौरव को प्रतिष्ठापित तो कर सकता है, किन्तु उस व्यक्ति का वह धर्म लोकमङ्गल के लिए घातक सिद्ध होता है। निष्ठा का वास्तविक तात्पर्य सर्वव्यापक ब्रह्म को एक केन्द्र से अभिव्यक्त करना चाहिये। जब पतिव्रता पति के प्रति निष्ठावती बनती है तब इसका अभिप्राय पति में ईश्वर का साक्षात्कार करना है। यदि पति के प्रति ऐसी पूर्णता की भावना पतिव्रता के मन में न हो तब उसके लिए निष्ठा का निर्वाह असम्भव है। यदि व्यक्ति किसी आराध्य के चित्र को सामने रखकर पूजा कर रहा हो और उसी का आराध्य देव आकर द्वार खटखटाने लगे तब क्या पुजारी चित्र की पूजा ही करता रहे, अथवा उठकर आराध्य का स्वागत करे ? निष्ठा की अन्तिम परिणति ईश्वर की उपलब्धि है। वृन्दा ने जिसे अपने पातिव्रत की च्युति मान लिया था वस्तुतः वह उसकी निष्ठा की सच्ची सार्थकता थी। इसी लिए वृन्दा तुलसी के रूप में परिणत हो गयी और भगवान् विष्णु शालिग्राम के रूप में तुलसी को मस्तक पर धारण करते हैं। विष्णु ने वैसा करके पतिव्रता को अतुल गौरव प्रदान किया। तुलसी के रूप में अपनी सङ्गिनी बनाकर वृन्दा को भी इस सत्य का साक्षात्कार करा दिया कि निष्ठा का चरम लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार है। निष्ठा साधन है साध्य नहीं। पातिव्रत की शक्ति जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से प्रेरित हो जिस व्यक्ति का जीवन समाज के लिए घातक हो उस समय धर्म और अधर्म के सूक्ष्म विवाद का अवसर आता है। वहाँ पतिव्रता की शक्ति का दुरुपयोग हो रहा था। ऐसी स्थिति में धर्म अधर्म का कवच बनकर उसे अनिष्ट से बचाने की चेष्टा करता है। युद्ध में योद्धा पर विजय प्राप्त करने के लिए कवच को नष्ट करना ही पड़ता है, क्योंकि कवच व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है। जब धर्म अधर्म के लिए कवच का कार्य करे तो उस समय धर्म पर प्रहार न करने से अधर्म ही विजयी होता है। ऐसा धर्म जो अधर्म के विजय में सहायक हो, जो धर्म को ही नष्ट करने में सहायता दे तो क्या उसे धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये ? जालन्धर की मृत्यु से अगणित स्त्रियों के पातिव्रत का रक्षण हुआ है। अतः लोकधर्म की रक्षा के लिए एक व्यक्ति की निष्ठा को मिटाना आवश्यक ही था। उक्त समाधान बहुत अंशों में ठीक हो सकता है। परन्तु इसपर भी सूक्ष्म विचार आवश्यक है। कई लोग तो इसी कारण कहते हैं कि वह विष्णु जो वृन्दा का पातिव्रत नष्ट करता है, ईश्वर ही नहीं है। वह कोई विषयी जीव था। इसी लिए उनकी दृष्टि में पुराणों पर अधिक विश्वास करना ही उचित नहीं है। इतना ही नहीं वे शास्त्रप्रामाण्य केवल व्याकरण तक ही सीमित मानते हैं। “शब्दप्रमाणका वयं तस्माद् यदाह शब्दः तदेव नः प्रमाणम्” परन्तु उनका उक्त कथन भ्रमपूर्ण है। महाभाष्य से भी अधिक प्राचीन और प्राणभूत गीता तो हर एक कार्य और अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र को ही प्रमाण कहती है। उसकी दृष्टि में शास्त्रविधि को छोड़कर मनमानी चेष्टा करनेवाले को सिद्धि, सुख, परागति इनमें कुछ भी नहीं मिलता है—