भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 847

७७० रामायणमीमांसा एकविंश "जेहि इमि गावहिं बेद जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान ॥" (रा० मा० १।११।८) याद रहे कि रघुकुलमणि, अवधपति, रघुराई, दशरथनन्दन, कोशलपति आदि सभी शब्द ऐतिहासिक हैं— "सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुवर सब उर अंतरयामी ॥" (रा० मा० १।११०।१) इसमें स्पष्ट ही रघुवर को अन्तरयामी कहा गया है । "भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती।" (रा० मा० १।११८।४) इतना ही नहीं, जो ऐतिहासिक रघुपति राम से पृथक् किसी सर्वव्यापी राम को मानते हैं उनका निरा- करण करते हुए शिवजी स्वयं कहते हैं। एक बात तुम्हारी हमको अच्छी नहीं लगी । यद्यपि तुमने मोह के वश होकर ही वैसा कहा था। तुमने जो यह कहा था कि वह राम दशरथसुत राम से कोई अन्य हैं। जिनका मुनि ध्यान करते हैं। भगवान् श्रीराम शाश्वत हैं इसमें दो मत नहीं हैं। फिर भी रघुकुलमणि रघुवंशभूषण, दशरथ- नन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन, दशरथ-अजिरविहारी और अवधेश उनके असाधारण नाम हैं और रघुकुल, दशरथ, कौसल्या आदि की ऐतिहासिकता का अपलाप करना सर्वथा असङ्गत ही है। शाश्वत सिद्ध करने की धुन में इन नामों का अपलाप भी अनभिज्ञता ही होगी। फिर तो श्रीराम को आधुनिकतम बनाने की दृष्टि से श्रीराम के हाथ से धनुष-बाण हटाकर उनके हाथ में बन्दूक, तोप, परमाणु बम और हाइड्रोजन बम देना पड़ेगा। धनुष-बाण आदि तो पुराने जमाने की वस्तुएँ हैं। अतः यही मानना युक्त है कि भगवान् अनादि होते हुए भी ऐतिहासिक हैं और ऐतिहासिक होते हुए भी शाश्वत हैं। जैसे भगवान् का पञ्चायतन श्रीविग्रह नित्य है। वैसे ही उनके लीलापरिकर भी नित्य ही हैं। धाम भी नित्य हैं। इस दृष्टि से अयोध्या, दशरथ, कौशल्या आदि भी नित्य ही हैं। श्रीराम तथा सभी अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य हैं। अतः ऐतिहासिक होने से उनमें जरा, मरण आदि की कल्पना करना भी अनभिज्ञता है। भगवान् के जन्म और कर्म का चिन्तन भवबन्धन काटने का परम उपाय है। कहा जाता है— "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह । जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह ॥" (वा० रा० १।१२१) कहा जाता है कि सती वृन्दा का व्रत भगवान् विष्णु ने छलपूर्वक नष्ट किया। जब उसने इस रहस्य को जाना तब उसने क्रुद्ध होकर शाप दिया। भगवान् ने केवल वृन्दा को ही पातिव्रत से च्युत किया, इतना ही नहीं, अपितु रामचरितमानस में ही ब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ देवर्षि नारद को अपनी विश्वमोहिनी माया के द्वारा वासना- भिभूत कर दिया। नारद को ब्रह्मचर्य से च्युत करना अथवा वृन्दा के पातिव्रत को नष्ट करना वस्तुतः एक ही सत्य को प्रकट करता है। देवर्षि का ब्रह्मचर्य यदि उन्हें अहङ्कारी बनाकर असुर बनने की प्रेरणा देता है तो ऐसे ब्रह्मचर्य को विनष्ट कर देना ही नारद के लिए और लोक के लिए परम कल्याणकारी था।