रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 846, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६९ भगवान् के चरित्र का सम्यग् ज्ञान प्राप्त करने के लिए त्रिकालज्ञता की दुहाई की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती है। इसी लिए तो भले वाल्मीकि राम के समकालिक भी हों तो भी वे सुनी सुनायी बातों के आधार पर रामायण लिखते तब तो सीता-चरित्र के सम्बन्ध में भी उन्हें वैसी ही बात लिखनी पड़ती जैसी कुछ भ्रान्त जनों की धारणा थी । परन्तु उन्होंने तो ब्रह्मा के आज्ञानुसार समाधि द्वारा अतीत, अनागत और वर्तमान सब चरित्रों का साक्षात्कार करके ही रामायण ग्रन्थ लिखा था और उनके अनुसार भी वह इतिहास भी है और लीला भी है। महानाट्य-निर्माता को भी त्रिकालज्ञ नहीं तो अतीतज्ञ तो होना ही चाहिये, क्योंकि नाट्य भो किसी ऐतिहासिक आधार पर ही होता है। भरत मुनि के अनुसार यही नाटक का रूप होता है। 'सति कुड्ये चित्रोल्लेखः' भित्ति होने पर ही चित्र का निर्माण होता है। अतः इतिहासप्रसिद्ध राम के आधार पर श्रीराम का नाटक लिखा जा सकता था। यदि ऐतिहासिक राम भिन्न हैं और उनका अनुकरण करनेवाले राम उनसे भिन्न हैं। तब दशरथ-सुत से भिन्न कोई राम हैं ? पार्वती के इस प्रश्न से शिवजी को क्षोभ क्यों होता । फिर तो जैसे अभिनेता जिसका अभिनय करता है उससे भिन्न होता है। उसी तरह दशरथनन्दन राम का अभिनय करनेवाले राम स्पष्टतः उनसे भिन्न ही होंगे। उस स्थिति में "रघुकुलमणि सोइ स्वामि मम" इस कथन का क्या अर्थ रह जायगा । फिर त्रेतायुग में अभिनेता राम ने उस नाट्य का अनुसरण दशरथगृह में ही जन्म लेकर क्यों किया ? नाटक में तो स्पष्टतः अभिनेय से अभिनेता भिन्न ही होता है। फिर आज के अभिनेता भी तो वैसे ही अभिनेय से भिन्न हैं। उनमें क्या भेद होगा ? श्रीशिवजी तो रघुपति चरित ही का वर्णन करते हैं— "रघुपति चरित महेश तब हरषित वरनै लीन ।" (रा० मा० १।१११।४) चरित शब्द भी इतिहास का बोधक है। सतीजा का प्रश्न रघुपति-कथा प्रसङ्ग का ही है— "पूछउ रघुपति कथा प्रसङ्गा ।" (रा० मा० १।१११।४) "तुम्ह रघुवीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रश्न जगतहित लागी ॥" (रा० मा० १।१११।४) "बरनहुँ रघुपति बिसद जस श्रुतिसिद्धान्त निचोरि ।" (रा० मा० १।१०९) श्रीशिवजी ऐतिहासिक राम और सर्वव्यापी राम की एकता का ही वर्णन करते हैं— "पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ ॥" (रा० मा० १।११६) जो प्रसिद्ध पुरुष पुरुषोत्तम हैं, जो प्रकाशनिधि हैं, जो परावरनाथ हैं वही रघुकुलमणि मेरे स्वामी हैं। संस्कृत में 'सोऽयम्' वही यह इस प्रत्यभिज्ञा के द्वारा 'स एव अयम्' इन दोनों पदार्थों की एकता का बोध कराया जाता है। ऊँचे से ऊँचे वेदान्तवेद्य ब्रह्म के रूप का निरूपण करके शिवजी उसको अवधपति कहते हैं। "सब कर परम प्रकाशक जोई। राम अनादि अवधपति सोई ॥" (रा० मा० १।११६।३) "जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरजा सोइ कृपालु रघुराई ॥" (रा० मा० १।११६।२) "बिन पद चले सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बक्ता बड़ जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहे घ्रान बिनु बास असेषा ॥ अस सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहि बरनी ॥" (रा०मा० १।११७।३,४) ९७