भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 845

७६८ रामायणमीमांसा एकविंश वाले होते हैं । वे फिर लौटकर नहीं आते, किन्तु वैदिक तथा रामायण और महाभारत, पुराण आदि के अनुसार श्रीराम, कृष्ण आदि ऐतिहासिक होते हुए भी नित्य हैं । वे ईश्वर के अवतार हैं, साक्षात् ब्रह्म ही हैं । यह सब उन्हीं ग्रन्थों से सिद्ध है । साथ ही यह भी सिद्ध है कि वे बार-बार लौटकर भी आते ही हैं । वेद में घटनाओं के अनुसार आख्यान नहीं होते, किन्तु आख्यानों के अनुसार घटनाएँ होती हैं । अतएव वाल्मीकिरामायण पूर्व वर्णित होने पर भी तदनुसार अवतार घटना सम्पन्न हुई थी । ‘कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं।’ ( रा० मा० १।१३९।१ ) यह भी वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों से ही सिद्ध है । केवल तुलसी की वाणी ही प्रमाण नहीं हो सकती है । तुलसी तो क्या कृष्ण साक्षात् परब्रह्म ही थे, फिर गीता केवल उनकी वाणी होने से ही प्रमाण नहीं मानी जाती । किन्तु वह उपनिषद्रूप गायों का दुग्ध है । कृष्ण उसके दोग्धा हैं— “सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।” इसलिए वेदमूलक होने से ही उसका प्रामाण्य है । बुद्ध भी भगवान् ही थे । फिर वेदनिन्दा के कारण वे स्वयं निन्दित हो गये । उनकी वाणी का प्रामाण्य वैदिक जनों में मान्य नहीं है । यह तुलसी का मत है— “जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ।” “विभिन्न रामायणों के घटनाक्रमों में बिलगाव क्यों ? इसका उत्तर इतिहास की दृष्टि से प्राप्त नहीं होता है । इसके स्पष्टीकरण के लिए गोस्वामीजी ने लीला शब्द का आश्रयण किया है ।” परन्तु यह कहना निरर्थक है क्योंकि लीला शब्द भी तुलसी का अपना नहीं है । यह भी व्यास के पुराणों का ही शब्द है— “लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्” ( ब्र० सू० २।१।३३ ), “लीलावतारचरितं पुरुषोत्तमस्य ।” मन्त्र, ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं और उपनिषद् भी वेद हैं । रामतापनीय उपनिषद् में भी रामचरित्र वर्णित है । उसमें भी इतिहास के रूप में रामचरित्र का वर्णन है और उसमें राम का परात्पर ब्रह्मरूप से ही वर्णन किया गया है । मन्त्रों में भी रामचरित्र तथा अयोध्या आदि का वर्णन है । किं बहुना, राम परमेश्वर हैं और शाश्वत हैं । वे लीलाविग्रह धारण करते हैं । यह भी इतिहास है । राम की ब्रह्मरूपता और अवतरण यह सब वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवतादि पुराणों से ही सिद्ध हैं । “भगवान् शङ्कर के द्वारा रचित रामचरितमानस के रचनाकाल के विषय में मेरी सुनिश्चित धारणा है कि वह श्रीराम के अवतार के पूर्व ही निर्मित हुआ है । इसके समर्थन के लिए भगवान् शङ्कर की त्रिकालज्ञता की दुहाई नहीं देना चाहूँगा । भगवान् शङ्कर ने सारे रामचरित्र को लीला नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है । इतिहास व्यक्ति के बाद लिखा जाता है । किन्तु नाटक तो लिखे जाने के पश्चात् ही खेला जाता है । भगवान् शिव ने रामचरितमानस के रूप में एक महानाटक की रचना की और त्रेतायुग में अवतरित होकर भगवान् राम ने उसे विश्वरङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किया ।” यह सब भी कोई नयी बात नहीं है । ‘लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्’ के अनुसार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के निर्माण की घटना भी परमेश्वर की लीला ही है । फिर उनका ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में प्रकट होना भी लीला ही है । यह केवल तुलसी की ही मान्यता नहीं है । तुलसी ने तो पुरानी मान्यता को ही दुहराया है ।