रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७१ कामजय के पश्चात् जहाँ देवर्षि अहङ्कार में उन्मत्त हो उठते हैं, वहाँ कामग्रस्त होने के पश्चात् भगवान् के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी त्रुटि स्वीकार करते हैं। पतिव्रता वृन्दा का व्रत नष्ट करना भी इसी सत्य को प्रकट करने के लिए था। निष्ठा का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि व्यक्ति अपनी उस शक्ति के द्वारा अधर्म को अमर बनाने की चेष्टा करे। निष्ठा का केन्द्र भी व्यक्ति नहीं आदर्श को ही होना चाहिये। जब तक दोनों का समन्वय नहीं होगा तब तक ऐसा धर्म किसी व्यक्ति के अहं को, उसके गौरव को प्रतिष्ठापित तो कर सकता है, किन्तु उस व्यक्ति का वह धर्म लोकमङ्गल के लिए घातक सिद्ध होता है। निष्ठा का वास्तविक तात्पर्य सर्वव्यापक ब्रह्म को एक केन्द्र से अभिव्यक्त करना चाहिये। जब पतिव्रता पति के प्रति निष्ठावती बनती है तब इसका अभिप्राय पति में ईश्वर का साक्षात्कार करना है। यदि पति के प्रति ऐसी पूर्णता की भावना पतिव्रता के मन में न हो तब उसके लिए निष्ठा का निर्वाह असम्भव है। यदि व्यक्ति किसी आराध्य के चित्र को सामने रखकर पूजा कर रहा हो और उसी का आराध्य देव आकर द्वार खटखटाने लगे तब क्या पुजारी चित्र की पूजा ही करता रहे, अथवा उठकर आराध्य का स्वागत करे ? निष्ठा की अन्तिम परिणति ईश्वर की उपलब्धि है। वृन्दा ने जिसे अपने पातिव्रत की च्युति मान लिया था वस्तुतः वह उसकी निष्ठा की सच्ची सार्थकता थी। इसी लिए वृन्दा तुलसी के रूप में परिणत हो गयी और भगवान् विष्णु शालिग्राम के रूप में तुलसी को मस्तक पर धारण करते हैं। विष्णु ने वैसा करके पतिव्रता को अतुल गौरव प्रदान किया। तुलसी के रूप में अपनी सङ्गिनी बनाकर वृन्दा को भी इस सत्य का साक्षात्कार करा दिया कि निष्ठा का चरम लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार है। निष्ठा साधन है साध्य नहीं। पातिव्रत की शक्ति जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से प्रेरित हो जिस व्यक्ति का जीवन समाज के लिए घातक हो उस समय धर्म और अधर्म के सूक्ष्म विवाद का अवसर आता है। वहाँ पतिव्रता की शक्ति का दुरुपयोग हो रहा था। ऐसी स्थिति में धर्म अधर्म का कवच बनकर उसे अनिष्ट से बचाने की चेष्टा करता है। युद्ध में योद्धा पर विजय प्राप्त करने के लिए कवच को नष्ट करना ही पड़ता है, क्योंकि कवच व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है। जब धर्म अधर्म के लिए कवच का कार्य करे तो उस समय धर्म पर प्रहार न करने से अधर्म ही विजयी होता है। ऐसा धर्म जो अधर्म के विजय में सहायक हो, जो धर्म को ही नष्ट करने में सहायता दे तो क्या उसे धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये ? जालन्धर की मृत्यु से अगणित स्त्रियों के पातिव्रत का रक्षण हुआ है। अतः लोकधर्म की रक्षा के लिए एक व्यक्ति की निष्ठा को मिटाना आवश्यक ही था। उक्त समाधान बहुत अंशों में ठीक हो सकता है। परन्तु इसपर भी सूक्ष्म विचार आवश्यक है। कई लोग तो इसी कारण कहते हैं कि वह विष्णु जो वृन्दा का पातिव्रत नष्ट करता है, ईश्वर ही नहीं है। वह कोई विषयी जीव था। इसी लिए उनकी दृष्टि में पुराणों पर अधिक विश्वास करना ही उचित नहीं है। इतना ही नहीं वे शास्त्रप्रामाण्य केवल व्याकरण तक ही सीमित मानते हैं। “शब्दप्रमाणका वयं तस्माद् यदाह शब्दः तदेव नः प्रमाणम्” परन्तु उनका उक्त कथन भ्रमपूर्ण है। महाभाष्य से भी अधिक प्राचीन और प्राणभूत गीता तो हर एक कार्य और अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र को ही प्रमाण कहती है। उसकी दृष्टि में शास्त्रविधि को छोड़कर मनमानी चेष्टा करनेवाले को सिद्धि, सुख, परागति इनमें कुछ भी नहीं मिलता है—
७७२ रामायणमीमांसा एकविंश “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” (गीता १६।२३,२४) यदि वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य स्वीकृत न होगा तो विष्णु, जालन्धर, वृन्दा आदि का अस्तित्व भी सिद्ध न हो सकेगा । यह नहीं हो सकता कि मुर्गी का आधा हिस्सा पकाकर खा लें और आधा भाग अण्डा देने के लिए छोड़ दें । शास्त्र के एक अंश को मान लें और अन्य अंश को छोड़ दें । नितरां स्थिति को ही निष्ठा कहा जाता है । सब निष्ठाओं का पर्यवसान भगवान् में नहीं होता । अधर्मनिष्ठा प्राणी को नरक ही ले जाती है । काम्यकर्मनिष्ठ प्राणी को स्वर्गादि में पहुँचाती है । भक्ति, ज्ञाननिष्ठा तथा निष्काम शास्त्रोक्त कर्मनिष्ठा साक्षात् या परम्परा से ब्रह्मप्राप्ति में हेतु होती है। नारद की ब्रह्मचर्यनिष्ठा का कोई दोष नहीं था । दोष था अहङ्कार का । यदि किसी को भक्त होने का अहङ्कार हो तो उससे भी हानि ही होती है । भगवान् ने देवर्षि नारद के ब्रह्मचर्यव्रत को नष्ट नहीं किया था, किन्तु नष्ट होने से बचाया था । यदि विवाह हो जाने दिया जाता तो देवर्षि का ब्रह्मचर्य भङ्ग हो जाता । जैसे कुपथ्य मांगनेवाले रोगी को कुपथ्य न देकर हितैषी उसकी रक्षा ही करता है । वैसे ही भगवान् ने नारद की कुपथ्यसम्बन्धी माँग को न देकर उनकी ब्रह्मचर्यनिष्ठा की रक्षा की थी । परन्तु शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अधर्म प्रतीत होने पर भी धर्म ही होते हैं । जैसे झूठ बोलना पाप, सत्य बोलना धर्म है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध है— “सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप ।” “अश्वमेधसहस्रञ्च सत्यञ्च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥” सहस्रों अश्वमेधों की अपेक्षा एक सत्य ही श्रेष्ठ होता है, फिर अगर उसी सत्य से किसी गाय या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो वह सत्य ही पाप है । वहाँ वैसी गोहत्या और ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ ही बोलना उचित है । किसी महात्मा के सामने से कोई गाय या सन्त एवं सज्जन ब्राह्मण भागकर जङ्गल में छिप गया हो और उसका पीछा करनेवाला हत्यारा (घातक) आकर उसके सम्बन्ध में पूछ-ताछ करता है तो महात्मा को चाहिये कि यदि मौन रहने से काम चल जाता हो तो मौन रहकर वैसे सज्जनों के प्राण बचाने चाहिये । परन्तु यदि मौन रहने में घातकों के उस मार्ग से अपने शिकार के पास पहुँच जाने का सन्देह पैदा होता हो तो झूठ बोलकर भी उनकी रक्षा करनी चाहिये । “येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ॥ अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथञ्चन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन् वाऽप्यकूजनात् ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।” (म० भा० शा० प० १०९।१४, १५) जो चोर, डाकू आदि अन्याय से किसी का धन लेना चाहते हैं। उन्हें धनिक का पता नहीं बताना चाहिये । जो दान, भिक्षादि द्वारा धन लेना चाहते हैं । उन्हें बताने में कोई दोष नहीं है। इतना ही नहीं यदि मौन
रहने से काम चल जाय तो मौन रहना ठीक है। यदि मौन से साधु पुरुषों की रक्षा नहीं होती हो, न बोलने से शङ्का होती हो और अवश्य बोलना पड़े तो झूठ बोलकर भी सत्पुरुषों का बचाव करना चाहिये । “यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथादपि । न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथञ्चन ॥ पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।” (म० भा० शान्ति प० १०९।१६,१७) झूठी शपथ द्वारा भी दुष्टों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिये । यहाँ सत्य की अपेक्षा झूठ ही श्रेष्ठ है, क्योंकि दुष्टों को दिया हुआ धन दाता को भी पीड़ा ही पहुँचाता है। “मा हिंस्यात्” इस वेदवचन से निषिद्ध होने के कारण यद्यपि हिंसा अधर्म है तथापि “अग्नीषोमीयं पशुमालभेत” के अनुसार क्रतु के उपकार के लिए की गयी हिंसा धर्म ही है। यह सब “अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्” ( ब्र० सू० ३।१।२५ ) में स्पष्ट है। कहीं सत्य कहीं अनृत ही बोलना चाहिये। जहाँ अहिंसा के कारण अनृत सत्य हो जाता हो और हिंसा के कारण सत्य अनृत हो जाता हो, जहाँ सत्य अहिंसा, उपकार आदि में पर्यवसित न होता हो उस स्थल में मूढ़ सत्यवादी भी बाधित होता है। सत्य और अनृत का यथावत् जाननेवाला धर्मतत्त्वज्ञ होता है। इसी आधार पर अकृतप्रज्ञ अतिदारुण अनार्य भी उसी तरह महान् पुण्य का भागी होता है जैसे वलाक सब प्राणियों के वधार्थ उद्यत अन्ध घ्राणचक्षु के वध से पुण्य का भागी हुआ था। इसमें आश्चर्य क्या है ? धर्म की कामनावाला भी सत्यवादी अधर्म निश्चय के कारण डाकुओं एवं गोघातकों को साधुओं एवं गायों का पता बताकर पाप का भागी हुआ था। तत्त्वज्ञ उसी प्रकार पुण्य का भागी होता है, जैसे गङ्गातीर में सर्पिणी के अण्डों को नष्ट करके उलूक पुण्य का भागी हुआ था— “भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् । यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिश्चितम् । सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ।। अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः । सुमहत् प्राप्नुयात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ।। किमाश्चर्यञ्च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् । सुमहत्प्राप्नुयात्पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ।।”(म०भा० राजधर्मानुशासनपर्व १०९।५-८) वस्तुतः प्राणियों में प्रभव के लिए अर्थात् अभ्युदय, अहिंसा, अपीडन और धारण के लिए ही धर्म का प्रवचन किया गया है। अतः व्यापक रूप से प्राणियों का अभ्युदय, अपीडन और संरक्षण जिससे होता है, वह चाहे सत्य हो चाहे असत्य, किन्तु वही धर्म है। यद्यपि अहिंसा और सत्य दोनों ही शास्त्रविहित हैं तथापि अहिंसाविरोधी सत्य अग्राह्य है। इसी लिए गीता ने हित, मित, प्रिय और सत्य भाषण को ही सत्य कहा है, केवल सत्य को नहीं— “प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यात्प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मेण विधृताः प्रजाः । यः स्याद्धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यादहिंसासंपृक्तः स धर्मं इति निश्चयः ।।"
७७४ रामायणमीमांसा एकविंश जहाँ सत्य निरपराधों का संरक्षक न होकर उनके नाश का कारण बनता हो वह धर्म नहीं है ! इसी दृष्टि से यदि किसी एक स्त्री के पातिव्रत से सुरक्षित जालन्धर लाखों स्त्रियों का पातिव्रत्य-भङ्ग करता हो और शिव की पार्वती को अपनी पत्नी बनाने का प्रयत्न करता हो और संसार में हिंसा का विस्तार कर के सम्पूर्ण वैदिक धर्म-कर्म को नष्ट कर के लोक का उत्सादन करता हो और जिस पातिव्रत्य के कारण शिवजी के लिए भी अजेय बना हो उस एक स्त्री के पातिव्रत्य का भङ्ग करना धर्म ही है अधर्म नहीं, क्योंकि उससे लाखों का पाति- व्रत्य बचेगा, लाखों की जानें बचेंगी । वेदोक्त धर्म-कर्म की रक्षा होगी । उससे उस अन्यायी असुर का विनाश होगा जिसके द्वारा अहिंसा, धर्म, न्याय और संसार की रक्षा को खतरा उत्पन्न हुआ है । अधर्म का बचाव करनेवाले कवच- रूपी धर्म का विनाश करना ही उचित है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसमें वृन्दा का क्या दोष है ? जो दोष है वह जालन्धर का है । वृन्दा तो अपना धर्म पालन करती है । पति को परमेश्वर मानकर पूजती है । यही उसका धर्म है । उस अपने इष्ट की रक्षा करना भी उसका कर्त्तव्य ही है । पर उसका उद्देश्य अधर्म, हिंसा या व्यभिचार फैलाना तो नहीं है । पर जिस किसी तरह से भी हो चाहे न चाहे उसके पातिव्रत्य से उसका अत्याचारी हिंसक जब अपरिगणित पतिव्रताओं का पातिव्रत्य नाशक असुर अमर होता है, अवध्य होता है तो उसके मूलभूत एक पातिव्रत्य का कोटि-कोटि पातिव्रत्यों की रक्षा के लिए ध्वंस होना ही उचित है । लाघव और गौरव की दृष्टि से भी यही धर्म है । फिर भी जैसे अनधिकृत व्यक्ति द्वारा हत्यारे की भी हत्या पाप ही है । हत्यारे की हत्या करनेवाला अन- धिकृत व्यक्ति भी मृत्युदण्ड पाता है । राजा ही दण्ड देने का अधिकारी होता है । उसके द्वारा नियुक्त अधिकृत व्यक्ति ही हत्यारे को प्राणदण्ड दे सकता है, अन्य नहीं । इसी तरह कर्मफल दाता भगवान् विष्णु ही हैं । वे ही लाखों के पातिव्रत्य के रक्षणार्थ, लोकरक्षणार्थ तथा धर्मरक्षणार्थ एक वृन्दा का पातिव्रत्य-भङ्ग कर सकते हैं और वृन्दा को पातिव्रत्य धर्म का सर्वोत्कृष्ट फल भी प्रदान कर सकते हैं । आखिर सभी धर्मों का अन्तिम परमफल तो भगवत्प्राप्ति ही है । भगवान् ने सीधे उसके धर्म का हरण करके उसके धर्म का परमफल भगवत्प्राप्ति उसे सुलभ करा दिया । शास्त्रों के अनुसार जैसे विष्णु, विष्णुप्रतिमा शालग्राम की पूजा करते करते प्राणी विष्णु की प्राप्ति कर लेता है वैसे ही स्त्री परम मुख्य पति विष्णु की प्रतिमास्वरूप लौकिक पति की पूजा करते करते परम मुख्य पति विष्णु को प्राप्त कर लेती है । विवाह में वर को विष्णुरूप मानकर उसे लक्ष्मीरूपा कन्या का प्रदान किया जाता है । वैसा ही संकल्प पढ़ा जाता है—"इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे" । इस स्थिति में जैसे विष्णु-प्राप्ति होने पर शालग्राम की पूजा का छूट जाना कोई दोष नहीं है उसी तरह परमपति विष्णु की प्राप्ति में वृन्दा का जालन्धरसम्बन्धी पातिव्रत्य-भङ्ग हो जाना कोई दोष नहीं है, क्योंकि उसका फल उसे प्राप्त हो गया । भगवान् शङ्कराचार्य के अनुसार और तुलसी के अनुसार ईश्वर जीव का सम्बन्ध वारिवीचिसम्बन्ध जैसा ही है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) "सो तैं ताहि तोहि नहि भेदा । बारि बीचि जिमि गावहि बेदा ॥” (रा०मा० ७।११०।३) हे नाथ ! यद्यपि हमारा आपका भेद नहीं है तथापि मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं । जैसे समुद्र का तरङ्ग कहा जाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहा जाता है । वह तू है उसमें तुझमें भेद नहीं है । भेद वैसा ही है जैसा वारि और वीचि का भेद है ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७५ इस दृष्टि से विष्णु सच्चिदानन्द-समुद्र हैं । अनन्तानन्त जीव उनकी अनन्तानन्त तरङ्ग ही हैं । अतएव वे भी चेतन, अमल, सहजसुखराशि हैं । संसार के सभी जीव तरङ्ग ही हैं । पति, पुत्रादि जीव का आपसी सम्बन्ध वैसा ही है जैसे तरङ्गों का आपसी सम्बन्ध । एक तरङ्ग का अपर तरङ्गों के साथ सम्बन्ध स्थायी नहीं होता है । तरङ्गों के समान ही संयोग-वियोग होता ही रहता है । जैसे चौराहे के प्याऊ पर चारों तरफ से राहगीर आकर इकट्ठे होते हैं । आपस में मेलजोल और प्रेम की बातें करते हैं । फिर अपने-अपने रास्ते सब चले जाते हैं । किसी का कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं होता । “कति नाम सुता न लालिताः कति वा नेह वधूरभुञ्जि हिं । क्व नु ते क्व नु ताश्च के वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः ॥” कितने पुत्रों का लालन-पालन नहीं किया, कितनी ही वधुओं का सम्बन्ध नहीं किया । परन्तु आज कहाँ वे सब हैं कहाँ हम हैं । निश्चित भवसङ्गम पान्थ-सङ्गम ही है । नदी की बाढ़ में इधर-उधर से आकर काष्ठ मिल जाते हैं । कुछ दूर तक मिले भी रहते हैं । परन्तु प्रवाह के थपेड़ों से सब पुनः विभक्त होकर बह जाते हैं । वैसे ही जीव कर्मों के अनुसार पति-पत्नी आदि रूप से मिल जाते हैं— “यथा काष्ठञ्च काष्ठञ्च समेयातां महोदधौ । संयुज्य च व्यपेयातां तद्वज्जीवसमागमः ॥” परन्तु किसी भी हालत में तरङ्ग का जैसे जल के साथ वियोग नहीं होता है, उसी तरह जीवों का परमेश्वर के साथ वियोग नहीं होता । अतएव जीवों के सच्चे सङ्गी-साथी परमेश्वर ही हैं । जीव नहीं । मुख्य पति- पत्नी का सम्बन्ध भी वारि-वीचि जैसा ही है । “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीतारामपद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) सीता और राम का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा गिरा एवं अर्थ का तथा जल एवं वीचि का । इस दृष्टि से सब तरङ्गरूप जीवों के परम पति समुद्रस्वरूप भगवान् ही हैं । उनमें मुख्य निष्ठा ही मुख्य पातिव्रत्य है । उन्हें छोड़कर अन्य जीवों से सम्बन्ध जोड़ना ही पातिव्रत्य-भङ्ग है । इस तरह लौकिक पातिव्रत्य धर्म है तो परम परमेश्वर के साथ अखण्डसम्बन्ध-निष्ठारूप परम पातिव्रत्य परम धर्म है । इस तरह वृन्दा के. लौकिक पातिव्रत्य को भङ्ग कर के जहाँ भगवान् ने जालन्धर का वध कराकर अगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य और लोक की रक्षा की वहीं वृन्दा को परम पातिव्रत्यरूप परम धर्म प्रदान कर उसे कृतार्थ कर लोकोत्तर पद प्रदान किया । बड़े बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र जिस भगवान् से प्रेम की भीख माँगते हैं वही भगवान् वृन्दा से प्रेम की भीख माँगते हैं । वृन्दा के लिए पागल होकर अपने लौकिक पति के साथ भस्मीभूत वृन्दा की चिता की भस्म में महीनों लोटते रहे । इसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया है कि भगवान् प्रेमास्पद ही नहीं, किन्तु प्रेमाश्रय भी हैं । जैसे भगवान् से मिलने के लिए भक्त लालायित होते हैं वैसे ही भगवान् वृन्दा से मिलने के लिए लालायित होते हैं । यहाँ तक कि छल-छद्म से भी वृन्दा की प्राप्ति के लिए सचेष्ट होते हैं । उसके प्रेम न करने पर भी उससे प्रेम करते हैं । उसके शाप देने पर भी उसके शाप को अङ्गीकार कर के शालग्राम शिला बनकर भी तुलसी का वियोग नहीं सहन कर सकते । हजारों व्यञ्जन समर्पण करने पर भी तुलसी बिना कोई नैवेद्य ग्रहण नहीं करते हैं ।
७७६ रामायणमीमांसा एकविंश तुलसी के पातिव्रत्य धर्म से ही सन्तुष्ट होकर अथवा उसके जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों एवं भक्ति-भावनाओं के वशीभूत होकर ही भगवान् तुलसीरूप में भी वृन्दा को अपनाते हैं। उसके रूपसौन्दर्य या यौवन के वशीभूत होकर नहीं। सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी जिसकी दासी है। सौन्दर्य-माधुर्य सारसर्वस्व राधारानी जिसकी अनन्य आराधिका है। अनन्त अनन्त लक्ष्मीरूप गोपाङ्गनाएँ जिसके पीछे पीछे पागल हुई भटकती हैं, उसे वृन्दा के रूप और यौवन की अपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। गोपाङ्गना ऊपर से नन्दरानी के पास गोपाल की शिकायत करने जाती थीं, परन्तु भीतर से चाहती थीं कि कृष्ण हमारे घरों में दधि, नवनीत की चोरी के लिए पधारें और उनकी बाट जोहती थीं। कृष्ण उनसे छाछ मांगते थे। दधि और नवनीत की चोरी करते थे। तभी तो भक्त कहता है कि— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैर्मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु” यह ठीक है कि वेदविहित कर्म पुण्य है और वेदनिषिद्ध कर्म अधर्म है— “वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।” ( भाग० ६।१।४० ) इस दृष्टि से पत्नी का एकपतिनिष्ठ होना शास्त्र विहित है, अतः पातिव्रत्य धर्म है और उत्कृष्ट धर्म है। उसके प्रभाव से सावित्री ने अपने पति को यम के हाथों से लौटा लिया था। उसी के प्रभाव से शाण्डिली ने सूर्योदय रोक दिया था। उसी के प्रभाव से वृन्दा का पति जालन्धर अजेय हो गया था। फिर भी वही विहित कृत्य धर्म है जो अनर्थशून्य हो। वेदविहित भी वही कृत्य धर्म है, जो फलकाल में भी अनर्थ से सम्बद्ध न हो। जो केवल प्रीति का हेतु हो। इसी लिए—‘‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’’ ( जै० सू० १।१।२ ) इस धर्मलक्षणबोधक जैमिनिसूत्र में अर्थ इस पद का संनिवेश है। इसी कारण श्येनादि अनर्थकारण याग अर्थरूप न होने से धर्म नहीं हैं। भट्टपाद ने कहा है कि— “फलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबद्ध्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वात् तद् धर्म इति कथ्यते ॥” फल द्वारा भी जो कर्म अनर्थ से संसृष्ट नहीं होता जो केवल सुख का हेतु हो वही धर्म है। श्येनादि याग का फल है शत्रुमरण। वह अन्त में नरक का हेतु होता है। अतः वह धर्म नहीं है। “नानापुराणनिगमागमसम्मतम् ।” ( रा० मा० १। मङ्गलाचरण ७ ) ‘ तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥ तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोही ।” ( रा० मा० १।१२०।२, ३ ) “अब सुनु परम विमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ।।” ( रा० मा० ७।८५।१ ) आदि अनेक वचनों से तुलसीदासजी वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य वर्णन करते हैं और उनकी सब उक्तियों का परम आधार वेदादि शास्त्र ही हैं। उसके सम्बन्ध में आजकल के वक्ताओं का किन्तु, परन्तु सर्वथा उपेक्षणीय ही है।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७७ वृन्दा "तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्म वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥" तप, अध्ययन, स्वाभाविक वेदविधान-यज्ञ, उञ्छ, शिल आदि वृत्तियाँ सुपुण्य हैं, पाप नहीं। किन्तु वही सब भावदुष्ट होने पर पाप बन जाती हैं। भगवान् राम ने तपस्वियों के तप की रक्षा के लिए दण्डकवन की यात्रा की थी। परन्तु धुन्धु नामक दैत्य महान् तप कर रहा था। वह किसी समुद्र की रेती में विलीन रहकर प्राणायाम करता था। साल, साल के कुम्भक के बाद जब वह रेचक करता था तो धरित्री में कम्प होता था। धरित्री की धूलि चन्द्र, सूर्य को आच्छन्न कर देती थी। पर्वतों में हड़कम्प मच जाता था। समुद्र उद्वेलित हो अपनी उत्ताल तरङ्गों से विश्व को आप्लावित करने लगता था। पर उसके तप का लक्ष्य था शक्तिसम्पन्न होकर वेदादि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम धर्म का विनाश करना। इसी लिए देवता और ऋषि उसके वध के लिए प्रयत्नशील हो धुन्धुमार नामक राजा को प्रेरित कर के उसका वध कराते हैं। यज्ञ का बहुत बड़ा महत्त्व है। राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए बड़ा परिश्रम किया था। परन्तु जब लङ्का में मेघनाद और रावण का यज्ञ चल रहा था तब उसके विनाश के लिए अङ्गद, हनुमान्, लक्ष्मण आदि ने प्रयत्न किया। क्यों ? इसी लिए कि ऐसे तप एवं यज्ञ, भावदुष्ट होने के कारण, धर्म नहीं अधर्म हो गये हैं। यदि उनका यज्ञ सफल होता तो रावण और मेघनाद अजेय ही हो जाते। वस्तुतः उनका यज्ञ तो दूसरों की बहू-बेटियों के अपहरण के लिए ही था। ऐसा यज्ञ धर्म नहीं। इसी तरह वृन्दा का पातिव्रत्य-धर्म भी हजारों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु हो रहा था। अतः वह अधर्मप्राय हो गया था। उसका विध्वंस ही उस परिस्थिति में धर्म था। भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम एवं परम निष्काम थे। अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी उनकी पत्नी थी। माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता और राधा श्रीराम और श्रीकृष्ण रूप में उनकी पत्नी थीं। काम, वसन्त तथा अप्सराएँ उनके मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सके थे। लोग क्रोधवृत्ति से काम को नष्ट कर सकते हैं। परन्तु क्रोध का उपशमन करना उनके लिए कठिन ही है। वह क्रोध जिनके मन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनसे डरता है; उनके मन में काम कहाँ से कैसे आ सकता है ? भगवान् ने काम से और अप्सराओं से वर माँगने के लिए कहा और अपने ऊरु से उर्वशी जैसी दिव्य अप्सरा को प्रकट कर के इन्द्रलोक के लिए भूषण के रूप में प्रदान किया था। उसका सौन्दर्य, माधुर्य एवं कान्ति निहारकर देवता और अप्सराएँ दोनों हतप्रभ हो गये थे, अतः वे विषयभोग की दृष्टि से जालन्धर की पत्नी के पातिव्रत्य-भङ्ग के लिए प्रयत्न क्यों करते ? उन्होंने अकीर्ति या शाप आदि की चिन्ता न करके लोककल्याण ही किया- "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।" ( रा० मा० १।१२३ ) माता, पिता, गुरु और पति की महिमा शास्त्रों में बहुत वर्णित है। परन्तु वे ही सब यदि श्रीराम-प्राप्ति में बाधक हों तो उन सबका त्याग ही प्रशस्त है- "जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये तिनहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही ।
७७८ रामायणमीमांसा एकविंश पितहि तजे प्रह्लाद विभीषण बन्धु भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कान्त ब्रज वनितन भे जगमङ्गलकारी ॥” सीताहरण के कारण लंका जलायी गयी। बड़े-बड़े प्रबल राक्षसों का संहार हो गया। कुम्भकर्ण को जगाया गया। उससे सीताहरण आदि की चर्चा की गयी। उसने पहले रावण की इस अनीति के कारण भर्त्सना की। पश्चात् उसने कहा—'जब आप उस पतिव्रता धरित्री-सुता को लाये और वह पतिव्रता होने के कारण वशवर्तिनी नहीं होती थी तो माया द्वारा स्वयं राम का स्वरूप क्यों नहीं धारण कर लिया ?' रावण ने कहा मैंने वह भी कर के देख लिया। जिस समय मैंने दूर्वादलश्याम 'राम का रूप धारण किया तो मुझे ब्रह्मपद भी तुच्छ प्रतीत होने लगा फिर परस्त्रीसङ्ग की वासना का तो प्रसङ्ग ही कैसे उठ सकता था ? “आनीता भवता यदा पतिरता साध्वी धरित्रीसुता स्फूर्जद्राक्षसमायया न च कथं रामाङ्गमङ्गीकृतम् । कर्तुंञ्चेतसि रामरूपममलं दूर्वादलश्यामलं तुच्छं ब्रह्मपदं परवधूसङ्गप्रसङ्गः कुतः ॥” फिर स्वयं उन भगवान् में कामवासना से परस्त्री के पातिव्रत्य-भङ्ग में प्रवृत्ति कैसे हो सकती थी ? जालन्धर दैत्य अपनी पतिव्रता पत्नी के बल के कारण अवध्य था। वह अनेक पतिव्रताओं का पातिव्रत्य- भङ्ग करता था। रुद्रपत्नी रुद्राणी का भी वह हरण करना चाहता था। परन्तु उसका वध वृन्दा के पातिव्रत्य रहते सम्भव ही नहीं था। यहाँ धर्म ही अधर्म की रक्षा कर रहा था और अधर्म का अभेद्य दुर्ग बन रहा था। अतः जैसे शत्रु-वध के लिए उसके अभेद्य दुर्ग या अभेद्य कवच का विध्वंस आवश्यक होता है वैसे ही जालन्धर-वध के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करना आवश्यक था। वही काम भगवान् ने किया। पर वह सब किया जगन्मंगल के लिए, धर्म-रक्षा के लिए एवं लाखों पतिव्रताओं के पातिव्रत की रक्षा के लिए; काम से या स्वार्थ से नहीं । यह काम दूसरा नहीं कर सकता था, क्योंकि अन्य को वैसा करने का अधिकार नहीं था। हत्या के अपराधी को फाँसी देने का अधिकार राजा या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को ही होता है, अन्य को नहीं। अन्य व्यक्ति वैसा करेगा, तो उसको स्वयं भी फाँसी पर लटकना पड़ेगा। राजा के दण्ड से अपराधी पापों से मुक्त हो जाता है, परन्तु औरों के द्वारा वध से अपराधी अपराध से मुक्त भी न होगा और फाँसी देनेवाला भी स्वयं फाँसी पायेगा। दूसरा कोई वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करता तो वह भी नरक का भागी होता और वृन्दा का पातिव्रत- पालन निष्फल हो जाता, क्योंकि ईश्वर ब्रह्म भगवान् को छोड़कर सब जीव हैं। निषेधातिक्रमण से वे सभी पाप के भागी होते हैं। ईश्वर विधि-निषेधातीत होता है और वही कर्मफलदाता होता है। भगवान् ने यद्यपि संसार के हित के लिए अगणित पतिव्रताओं की रक्षा के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भंग किया तथापि वृन्दा के पातिव्रत का फल वृन्दा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वही कर्मफल दाता हैं। वस्तुतः पातिव्रतधर्म के द्वारा भी परमेश्वर की प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है। जैसे शालग्राम की पूजा से विष्णु-प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है एवं जैसे शालग्राम की विष्णुबुद्धि से ही पूजा की जाती है वैसे ही परमपति परमेश्वर की प्राप्ति के लिए नारी अपने पति की उपासना करती है। कन्यादान के अवसर पर संकल्प भी वैसा ही होता है—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७९ “इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे” इस लक्ष्मीरूपा कन्या को मैं विष्णुरूपी वर के लिए प्रदान करता हूँ। भगवान् ने वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग कर के पातिव्रत का परमफल उसे प्रदान कर दिया अर्थात् उसे परम पति परमेश्वर भगवान् विष्णु की प्राप्ति हो गयी। बड़े बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र जिसकी प्राप्ति के लिए जप, तप, योग, समाधि का अभ्यास करते हैं वही भगवान् वृन्दा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हुए। छल-छद्म से भी वे उसे प्राप्त करते हैं। भक्तों के लिए भगवान् प्रेम के विषय होते हैं। परन्तु यहाँ तो वृन्दा प्रेम का विषय थी, प्रेम की आस्पद थी। भगवान् तो प्रेम के आश्रय हुए। रहस्य विदित होने पर वृन्दा भगवान् को शाप देती है कि “तुम पाषाण हो जाओ” भगवान् उसके शाप को स्वीकार कर शालग्राम बन जाते हैं। फिर भी वृन्दा को तुलसी के रूप में साथ ही रखते हैं। हजारों पकवानों के होने पर भी तुलसी-दल के बिना स्वीकार नहीं करते हैं। वन्दा अपने पति जालन्धर के साथ चिता में जल जाती है, भगवान् की उपेक्षा कर के। फिर भी प्रभु उसके विप्रलम्भजन्य तीव्र ताप में विह्वल होकर उसके चिताभस्म में विलुष्ठित होते रहे। यह एकाङ्गी प्रेम अद्भुत है। भगवान् में भक्त का नहीं किन्तु भक्त में भगवान् का एकाङ्गी प्रेम, यह भक्त परवशता का उदाहरण है। वस्तुतः वृन्दा भगवान् की ही सदा सर्वदा दिव्य शक्ति लक्ष्मी के समान ही थी। किसी शापादि वश वह जालन्धर की पत्नी बनी थी। उसी स्वाभाविकी प्राचीन भक्तिवशात् भगवान् हठात् छल-छद्म से उसे प्राप्त करते हैं। उसके अधीन सदा के लिए बन जाते हैं। इससे अधिक पातिव्रत का फल क्या होगा ? वास्तव में भगवान् आनन्द- समुद्र हैं। जीव उनकी तरङ्ग चेतन अमर सहज सुखराशि हैं। तरङ्ग का जल के साथ स्थिर सम्बन्ध है। एक तरङ्ग का दूसरी तरङ्ग के साथ स्थिर सम्बन्ध नहीं है। पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि के सम्बन्ध बनते बिगड़ते रहते हैं। अतः लौकिक पति-पत्नी का सम्बन्ध अस्थिर है, वही व्यभिचार है। भगवान् का सम्बन्ध ही स्थिर होने से अव्यभिचरित सम्बन्ध है। जीवात्मा भगवान् से विमुख होकर इतर जीवों पति, पुत्रादि में आसक्त रहता है, तो वही व्यभिचार है। सबसे विमुख होकर भगवान् में अभिमुख होना ही उसका शुद्ध पातिव्रत है। यही गोपाङ्गना-भाव है। पति की काया की छाया बनना ही पातिव्रत है। तरङ्ग की स्थिति, गति और प्रवृत्ति जल की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति, गति तथा प्रवृत्ति बिम्ब की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। घटाकाश महाकाश के पराधीन होता है। जीवात्मा इसी प्रकार भगवान् की काया की छाया बनकर भगवान् को प्राप्त कर लेता है। कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण कुछ लोग कुब्जा के प्रसङ्ग को लेकर श्रीकृष्ण के चरित्र पर आक्षेप करते हैं, परन्तु जिस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण का कुब्जा के साथ अङ्गसङ्ग वर्णित है उसी में श्रीकृष्ण को परात्पर ब्रह्म कहा गया है और यह भी कहा गया है कि प्राणीमात्र के कल्याणार्थ निर्गुण निराकार भगवान् का श्रीकृष्णरूप में प्राकट्य हुआ है। अतः उनमें काम, क्रोध, भय और स्नेह से अथवा किसी तरह भी मन लगाने से प्राणी का कल्याण हो सकता है—
७८० रामायणमीमांसा एकविंश “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” काम से और भय से जैसे प्राणी तन्मयता को प्राप्त होता है वैसे अन्य उपायों से नहीं । “यथा कामाद् भयाद् वापि मर्यस्तन्मयतामियात् । न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥” वही वस्तु लोकसम्बन्ध में निन्य होने पर भी भगवत्सम्बन्ध से प्रशंसनीय हो जाती है। संसार की तृष्णा निन्द्य है, परन्तु भगवान् के पाने की तृष्णा प्रशंसनीय होती है। संसार की इच्छाएँ त्याज्य होती हैं, भगवत्तत्त्वज्ञान की इच्छा जिज्ञासा यज्ञ, तप, दान आदि से साध्य होती है— “तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन ।” (बृ०उ० ४।४।२२) जैसे चिन्तामणि की ओर दीपकबुद्धि से भी प्रवृत्ति होने से चिन्तामणि की ही प्राप्ति होती है, दीपक की नहीं। उसी तरह श्रीकृष्ण परमात्मा में जार (उपपति) बुद्धि से भी प्रवृत्ति होने पर परमेश्वर की ही प्राप्ति होती है, जार की नहीं। लौकिक जार धर्म, पुण्य और परलोक को जलाता है। किन्तु श्रीकृष्ण अविद्या-ग्रन्थि, कर्म-जाल तथा पञ्चकोशों को जलाते हैं। इसी लिए वे भी जार हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान् आनन्दसमुद्रतुल्य हैं। जीव सब उनके तरङ्गतुल्य हैं। यही शङ्कराचार्य भी मानते हैं— “सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” ( षट्पदी ) “बारि बीचि जिमि गावहिं बेदा ।” ( रा० मा० ७।११०।३ ) एक तरङ्ग का तरङ्गान्तरों के साथ सम्बन्ध अस्थिर तथा व्यभिचरित होता है। किन्तु तरङ्गों का समुद्र के साथ सम्बन्ध स्थिर नित्य होता है। वैसे ही पति, पुत्र और पत्नी रूप से जीवों का सम्बन्ध अस्थिर एवं अनित्य ही होता है। किन्तु उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध ही स्थिर हैं। इस तरह कुब्जा एवं गोपाङ्गनाएँ तथा उनके पति सभी जीव हैं। उनका पारस्परिक सम्बन्ध अस्थिर है। भगवान् का सम्बन्ध ही समुद्र-तरङ्ग के तुल्य नित्य है। अतः कुब्जा आदि का लौकिक पति आदि जीवों का सम्बन्ध ही व्यभिचार है, भगवत्सम्बन्ध ही शुद्ध पातिव्रत है। पति-पत्नी का सम्बन्ध भी वारिवीचि से उपमित है— “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) नन्ददासजी के अनुसार गोपाङ्गनाओं के अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम रोम में श्रीकृष्ण इस तरह भरपूर हैं जैसे तरङ्गों में जल भरपूर होता है— “तरङ्गनि वारि ज्यों ।” सम्भोग भी भोक्ता का भोग्य के साथ तादात्म्यापत्ति ही है। “सविता गोभी रसं भुङ्क्ते” सविता अपनी किरणों से भूमि के रस का सम्भोग करते हैं। दिव्यदम्पती पति-पत्नी भी प्रेमोद्रेक में व्यवधानशून्य होकर मिलते हैं। हार, भूषण, कञ्चुकी आदि का व्यवधान असह्य होता है। प्रेमोद्रेकजनित रोमाञ्च-व्यवधान भी बाधक प्रतीत होता है। सर्वाधिक व्यवधानराहित्य तरङ्ग और जल में ही है।
किसी दृष्टि से तो चन्द्र-चन्द्रिका तथा भानु-प्रभा जैसा अव्यवधान अभीष्ट होता है। जैसे गङ्गाजल से भी अन्तरङ्ग उसकी शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता का सम्बन्ध होता है। आनन्दसिन्धु की तरङ्ग की अपेक्षा भी उसकी मधुरिमा का सम्बन्ध अन्तरङ्ग होता है। उसी तरह आनन्दसुधासिन्धु कृष्ण में तरंगस्थानीया गोपाङ्गनाएँ हैं किन्तु उनके माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री श्रीराधा हैं। उनका सम्बन्ध अत्यधिक अन्तरंग है। इस अत्यन्त अभेद में रमण और सम्भोग शब्द का प्रयोग होता है। भारतीय शास्त्रों में इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग मिलते हैं जो कि अश्लील-से प्रतीत होते हैं। गीता में कहा गया है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । ( गीता १४।३ ) महद् ब्रह्म प्रकृति मेरी योनि है। इसमें मैं गर्भाधान करता हूँ। यहाँ प्रकृति में ब्रह्मरूपी बिम्ब का प्रतिबिम्ब डालना ही गर्भाधान है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि जैसे कोई प्रियतमा भार्या का आलिंगन करके आनन्दोद्रेक में आन्तर और बाह्य सभी प्रपञ्चों को भूल जाता है वैसे ही जीवात्मा सुषुप्तिकाल में परमात्मा से मिलकर आनन्दोद्रेक में सब कुछ भूल जाता है— “तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तर- मेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम् ।।” (बृ०उ० ४।३।२१) “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते । (छा० उ० ६।८।१) कबीरदास तक सातवें आसमान में अपने निर्गुण पिया की सेज की कल्पना कर वहाँ पहुँचने की तैयारी करते हैं। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के सम्मिलन में नायिका तथा नायक के सम्मिलन और रमण का आरोप किया जाता है। इसमें भी स्वसुखसुखित्व की भावना के कारण कुब्जा की साधारणी रति मणि तुल्य दुर्लभ होती है। रुक्मिणी प्रभृति की समञ्जसा रति में तत्सुखसुखित्व एवं स्वसुखसुखित्व का समन्वय होने से वह चिन्ता- मणि के तुल्य अतिदुर्लभ है। गोपाङ्गनाओं की रति शुद्ध तत्सुखसुखित्व की होने से वह समर्था रति कौस्तुभमणि के तुल्य अनन्यलभ्य है। संसार से विमुख होकर भगवत्सम्मिलन-सुख प्राप्त करना योगीन्द्र-मुनीन्द्रों का लक्ष्य होता है। परन्तु वहाँ भी “निःसंगः प्रज्ञया भवेत्” के अनुसार सुखास्वादन की आसक्ति का त्याग विवक्षित होता है। इसे पर वैराग्य कहा जा सकता है। दृष्ट एवं आनुश्रविक विविध विषयों से वितृष्णता अपर वैराग्य है। परन्तु गुणों से भी शान्ति, सत्त्वपुरुषान्यताख्याति आदि दिव्य सात्त्विक भावों से भी निःस्पृहता होनी ‘पर वैराग्य’ है। ब्रह्मरसास्वादन में भी स्वसुख के लिए नहीं, किन्तु कृष्णसुख के लिए ही सर्वचेष्टा तत्सुखसुखित्व है। इसी प्रकार अन्यपरा श्रुतियाँ परकीया मानी जाती हैं। ब्रह्मपरा स्वकीया मानी जाती है। “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” (क० उ० २।१५ ) के अनुसार सभी वेद-मन्त्रों का महातात्पर्य ब्रह्म में ही है, फिर भी इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि के भी सूक्त हैं। वे इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं का भी प्रतिपादन करते हैं। परन्तु इसका अभिप्राय यही है कि उन उन मन्त्रों और सूक्तों का अवान्तर तात्पर्य उन उन देवताओं में होने पर भी उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्म में ही है। वस्तुतः जैसे किसी पादुका, पाषाण या प्रासाद कहीं पर भी पादविन्यास भूमण्डल पर ही पादविन्यास हैं, क्योंकि वे सभी भूमण्डल के ही विकार हैं। उसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि किसी का भी प्रतिपादन ब्रह्म का ही
७८२ रामायणमीमांसा एकविंश प्रतिपादन है, क्योंकि वे सभी ब्रह्म के ही विकार हैं। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० उ० २।१), 'विज्ञानं ब्रह्म' (तै० उ० ३।५), 'आनन्दो ब्रह्म' (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियाँ अन्यसम्बन्ध के बिना शुद्धरूप से ब्रह्मसम्बद्ध ही हैं। प्रथम कोटि की श्रुतियाँ अन्यपूर्विका हैं, द्वितीय कोटि की अनन्यपूर्विका हैं। अन्यपूर्विका श्रुतियाँ कृष्ण की परकीया हैं तथा अनन्यपूर्विका स्वकीया हैं। उनके पति उनके प्रतिपाद्य इन्द्र, वरुण आदि भिन्न भिन्न देव हैं। रघुवंश महाकाव्य में शिव एवं पार्वती को वाक् और अर्थ के समान परस्पर संपृक्त माना है— “वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” (रघुवं० १।१) इस प्रकार के सम्बन्ध को ही 'गिरा अर्थ जल वीचि सम' इस पद्य में तुलसीदासजी ने भी व्यक्त किया है। ऐसे अभेद, तादात्म्य आदि सम्बन्धों को ही रमण और सम्भोग आदि संज्ञा दे दी जाती है। विद्वानों की दृष्टि में 'स्वातन्त्र्यं पुंस्त्वम्' और 'पारतन्त्र्यं स्त्रीत्वम्' का सिद्धान्त है। सभी जीवों में परतन्त्रतारूप स्त्रीत्व स्वाभाविक है। स्वातन्त्र्य तो केवल एक परमेश्वर में ही है। इस दृष्टि से सभी जीव परतन्त्र होने से स्त्री ही हैं। स्वतन्त्र होने से पुरुष तो एकमात्र श्रीकृष्ण भगवान् ही हैं। इसी लिए गोपाङ्गना-भाव की प्राप्ति ही जीव के कल्याण का मार्ग है। जैसे पतिव्रता पति की काया की छाया बन जाती है। पति के मन में मन, हृदय में हृदय एवं आत्मा में आत्मा मिलाकर तदधीन स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाली हो जाती है। इसी तरह जीव भी यदि भगवान् की स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाला हो तो उसकी स्थिति ही गोपाङ्गना-भाव है। इसी दृष्टि का चित्रण करते समय स्त्री-पुरुष के रमण का रूपक दे दिया जाता है। इसी दृष्टि से कुब्जा और कृष्ण की कथा है। केवल बाहुपाश और स्तन के भीतर ही नहीं, किन्तु अपने अन्तःकरण, अन्तरात्मा और रोम-रोम में श्रीकृष्ण को स्थापित करना ही जीव का भगवान् के साथ रमण है। हरिश्चन्द्र हरिश्चन्द्र के सम्बन्ध में भी लेखक का दोषारोपण निरर्थक ही है। हरिश्चन्द्र ने वरुण से कहा था कि यदि आपकी कृपा से मेरे पुत्र हो तो उसके द्वारा मैं आपका यजन करूँगा। रोहिताश्व पुत्र उत्पन्न हुआ। वरुण ने कहा "पुत्र हो गया अब उससे यजन करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा "अभी तो नामकरण नहीं हुआ, नामकरण के बाद यजन करेंगे।" नामकरण के बाद फिर वरुण आये। तब कहा कि अभी दन्तहीन है। दन्त होने के अनन्तर यजन करेंगे इत्यादि। युवक होते ही रोहिताश्व आखेट के प्रसङ्ग से अरण्य चला गया। वहाँ से कई बार नगर आने को प्रस्तुत हुआ, परन्तु इन्द्र उसे विचरण का ही उपदेश करके रोकते रहे। अन्त में रोहिताश्व के पिता हरिश्चन्द्र जलोदर रोग से ग्रस्त हो गये। वरुण के प्रति की गयी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने के लिए शुनःशेप को खरीद कर वरुण का यजन किया। विश्वामित्र के उपदेश से शुनःशेप भी विभिन्न सूक्तों से वरुणादि की स्तुति कर मुक्त हो गया। इस ढंग की कथा ऐतरेयब्राह्मण आदि ब्राह्मणग्रन्थों में है। परन्तु अनादि जीव के अनादि जीवन में कौन-कौन घटनाएँ होती हैं। इसका ठिकाना नहीं। कभी का डाकू वाल्मीकि कालान्तर में महर्षि वाल्मीकि हो सकता है, हरिश्चन्द्र की पूर्वोक्त घटनाएँ तो कोई बहुत अनुचित नहीं हैं। अपने शिशु के बचाने की दृष्टि से कालातिक्रमण का प्रयत्न अनुचित
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८३ नहीं कहा जा सकता है। फिर 'अन्ते या मतिः सा गतिः', 'अन्त भला सो भला' के अनुसार हरिश्चन्द्र की अन्तिम स्थिति की सत्यनिष्ठा सर्वोत्कृष्ट रही। उन्होंने सत्यरक्षा के लिए राज्य त्याग दिया। पत्नी और पुत्र का विक्रय कर अपना भी विक्रय किया और डोम के गुलाम बनकर सत्यनिष्ठा से उसकी नौकरी बजायी। मृत पुत्र के दहनादि के लिए अपेक्षित टैक्स वसूल करते समय पत्नी और पुत्र को पहचान लेने पर भी वे कर्तव्य पालन से नहीं हटे। अनादि काल में एक बार की ब्रह्मात्मनिष्ठा निर्णयरूप में आदरणीय होती है वैसे ही अन्तिम धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा प्राणी के जीवन को अलौकिक कर देती है। विश्वामित्र इसी प्रकार श्रीविश्वामित्र के सम्बन्ध में लेखक ने बहुत सी अनर्गल कल्पनाएँ की हैं। यहाँ भी भले उनके प्राक्कालिक जीवन में अनेक उग्रताएँ भी रही हों। परन्तु अन्तिम स्थिति में वे महातपा ब्रह्मविद्वरिष्ठ हो गये। महा- सिद्ध महर्षि वसिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि कहा और वे महाभाष्य के अनुसार स्वयं ही नहीं, किन्तु अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के सहित ब्रह्मर्षि हो गये। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ने उनके शिष्य होकर पाद-संवाहनादि सेवाएँ कीं। वसिष्ठ श्रीवसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक ने और भी अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ की हैं। परन्तु वसिष्ठ साक्षात् ब्रह्मा के पुत्र थे। निमि के शाप से देहपरित्याग कर मैत्रावरुण के तेज से महर्षि अगस्त्य के समान वे वसतीवरी यज्ञपात्र से उत्पन्न होकर कुम्भज भी कहलाये। किसी दिव्य अप्सरा के दर्शनप्रसङ्गज से ही मित्र एवं वरुण के तेज का प्राकट्य हुआ था। इतने मात्र से उन्हें वेश्यापुत्र कहना सर्वथा उपेक्षणीय है। सामान्यतया मनुष्यत्व, पशुत्व आदि जातियों में देह के रहते परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी लिए पशु, पक्षी आदि जातियाँ जैसे उसी देह में बदलती नहीं उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियाँ देह के रहते बदलती नहीं हैं। परन्तु जैसे विशेष तप या वर या शाप से राजा नहुष अजगर हो गया, नन्दी देवता हो गये, उसी प्रकार तपस्या विशेष से क्षत्रिय आदि ब्राह्मण हो सकते हैं। प्रकृति में सब शक्तियाँ विद्यमान होती हैं। सिद्धों के सङ्कल्पविशेष से प्रकृति का आवरण भेद होकर प्रकृत्यापूर से जात्यन्तर परिणाम हो सकता है। पूर्वजात्यारम्भक परमाणुओं का विघटन होकर अभीष्ट जात्यारम्भक परमाणुओं के सङ्घटन द्वारा अभीष्ट जात्यन्तर का निर्माण हो जाता है। विश्वामित्र स्वयं तो महर्षि ऋचीक के संकल्पित चरु एवं विधानों के द्वारा ब्राह्मतेज से पूर्ण थे ही। उन्हें तपस्या द्वारा केवल क्षेत्रान्तरजनित जात्यन्तरांश की निवृत्ति ही करनी पड़ी थी। परन्तु उनके पिता, पितामह, प्रपितामह आदि तो शुद्ध क्षत्रिय थे। तथापि विश्वामित्र के संकल्प विशेष से उनमें प्रकृत्यापूर द्वारा ब्रह्मर्षित्व सम्पन्न हुआ था। महर्षि वसिष्ठ तो ब्रह्मर्षि-पुत्र ही थे। देहान्तर से वे शुद्ध मैत्रावरुण थे। अतः उनके सम्बन्ध किसी भी आक्षेप को अवकाश नहीं है। वे उच्चकोटि के महातपा, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, ब्राह्मतेज से सम्पन्न, परमसिद्ध थे। सूर्यवंश एवं सूर्यवंशावतंस श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के गुरु थे। जिनकी महिमा सर्वविदित है। दाक्षायणी इसी तरह सती दाक्षायणी के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनर्गल प्रलाप है। वस्तुतः—
७८४ रामायणमीमांसा एकविंश “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥” (रा० मा० १। मङ्गलाचरण २) के अनुसार भवानी और शङ्कर श्रद्धा और विश्वास रूप हैं । श्रद्धा और विश्वास के बिना सिद्ध लोग भी स्वान्तस्थ परमेश्वर को भी नहीं पहचानते । भवानी और शङ्कर दोनों अभिन्नरूप हैं । ‘‘वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” ( रघुवं० १।१ ) वाक् एवं अर्थ के समान दोनों सदा संपृक्त रहनेवाले हैं । जगत् के माता-पिता पार्वती और परमेश्वर की वाग् एवं अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए हम वन्दना करते हैं । जैसे शालग्राम की विष्णु-बुद्धि से पूजा की जाती है वैसे ही वाग् एवं अर्थ में पार्वती तथा परमेश्वर बुद्धि की जाती है । उसी तरह श्रद्धा और विश्वास को भवानी एवं शङ्कररूप कहा है । यद्यपि श्रद्धा एवं विश्वास दोनों अन्तःकरण के वृत्तिरूप हैं । वस्तुतस्तु शिव और विष्णु दोनों एक ही हैं । यह सब लीला शिव की महिमा के प्रख्यापनार्थ ही है । ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार विष्णु के दसों अवतार भगवती के दस नखों से ही प्रकट होते हैं—‘‘कराङ्गु- लिनखोत्पन्ना नारायणदशाकृतिः ।’’ जैसे विष्णु शिव की उपासना करके उनकी शरणागति ग्रहण कर उनके सम्बन्ध में मोह, अज्ञान और संशय प्रकट कर उनका माहात्म्य ख्यापन करते हैं वैसे ही भवानी और शङ्कर दोनों ही राम की महिमा का प्रख्यापन करने के लिए उनकी उपासना करते हैं । वस्तुतः सती ही पार्वती हैं । वे अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी परब्रह्मस्वरूपिणी हैं । उनमें अज्ञान, संशय, मोह और भ्रम की कल्पना नहीं की जा सकती है । जैसे राम ने कहा— “आत्मानं मानुषं मन्ये जातं दशरथात्मजम् ।” ( वा० रा० ६।११९।११ ) मैं अपने को मनुष्य मानता हूँ । यह सब जैसे लीलामात्र है वैसे ही सती का मोह भी । दाक्षायणी इतनी शिवभक्त थी कि वे शिव का अपमान नहीं सह सकीं । बल्कि उन्होंने अपने शरीर को इसी लिए त्याग दिया कि वह शिवद्रोही दक्ष के शुक्र से सम्भूत था । वस्तुतः सती एवं पार्वती दोनों ही एक तत्त्व हैं । सती में न कुतर्क था और न संशय ही था । उन्होंने तो श्रीराम का लोकोत्तर माहात्म्य प्रकट करने के लिए मोह का रूपक उपस्थित किया था । श्रीराम ने जैसे अज्ञान और मोह का रूपक उपस्थित कर के अगस्त्यजी से शिव का माहात्म्य और भक्ति सीखी वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गमय भगवान् शिव का ओर-छोर जानने के लिए हजारों वर्ष तक भटकते रहे, अन्त नहीं पा सके । यह सब लीलामात्र है । संशय आदि सब श्रीरामकथा की भूमिका मात्र हैं । तभी तो सीताजी भगवती की स्तुति करती हुईं उन्हें परब्रह्मरूपिणी ही कहती हैं— “जय जय गिरिवरराजकिसोरी । जय महेशमुखचन्द चकोरी ॥ जय गजबदन षडानन माता । जगतजननि दामिनिदुति गाता ॥ भव भव विभव पराभव कारिनि । विश्वविमोहिनि स्वबशबिहारिनि ॥ नहि तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाव बेद नहिं जाना ॥” (रा०मा० १।२३४।३,४) श्रुति और सूत्रों के अनुसार विश्वप्रपञ्च का उत्पादक, पालक और संहारक ही ब्रह्म होता है । वही आदि, मध्य और अवसान से रहित होता है ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८५ मानस में कहा गया है कि श्रीदशरथ और जनक के समान किसी ने शिव की आराधना नहीं की थी । इनके समान किसी ने फल नहीं साधा अर्थात् शिव की आराधना के प्रभाव से ही इनको सीता और राम की प्राप्ति हुई है— "इन सम काहू न शिव आराधे । काहु न इन समान फल साधे ॥" (रा०मा० १।३०७।१) भुशुण्डिरामायण के अनुसार भी श्रीसीता-राम की सभी लीलाओं में पार्वती-परमेश्वर का ही हाथ रहता है । श्रीसहजानन्दिनी की जन्मजात जड़ता, मूकता, भावमूर्च्छा आदि के निवारण के लिए श्रीराम की प्रेरणा से शिवजी ही जाकर एकान्त में दिव्य स्तुतियों द्वारा उन्हें प्रबुद्ध एवं सचेष्ट करने का प्रयत्न करते हैं । विवाहोत्तर पुनरपि जाड्यावस्थापन्न श्रीमहजानन्दिनी की स्वस्थता के लिए बटुवेषधारी श्रीराम कामेश्वर शिव की उपासना में उन्हें प्रवृत्त करते हैं और स्वयं आचार्य होकर उनसे श्रीशिव की आराधना सम्पन्न कराते हैं । गोपकन्याओं का अभीष्ट सिद्ध करने के लिए श्रीराम ने शिवजी का मामपर्यन्त व्रत करके उन्हें प्रसन्न कर मार्गदर्शन प्राप्त किया । कहा जाता है कि "मानस के आचार्य अपने सिद्धान्त के समर्थन में वैदिक परम्परा का ही उल्लेख करते हैं । मानस के परमाराध्य भगवान् राम भी अपने वाक्य की पुष्टि के लिए वेद की दुहाई देते हैं । किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे वेद, पुराणों की परम्परा की स्वीकृति से उत्पन्न समस्याओं से परिचित न रहे हों । वेद, पुराणों के लिए समुद्र की उपमा देकर जहाँ वे उनकी अगाधता और गम्भीरता की ओर इंगित करते हैं । वहीं साधा- रण व्यक्ति के लिए उनकी अगम्यता का भी परिचय देते हैं । मेघ यद्यपि समुद्र से ही जल ग्रहण करता है । किन्तु उस जल के परिष्कृत होने पर यह विश्वास करना भी कठिन हो जाता है कि यह जल खारेपन से भरे समुद्र का ही है । कई बार आलोचकों ने गोस्वामीजी पर यह आरोप लगाया कि वे जो कुछ वेद के नाम पर कहते हैं । वह वेदों में उपलब्ध नहीं है । ऐसे आरोपों के सन्दर्भ में— "वेद पुराण उदधि घन साधू ।” ( रा० मा० १।३५।२ ) इस पङ्क्ति का स्मरण आता है । विचारा आलोचक उसी व्यक्ति की भाँति है जो समुद्र में स्नान कर चुका है । उसके जल का स्वाद चख चुका है । किन्तु जब उससे कहा गया कि मेघ की वर्षा से प्राप्त जल भी समुद्र का ही है । तब उसके लिए इसपर विश्वास करना असम्भव हो गया, क्योंकि आकृति, प्रकृति और स्वाद किसी भी दृष्टि से उसे समुद्र के जल और मेघ के जल में सादृश्य की अनुभूति नहीं होती । परम्परा का तात्पर्य किसी सिद्धान्त को यदि शब्दशः स्वीकार करना हो तो इस प्रकार की परम्परावादिता गोस्वामीजी में नहीं है । इसे निःसंकोच मानूंगा । परम्परा के प्रति ऐसा आग्रह जड़ता ही है । परम्परावादियों के इस दुराग्रह से तुलसीदास परिचित थे । "श्रुति पुरान बहु कहहिं उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥" ( रा०मा० ७।११६।३ ) इस पङ्क्ति से उनकी इसी दृष्टि का परिचय मिलता है । वेद और पुराणों ने मनुष्य को बन्धनमुक्त करने के लिए अनेक उपाय बताये हैं । किन्तु व्यक्ति उनसे छूटने के स्थान पर अधिकाधिक उलझता ही गया । यह एक ऐसा यथार्थ सत्य है जिसका अनुभव समाज में पद पद पर होता है । जहाँ परम्परा के नाम पर स्थिरता होगी वहाँ जड़ता और अस्वस्थता को छोड़कर और आ ही क्या सकता है ? गोस्वामीजी की परम्परावादिता उस नदी की भाँति है जो अपने मूल स्रोत से कभी भी विच्छिन्न नहीं होतो, फिर भी उसमें प्रतिक्षण नूतन जल प्रवाहित होता है । अगणित वर्षों से प्रवाहित होनेवाली गंगा में स्नान करते
७८६ रामायणमीमांसा एकविंश हुए व्यक्तियों को यह अनुभव होता है कि वे उसी जल में स्नान कर रहे हैं जिसमें उनके हजारों पुरुषों ने स्नान किया था। अपने आप में यह सत्य होते हुए भी शब्दशः यथार्थ नहीं है। एक सरोवर का जल कई वर्षों तक यह तो दावा कर सकता है कि वह सच्चा परम्परावादी है, क्योंकि उसका जल स्थिर है। किन्तु यही स्थिरता उसमें सड़न उत्पन्न कर देती है। जिसे देखकर न उसमें स्नान करने का मन होगा और न पीने का ही। इन दोनों नियमों का पालन करनेवाले सरोवर के समान घोर परम्परावादी व्यक्ति ही हो सकते हैं। दूसरी ओर स्थिरता का एक प्रतीक समुद्र भी है। अगणित युगों से समुद्र स्थिर है। उसमें अगाध जल विद्यमान है। अतः उसमें मलिनता का वैसा भय नहीं है जैसा कि सरोवर में। किन्तु उसका जल पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया का पण्डित तो मेघ ही है। गोस्वामीजी सन्तों की तुलना मेघ से करते हैं। तब उनका तात्पर्य यही है कि भले ही वेद, पुराण परम प्रमाण हैं। पर जनसमाज को सन्त के माध्यम से ही उनके सच्चे अर्थ का ज्ञान प्राप्त होता है।” कहना न होगा कि उक्त कथन सुधारवाद के भूत से ही प्रेरित है। यही तो आधुनिक सुधारक भी कहते हैं कि हम जो कुछ भी कह रहे हैं वह वेदादि शास्त्रों का ही तात्पर्य है। कबीर आदि सन्त तो और आगे बढ़ कर कहते हैं कि हम वेद से भी आगे की बात कहते हैं। कोई भी व्यक्ति सन्त का बाना धारण कर के वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कह सकता है। यदि उससे उसका आधारभूत वैदिक प्रमाण पूछा जाय तो वही आपका उत्तर सुना देगा। यह तो वेदों का सार है शब्दशः वेद नहीं है। जैन और बौद्ध भी यही कह सकते हैं कि वेदों का सार और वेदों से भी उच्च सिद्धान्त ही हमारा सिद्धान्त है। अर्थात् यदि शब्दों को देखने की बात न हो तो वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कही जा सकती है। जैसे समुद्र के जल की आकृति, प्रकृति और स्वाद से मेघ का जल विसदृश होने पर भी मेघ-जल समुद्र का ही है। उसी तरह हमारी बात भी वेद की आकृति, प्रकृति और स्वाद से विसदृश होने पर भी वेदसम्मत ही है। क्या यह उत्तर ठीक होगा ? क्या किसी तत्त्व का निर्णय हो सकेगा ? परस्परविरोधी वादी और प्रतिवादी वेद प्रमाण पूछनेवाले को समुद्रजल के स्वाद से परिचित व्यक्ति का ही उदाहरण देकर समाधान कर देगा ? किन्तु स्थिति इसके विपरीत हैं। द्वैतवादी, अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, शुद्धाद्वैतवादी तथा द्वैताद्वैतवादी अपनी अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिए वेद प्रमाण उपस्थित करते हैं। उसपर विचार किया जाता है कि क्या इस वैदिक वाक्य के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण और उपक्रम, उपसंहार आदि के आधार पर विवक्षित अर्थ सिद्ध होता है या नहीं ? तात्पर्य का निर्धारण भी मनमानी से नहीं होता । उपक्रम एवं उपसंहार के शब्दार्थों की एकरूपता, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन षड्विध लिङ्गों के आधार पर ही तात्पर्य का निर्धारण होता है, मनमाने ढंग से नहीं । आधुनिक लोग भी कहते हैं कि वेद की बुद्धिसंगत बातों को हम मानते हैं पर शब्दशः मानने को तैयार नहीं। क्या तुलसीदास भी ऐसे ही सुधारक थे ? किन्तु वे तो वेद को तर्क से दूषित करनेवाले को कोटि-कोटि कल्पभर नरक में पड़ने की बात कहते हैं। किसी भी दृष्टान्त की दार्शनिक में आंशिक ही तुल्यता होती है। जब “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इस अनुमान में महानस का दृष्टान्त दिया जाता है तब धूम और वह्नि का सम्बन्धमात्र ही ग्राह्य होता है। भले महानस ( रसोईघर ) में रोटी, दाल और चावल पकाया जाता है और पर्वत में वैसा नहीं होता है तो भी धूम और वह्नि का सम्बन्ध उभयत्र तुल्य ही है। उसी तरह वेद को समुद्र के समान कहने का इतना ही अर्थ है कि वेद समुद्र के समान गम्भीर एवं अगाध है और सर्वसाधारण के लिए अगम्य है।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८७ जैसे समुद्र-जल स्वयं समुद्र से ग्रहण करने से खारा ही जल मिलता है। परन्तु वही जल मेघ के द्वारा प्राप्त होता है तो मधुर होता है। उसी तरह मनमानी वेद को पढ़कर उसका मनमानी अर्थ ग्रहण करने पर वह खारे जल के समान ही अग्राह्य होगा। जैसे मेघ के द्वारा आनीत वही जल मधुर होता है, उसी तरह गुरु-परम्परा से या आचार्य-परम्परा से अधीत वेद एवं वेदार्थ ही ग्राह्य एवं उपयोगी होगा । यह कथन भी मनमानी नहीं है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) इस विधि के आधार पर ऐसा अर्थ विदित होता है । अत्यन्त अप्राप्त की ही विधि होती है। प्राप्त की विधि में अज्ञातज्ञापकत्व न होने से प्रामाण्य नहीं होता, क्योंकि अनधिगत अबाधित अर्थज्ञान ही प्रमा कही जाती है उसके असाधारण कारण को ही प्रमाण कहा जाता है । अध्येतव्य अर्थ के ज्ञान में अध्ययन की हेतुता लोकसिद्ध है । "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) यह नियमविधि होने से ही सार्थक हो सकती है । गुरु-परम्परा से ही वेदों का अध्ययन करना चाहिये मनमाने तौर से नहीं । वेद को अनुश्रव कहते हैं । जिसका अर्थ ही यह है कि वे गुरु-परम्परा से ही सुने जाते हैं । उनका निर्माण नहीं होता। इसी प्रकार अर्थज्ञान भी पारम्पर्य से ही प्राप्त करना चाहिये इसके लिये भी प्रमाण है—"आचार्यवान् पुरुषो वेद" ( छा० उ० ६।१४।२ ), "आचार्याद् ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छा० उ० ४।९।३ ), "तद्विज्ञानार्थं गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" ( मुण्ड० उ० १।२।१२ ) अर्थात् आचार्य-परम्परा से प्राप्त विद्या ही फलदायिनी होती है। ब्रह्म के जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का ही अभिगमन करना चाहिये । आजकल पुस्तकें सुलभ हैं । अनेक टीकाएँ एवं तर्जुमे भी हैं । उन्हीं के आधार पर लोग वेद और पुराण पढ़ते हैं । इसी लिए समुद्र के खारे पानी के समान ही उनको वेदार्थ सर्वथा अग्राह्य ही प्रतीत होता है। यही आज की नास्तिकता का मुख्य कारण है । उक्त विचारक महाशय भी उसी कोटि के हैं । धर्म और ब्रह्म वैदैकसमधिगम्य हैं। अन्य प्रमाणों से उनका बोध होता ही नहीं । इसी लिए भगवान् शिवजी, राम तथा अन्य समस्त आस्तिक आचार्य तथा गोस्वामी भी धर्म और ब्रह्म के लिए पद पद पर वेद और पुराणों की दुहाई देते हैं । वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा नदी के समान नहीं मान्य है। गङ्गा में नित्यनूतन जल का प्रवाह उचित है, क्योंकि गोमुख से लेकर गंगासागर तक भगीरथरथखातावच्छिन्न अविच्छिन्न जलप्रवाह का ही नाम गङ्गा है । उस प्रवाह में इतर नदियों तथा झरनों की तो बात ही क्या रथ्योदक भी गङ्गाप्रवाह में पड़कर गङ्गा हो जाता है । “रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ।” ( भामती ) इसी लिए उस प्रवाह में स्नान करनेवाला यह ठीक ही अनुभव करता है कि पूर्वजों ने जिस गङ्गा में स्नान किया था उसी में हम भी स्नान कर रहे हैं । उक्त परिभाषा के अनुसार भगीरथरथखातावच्छिन्न जलप्रवाह ही गङ्गा है। उसी का माहात्म्य श्रुति, स्मृति और पुराणों में वर्णित है। वैदिक परम्परा तो गङ्गा के तुल्य तभी मानी जा सकती है जब गङ्गा में जैसे विभिन्न झरनों, नदियों तथा रथ्याओं के उदक मिलकर गङ्गा हो जाते हैं वैसे ही विभिन्न देश और काल के नये नये शब्द एवं नये अर्थ वैदिक परम्परा में मिलकर वेद ही हो जाते, परन्तु वेद के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। वेद तो नियत वर्णों की नियत वर्णानुपूर्वी को ही कहते हैं । उनमें तो एक वर्ण और स्वर का व्यत्यास हो जाने पर वेदत्व ही नहीं रहता । 'अग्निर्मूर्धा' वेद है 'मूर्धा अग्निः' वेद नहीं है । ज्यों के त्यों शब्दों में भी पौर्वापर्य में परिवर्तन होने से
ही वेदत्व मिट जाता है । इतर ग्रन्थों में मूलपाठ की रक्षा पर पूर्ण ध्यान रखा जाता है। वेदों की आनुपूर्वी किसी कल्प में नहीं बदलती है । ईश्वर भी आनुपूर्वी बदलने में स्वतन्त्र नहीं होता। यही वेदों की अपौरुषेयता एवं नित्यता है । अनादि काल से शिष्य अपने अपने आचार्यों द्वारा उच्चारित आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का उच्चारण करते हैं । ईश्वर भी सृष्टि के समय पूर्वकल्प की वेदानुपूर्वी का स्मरण कर के वैसी आनुपूर्वी का उपदेश करते हैं । नवीन आनुपूर्वी का नहीं । “यत्ततः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता ।” यदि उनमें नये नये शब्द नये नये अर्थ मिलते रहें । तब वे भी अपौरुषेय एवं अनादि नहीं रह सकते, फिर तो यह शङ्का बनी रहेगी कि किन्हीं भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से दूषित पुरुषों के भी शब्द और वाक्य वेदों में मिल गये होंगे । अतः वेद अपौरुषेय या ईश्वरवाक्य ही हैं यह नहीं कहा जा सकता । इतिहास और पुराण वैसे ( वेदों जैसे ) अनादि और अपौरुषेय नहीं हैं, किन्तु वे प्रत्येक कल्प में सर्वज्ञ- कल्प महर्षियों के द्वारा वेदों के अनुसार निर्मित होते हैं । परन्तु सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यन्त उनकी आनुपूर्वी एक सी ही रहती है । उनमें भी नदी के समान नये नये शब्द और मिलते जायें तो वे भी आर्ष वचन के रूप में प्रमाण नहीं हो सकते । इतना ही क्यों मानस के ही शुद्ध पाठ की रक्षा का प्रयास यही सिद्ध करता है कि किसी भी ग्रन्थ में यदि नये नये शब्द और अर्थ मिलते रहेंगे तो वह प्रमाण रूप में आदरणीय नहीं हो सकेगा । अन्यथा विविध क्षेपकों सहित मानस भी गङ्गादि नदी के समान मानस ही माना जाना चाहिये । यदि नदी के समान उसमें नये नये शब्दों एवं विचारों का सन्निवेश माना जायगा तो वैदिक या आर्ष वचनों की शक्ति और चमत्कृति समाप्त हो जायेगी । इतिहास और पुराणों की शब्दानुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही हैं । किन्हीं भी ग्रन्थों में नदी के समान नये विचारों का सन्निवेश मानने पर तो उनका स्वरूप और प्रामाण्य सर्वथा भंग ही हो जायगा । प्रकृत में तो जैसे ईश्वर आत्मा नित्य है, स्थिर है उसी प्रकार ईश्वर के नित्यविज्ञान में स्थित वेदवाणी भी नित्य है । जैसे सूर्य और अग्नि एकरस होकर ही संसार का प्रकाशन करते हैं वैसे ही नित्य स्थिर वेद ही स्थिर सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं । स्थिरता होने से सरोवर के समान सड़न आ जायगी एवं सरोवरजल के समान वेद अग्राह्य हो जायेंगे इत्यादि कल्पना निराधार ही है । समुद्र के स्थिर रहने पर भी जैसे अगाधता के कारण उसमें सड़न नहीं होती है, वैसे ही वैदिक शब्द और अर्थ अपौरुषेय तथा ईश्वरीय होने से वे सदा अगाध एवं निर्विकार ही रहते हैं । सूर्य कल्पपर्यन्त स्थिर रहने पर भी जैसे निर्विकार रहते हैं, वैसे वेद भी निर्विकार ही रहते हैं । उनकी अस्थिरता ही अशुद्धि एवं विकार का कारण बनेगी । विकार नहीं अपितु घोर विकार अथवा सर्वनाश का भी कारण बन सकती है जैसे सूर्य, समुद्र आदि की अस्थिरता घोर विकार अथवा सर्वनाश का कारण बन जाती है । पर इसे सुधारोन्मादयुक्त कथावाचक कैसे समझें । मानस में भी यदि नये शब्द, नये विचार और सिद्धान्त आ आ कर मिलते रहेंगे तो वह भी अप्रमाण एवं विकृत हो जायेगा । वैदिकों के यहाँ तो शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक नित्य सम्बन्ध माना जाता है । अर्थात् वैदिक शब्द, उनका अर्थ तथा शब्दार्थ का सम्बन्ध तीनों ही नित्य माने जाते हैं और वस्तुतः वे नित्य हैं ही । इन स्थितियों को न जानने से ही अनर्गल प्रलाप चल सकते हैं । वस्तुतः विच्छू का मन्त्र भी न जानना और साँप के बिल में अँगुली डालने के समान वेदों के सम्बन्ध में पूर्वोक्त प्रलाप किये गये हैं ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८९ गोस्वामीजी वैसे परम्परावादी नहीं थे, यह कहना ही जड़ता है। आचार्य-परम्परा से वेद एवं वेदार्थ का ग्रहण न करने से ही वे खारे समुद्र के समान अग्राह्य एवं अनिष्टकारक भी हो सकते हैं। वेदों के ही आधार पर यह सिद्ध है कि किसी भी मन्त्र में एक स्वर के व्यत्यास से वह मन्त्र वाग्वज्र होकर यजमान का ही घातक बन जाता है— "मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥" स्वरभेद के कारण 'इन्द्रस्य शत्रुर्घातयिता' यह अभीष्ट तत्पुरुषार्थ न होकर 'इन्द्रशत्रो विवर्धस्व' 'इन्द्रः शत्रुर्घातयिता यस्य' इस बहुव्रीहि के अनुसार अनिष्ट अर्थ होने से ही वृत्र इन्द्र का घातक न बन सका, किन्तु इन्द्र ही उसका घातक हुआ। अतएव "श्रुति पुराण बहु कहहिं उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ (रा० मा० ७।११६।३) इस पंक्ति से उनको श्रुति और पुराणों पर आक्षेप करना अभीष्ट नहीं है। यह तो वेद और पुराणों के विरोधियों के दिमाग का फितूर है। यदि आलोकरूप सहकारी साधन के अभाव में निर्दोष नेत्र से भी रूप का ज्ञान न हो तो इसमें नेत्र प्रमाण का दोष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह यदि विवेक, वैराग्य, शम, दमादि साधनचतुष्टय- सम्पत्तिरूप साधन के बिना वेद-वेदान्तों से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार न हो तो इसमें वेदप्रमाण का कोई दोष नहीं है। कहा जाता है कि "दिन रात रामनाम जपने वालों के आचरण और स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता, यह क्या यथार्थ सत्य नहीं है ?" परन्तु इसमें भगवन्नाम का क्या दोष है ? इसमें नामापराधराहित्य का अभाव ही कारण है। इसी तरह विवेक, वैराग्यादि साधन न होने से ही वेद और पुराणों के उपाय बतलाने पर भी ग्रन्थि नहीं खुलती उलटे उलझती ही जाती है। "बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ।" (रा० मा० २।१७६।२ ) "जैसे बिनु बिराग संन्यासी ॥" (रा० मा० १।२५०।२ ) आदि पंक्तियों से उन्होंने अपना अभिप्राय व्यक्त कर दिया है। उन्होंने भक्ति के लिए वेद और पुराणों को आकर माना है— "पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना । मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ज्ञान बिराग नयन उरगारी ॥" (रा० मा० ७।११९।७) यहाँ भी मर्मी सज्जन और सुमति कुदारी न होने से ही वेद-पुराण पावन-पर्वत, रामकथा भी भक्तिमणि प्रकट नहीं कर सकते । एतावतापि पावन-पर्वत, वेद-पुराण और नाना रामकथा रूप रुचिराकर की कोई न्यूनता नहीं होती । कारण, जब ज्ञान, विरागरूप नयन न हो तो सफलता कैसे मिल सकती है ? "आस्तिक हिन्दू वेद को परम प्रमाण मानता है। पुराणों को भी वेद का ही विस्तार स्वीकार किया जाता है । श्रीव्यास ने करुणा से प्रेरित होकर वेदों का उपबृंहण किया है। वही पुराण कहलाता है । शब्दशः विचार करने पर यह भी विरोधाभास सत्य ही प्रतीत होता है। वैदिक मन्त्रों का सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र ही है। उसी को केन्द्रित कर के ऋचाएँ लिखी गयी हैं। उसी की स्तुतियाँ की गयी हैं। यज्ञ में आहुति देकर उससे विविध वस्तुओं की याचना की गयी है। किन्तु पुराणों में पहुँचकर इन्द्र अपनी महिमा खो बैठा है। उसके चरित्र की अनेक त्रुटियों का रहस्योद्घाटन किया गया है। वह दैत्यों से परास्त होता है। अन्त में उनसे त्राण पाने के लिए वह नारायण का आश्रय लेता है।
७९० रामायणमीमांसा एकविंश वेद के मुख्य देवता जहां इन्द्र, वरुण और अग्नि हैं वहाँ पुराणों में इनके स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिष्ठा की गयी है। त्रिदेवों में भी ब्रह्मा की महिमा कम हो जाती है। मुख्य पूजा शिव और विष्णु को रह जाती है। पुराणों में उनकी अभिन्नता के प्रतिपादन के साथ कभी कभी उन्हें प्रतिद्वन्द्वी के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। रामचरितमानस में वेदों और पुराणों की महिमा और साक्ष्य का वर्णन करते हुए भी भगवान् राम को ही सर्वोत्कृष्ट पद प्रदान किया है। विष्णु और शिव भी उनके अंश से ही समुद्भूत कहे गये हैं— "शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना। उपजहिं जासु अंश विधि नाना। (रा० मा० १।१४३।३) स्थूल दृष्टि से देखने पर वेद और पुराण परस्पर विरोधी मत का प्रतिपादन करते हुए प्रतीत होते हैं। तब तीनों के एकत्व का तात्पर्य क्या हो सकता है ? कई आलोचकों के अनुसार दशरथ, राम, सीता आदि के नाम वेदों में कहीं प्राप्त नहीं होते। वहीं दूसरे विद्वानों ने इनके नाम अनेक ऋचाओं में खोज निकाले हैं। इन खोजों को प्रामाणिक मानने के बाद भी यह तो असंदिग्धरूप से कहा ही जा सकता है कि उन्हें वह गौरवपूर्ण पद नहीं प्राप्त है जो पुराणों अथवा रामचरितमानस में दिया गया है।" वस्तुतः सारी विडम्बना वेदों और पुराणों के गुरु-परम्परा से अध्ययन न करने का ही परिणाम है। ठीक ही है मेघ बिना समुद्र का पानी खारा लगता है। आचार्य, गुरु और सन्तों के बिना वेदों का अर्थ और अभिप्राय कैसे समझ में आये ? यह ठीक है कि वेदों और पुराणों के तात्पर्य को हृदयङ्गम करने के लिए व्यक्ति को अपनी पूर्वाग्रहयुक्त बुद्धि के स्थान पर सन्त का आश्रय लेना चाहिये। परन्तु शब्दप्रामाण्यवादी के लिए तो शब्दशः अर्थग्रहण की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अतः पुराणों के शब्दों की उपेक्षा कर के मनमानी अर्थग्रहण करना वेदार्थ या पुराणार्थ नहीं ही हो सकता। अतः गुरु, आचार्य या सन्त भी शब्दों के अनुसार ही तात्पर्यार्थ वर्णन करते हैं अन्यथा तात्पर्य वर्णन के लिए पूर्वोक्त रीति से शब्दों के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति षड्विधलिंग के विचार की आवश्यकता ही क्या है ? फिर सन्त तो विभिन्न सभी सम्प्रदायों में होते हैं। फिर तो उन सन्तों के अनुसार या "बाबावाक्यं प्रमाणम्" के अनुसार भिन्न भिन्न वेदों के तात्पर्य भी होंगे। ऐसी स्थिति में— "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्रह्मसू० १।१।१ )। विचार-पूर्वोत्तरमीमांसा निरर्थक ही हो जायँगी। विचारविनिमय सम्बन्धी आचार्यों के महान् ग्रन्थ भी निरर्थक हो जायेंगे। फिर तो विचार बिना ही विभिन्न सन्त जो कह दें वही मान लेना होगा। स्वयं विचार को अवकाश ही नहीं रहेगा। तब तो सांख्य, मीसांसक, जैन, बौद्ध आदि सन्तों के अनुसार अनीश्वरवाद भी मानना पड़ेगा, क्योंकि श्रद्धालु को शब्दतः विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि कोई वैदिक इतिहास और पुराणों को वेदविरुद्ध होने से, पौरुषेय होने से अप्रमाण कहे तथा कोई पौराणिक रामचरितमानस को वेदपुराणविरुद्ध होने के कारण अप्रमाण कहे तो उसका क्या समाधान किया जा सकता है ? यदि केवल सन्त का कहना ही पर्याप्त है तो सन्त को भी वेद-पुराण की दुहाई देने की क्या आवश्यकता ? यदि कोई किसी सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्त कहे और उसे वेद से न सिद्ध कर सके तो वह वैदिक सिद्धान्त कैसे सिद्ध होगा ? जो हम कहते हैं कि श्रद्धालु होकर मान लो, विश्वास करो इतनेमात्र से तो काम नहीं चल सकता। यदि ऐसी ही बात थी तो रामचरितमानस पर भी ऊहापोह करने की क्या आवश्यकता ? फिर मानसचिन्तन तथा मानसमुक्तावली की क्या आवश्यकता ? क्या यह विचार अश्रद्धा का द्योतक न होगा ? क्या गोस्वामीजी के अभिप्रेत अर्थ का अनर्थ करना न होगा ?