भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 866

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८९ गोस्वामीजी वैसे परम्परावादी नहीं थे, यह कहना ही जड़ता है। आचार्य-परम्परा से वेद एवं वेदार्थ का ग्रहण न करने से ही वे खारे समुद्र के समान अग्राह्य एवं अनिष्टकारक भी हो सकते हैं। वेदों के ही आधार पर यह सिद्ध है कि किसी भी मन्त्र में एक स्वर के व्यत्यास से वह मन्त्र वाग्वज्र होकर यजमान का ही घातक बन जाता है— "मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥" स्वरभेद के कारण 'इन्द्रस्य शत्रुर्घातयिता' यह अभीष्ट तत्पुरुषार्थ न होकर 'इन्द्रशत्रो विवर्धस्व' 'इन्द्रः शत्रुर्घातयिता यस्य' इस बहुव्रीहि के अनुसार अनिष्ट अर्थ होने से ही वृत्र इन्द्र का घातक न बन सका, किन्तु इन्द्र ही उसका घातक हुआ। अतएव "श्रुति पुराण बहु कहहिं उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ (रा० मा० ७।११६।३) इस पंक्ति से उनको श्रुति और पुराणों पर आक्षेप करना अभीष्ट नहीं है। यह तो वेद और पुराणों के विरोधियों के दिमाग का फितूर है। यदि आलोकरूप सहकारी साधन के अभाव में निर्दोष नेत्र से भी रूप का ज्ञान न हो तो इसमें नेत्र प्रमाण का दोष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह यदि विवेक, वैराग्य, शम, दमादि साधनचतुष्टय- सम्पत्तिरूप साधन के बिना वेद-वेदान्तों से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार न हो तो इसमें वेदप्रमाण का कोई दोष नहीं है। कहा जाता है कि "दिन रात रामनाम जपने वालों के आचरण और स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता, यह क्या यथार्थ सत्य नहीं है ?" परन्तु इसमें भगवन्नाम का क्या दोष है ? इसमें नामापराधराहित्य का अभाव ही कारण है। इसी तरह विवेक, वैराग्यादि साधन न होने से ही वेद और पुराणों के उपाय बतलाने पर भी ग्रन्थि नहीं खुलती उलटे उलझती ही जाती है। "बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ।" (रा० मा० २।१७६।२ ) "जैसे बिनु बिराग संन्यासी ॥" (रा० मा० १।२५०।२ ) आदि पंक्तियों से उन्होंने अपना अभिप्राय व्यक्त कर दिया है। उन्होंने भक्ति के लिए वेद और पुराणों को आकर माना है— "पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना । मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ज्ञान बिराग नयन उरगारी ॥" (रा० मा० ७।११९।७) यहाँ भी मर्मी सज्जन और सुमति कुदारी न होने से ही वेद-पुराण पावन-पर्वत, रामकथा भी भक्तिमणि प्रकट नहीं कर सकते । एतावतापि पावन-पर्वत, वेद-पुराण और नाना रामकथा रूप रुचिराकर की कोई न्यूनता नहीं होती । कारण, जब ज्ञान, विरागरूप नयन न हो तो सफलता कैसे मिल सकती है ? "आस्तिक हिन्दू वेद को परम प्रमाण मानता है। पुराणों को भी वेद का ही विस्तार स्वीकार किया जाता है । श्रीव्यास ने करुणा से प्रेरित होकर वेदों का उपबृंहण किया है। वही पुराण कहलाता है । शब्दशः विचार करने पर यह भी विरोधाभास सत्य ही प्रतीत होता है। वैदिक मन्त्रों का सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र ही है। उसी को केन्द्रित कर के ऋचाएँ लिखी गयी हैं। उसी की स्तुतियाँ की गयी हैं। यज्ञ में आहुति देकर उससे विविध वस्तुओं की याचना की गयी है। किन्तु पुराणों में पहुँचकर इन्द्र अपनी महिमा खो बैठा है। उसके चरित्र की अनेक त्रुटियों का रहस्योद्घाटन किया गया है। वह दैत्यों से परास्त होता है। अन्त में उनसे त्राण पाने के लिए वह नारायण का आश्रय लेता है।