भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 865

ही वेदत्व मिट जाता है । इतर ग्रन्थों में मूलपाठ की रक्षा पर पूर्ण ध्यान रखा जाता है। वेदों की आनुपूर्वी किसी कल्प में नहीं बदलती है । ईश्वर भी आनुपूर्वी बदलने में स्वतन्त्र नहीं होता। यही वेदों की अपौरुषेयता एवं नित्यता है । अनादि काल से शिष्य अपने अपने आचार्यों द्वारा उच्चारित आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का उच्चारण करते हैं । ईश्वर भी सृष्टि के समय पूर्वकल्प की वेदानुपूर्वी का स्मरण कर के वैसी आनुपूर्वी का उपदेश करते हैं । नवीन आनुपूर्वी का नहीं । “यत्ततः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता ।” यदि उनमें नये नये शब्द नये नये अर्थ मिलते रहें । तब वे भी अपौरुषेय एवं अनादि नहीं रह सकते, फिर तो यह शङ्का बनी रहेगी कि किन्हीं भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से दूषित पुरुषों के भी शब्द और वाक्य वेदों में मिल गये होंगे । अतः वेद अपौरुषेय या ईश्वरवाक्य ही हैं यह नहीं कहा जा सकता । इतिहास और पुराण वैसे ( वेदों जैसे ) अनादि और अपौरुषेय नहीं हैं, किन्तु वे प्रत्येक कल्प में सर्वज्ञ- कल्प महर्षियों के द्वारा वेदों के अनुसार निर्मित होते हैं । परन्तु सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यन्त उनकी आनुपूर्वी एक सी ही रहती है । उनमें भी नदी के समान नये नये शब्द और मिलते जायें तो वे भी आर्ष वचन के रूप में प्रमाण नहीं हो सकते । इतना ही क्यों मानस के ही शुद्ध पाठ की रक्षा का प्रयास यही सिद्ध करता है कि किसी भी ग्रन्थ में यदि नये नये शब्द और अर्थ मिलते रहेंगे तो वह प्रमाण रूप में आदरणीय नहीं हो सकेगा । अन्यथा विविध क्षेपकों सहित मानस भी गङ्गादि नदी के समान मानस ही माना जाना चाहिये । यदि नदी के समान उसमें नये नये शब्दों एवं विचारों का सन्निवेश माना जायगा तो वैदिक या आर्ष वचनों की शक्ति और चमत्कृति समाप्त हो जायेगी । इतिहास और पुराणों की शब्दानुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही हैं । किन्हीं भी ग्रन्थों में नदी के समान नये विचारों का सन्निवेश मानने पर तो उनका स्वरूप और प्रामाण्य सर्वथा भंग ही हो जायगा । प्रकृत में तो जैसे ईश्वर आत्मा नित्य है, स्थिर है उसी प्रकार ईश्वर के नित्यविज्ञान में स्थित वेदवाणी भी नित्य है । जैसे सूर्य और अग्नि एकरस होकर ही संसार का प्रकाशन करते हैं वैसे ही नित्य स्थिर वेद ही स्थिर सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं । स्थिरता होने से सरोवर के समान सड़न आ जायगी एवं सरोवरजल के समान वेद अग्राह्य हो जायेंगे इत्यादि कल्पना निराधार ही है । समुद्र के स्थिर रहने पर भी जैसे अगाधता के कारण उसमें सड़न नहीं होती है, वैसे ही वैदिक शब्द और अर्थ अपौरुषेय तथा ईश्वरीय होने से वे सदा अगाध एवं निर्विकार ही रहते हैं । सूर्य कल्पपर्यन्त स्थिर रहने पर भी जैसे निर्विकार रहते हैं, वैसे वेद भी निर्विकार ही रहते हैं । उनकी अस्थिरता ही अशुद्धि एवं विकार का कारण बनेगी । विकार नहीं अपितु घोर विकार अथवा सर्वनाश का भी कारण बन सकती है जैसे सूर्य, समुद्र आदि की अस्थिरता घोर विकार अथवा सर्वनाश का कारण बन जाती है । पर इसे सुधारोन्मादयुक्त कथावाचक कैसे समझें । मानस में भी यदि नये शब्द, नये विचार और सिद्धान्त आ आ कर मिलते रहेंगे तो वह भी अप्रमाण एवं विकृत हो जायेगा । वैदिकों के यहाँ तो शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक नित्य सम्बन्ध माना जाता है । अर्थात् वैदिक शब्द, उनका अर्थ तथा शब्दार्थ का सम्बन्ध तीनों ही नित्य माने जाते हैं और वस्तुतः वे नित्य हैं ही । इन स्थितियों को न जानने से ही अनर्गल प्रलाप चल सकते हैं । वस्तुतः विच्छू का मन्त्र भी न जानना और साँप के बिल में अँगुली डालने के समान वेदों के सम्बन्ध में पूर्वोक्त प्रलाप किये गये हैं ।