रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८७ जैसे समुद्र-जल स्वयं समुद्र से ग्रहण करने से खारा ही जल मिलता है। परन्तु वही जल मेघ के द्वारा प्राप्त होता है तो मधुर होता है। उसी तरह मनमानी वेद को पढ़कर उसका मनमानी अर्थ ग्रहण करने पर वह खारे जल के समान ही अग्राह्य होगा। जैसे मेघ के द्वारा आनीत वही जल मधुर होता है, उसी तरह गुरु-परम्परा से या आचार्य-परम्परा से अधीत वेद एवं वेदार्थ ही ग्राह्य एवं उपयोगी होगा । यह कथन भी मनमानी नहीं है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) इस विधि के आधार पर ऐसा अर्थ विदित होता है । अत्यन्त अप्राप्त की ही विधि होती है। प्राप्त की विधि में अज्ञातज्ञापकत्व न होने से प्रामाण्य नहीं होता, क्योंकि अनधिगत अबाधित अर्थज्ञान ही प्रमा कही जाती है उसके असाधारण कारण को ही प्रमाण कहा जाता है । अध्येतव्य अर्थ के ज्ञान में अध्ययन की हेतुता लोकसिद्ध है । "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) यह नियमविधि होने से ही सार्थक हो सकती है । गुरु-परम्परा से ही वेदों का अध्ययन करना चाहिये मनमाने तौर से नहीं । वेद को अनुश्रव कहते हैं । जिसका अर्थ ही यह है कि वे गुरु-परम्परा से ही सुने जाते हैं । उनका निर्माण नहीं होता। इसी प्रकार अर्थज्ञान भी पारम्पर्य से ही प्राप्त करना चाहिये इसके लिये भी प्रमाण है—"आचार्यवान् पुरुषो वेद" ( छा० उ० ६।१४।२ ), "आचार्याद् ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छा० उ० ४।९।३ ), "तद्विज्ञानार्थं गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" ( मुण्ड० उ० १।२।१२ ) अर्थात् आचार्य-परम्परा से प्राप्त विद्या ही फलदायिनी होती है। ब्रह्म के जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का ही अभिगमन करना चाहिये । आजकल पुस्तकें सुलभ हैं । अनेक टीकाएँ एवं तर्जुमे भी हैं । उन्हीं के आधार पर लोग वेद और पुराण पढ़ते हैं । इसी लिए समुद्र के खारे पानी के समान ही उनको वेदार्थ सर्वथा अग्राह्य ही प्रतीत होता है। यही आज की नास्तिकता का मुख्य कारण है । उक्त विचारक महाशय भी उसी कोटि के हैं । धर्म और ब्रह्म वैदैकसमधिगम्य हैं। अन्य प्रमाणों से उनका बोध होता ही नहीं । इसी लिए भगवान् शिवजी, राम तथा अन्य समस्त आस्तिक आचार्य तथा गोस्वामी भी धर्म और ब्रह्म के लिए पद पद पर वेद और पुराणों की दुहाई देते हैं । वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा नदी के समान नहीं मान्य है। गङ्गा में नित्यनूतन जल का प्रवाह उचित है, क्योंकि गोमुख से लेकर गंगासागर तक भगीरथरथखातावच्छिन्न अविच्छिन्न जलप्रवाह का ही नाम गङ्गा है । उस प्रवाह में इतर नदियों तथा झरनों की तो बात ही क्या रथ्योदक भी गङ्गाप्रवाह में पड़कर गङ्गा हो जाता है । “रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ।” ( भामती ) इसी लिए उस प्रवाह में स्नान करनेवाला यह ठीक ही अनुभव करता है कि पूर्वजों ने जिस गङ्गा में स्नान किया था उसी में हम भी स्नान कर रहे हैं । उक्त परिभाषा के अनुसार भगीरथरथखातावच्छिन्न जलप्रवाह ही गङ्गा है। उसी का माहात्म्य श्रुति, स्मृति और पुराणों में वर्णित है। वैदिक परम्परा तो गङ्गा के तुल्य तभी मानी जा सकती है जब गङ्गा में जैसे विभिन्न झरनों, नदियों तथा रथ्याओं के उदक मिलकर गङ्गा हो जाते हैं वैसे ही विभिन्न देश और काल के नये नये शब्द एवं नये अर्थ वैदिक परम्परा में मिलकर वेद ही हो जाते, परन्तु वेद के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। वेद तो नियत वर्णों की नियत वर्णानुपूर्वी को ही कहते हैं । उनमें तो एक वर्ण और स्वर का व्यत्यास हो जाने पर वेदत्व ही नहीं रहता । 'अग्निर्मूर्धा' वेद है 'मूर्धा अग्निः' वेद नहीं है । ज्यों के त्यों शब्दों में भी पौर्वापर्य में परिवर्तन होने से