रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 863, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें७८६ रामायणमीमांसा एकविंश हुए व्यक्तियों को यह अनुभव होता है कि वे उसी जल में स्नान कर रहे हैं जिसमें उनके हजारों पुरुषों ने स्नान किया था। अपने आप में यह सत्य होते हुए भी शब्दशः यथार्थ नहीं है। एक सरोवर का जल कई वर्षों तक यह तो दावा कर सकता है कि वह सच्चा परम्परावादी है, क्योंकि उसका जल स्थिर है। किन्तु यही स्थिरता उसमें सड़न उत्पन्न कर देती है। जिसे देखकर न उसमें स्नान करने का मन होगा और न पीने का ही। इन दोनों नियमों का पालन करनेवाले सरोवर के समान घोर परम्परावादी व्यक्ति ही हो सकते हैं। दूसरी ओर स्थिरता का एक प्रतीक समुद्र भी है। अगणित युगों से समुद्र स्थिर है। उसमें अगाध जल विद्यमान है। अतः उसमें मलिनता का वैसा भय नहीं है जैसा कि सरोवर में। किन्तु उसका जल पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया का पण्डित तो मेघ ही है। गोस्वामीजी सन्तों की तुलना मेघ से करते हैं। तब उनका तात्पर्य यही है कि भले ही वेद, पुराण परम प्रमाण हैं। पर जनसमाज को सन्त के माध्यम से ही उनके सच्चे अर्थ का ज्ञान प्राप्त होता है।” कहना न होगा कि उक्त कथन सुधारवाद के भूत से ही प्रेरित है। यही तो आधुनिक सुधारक भी कहते हैं कि हम जो कुछ भी कह रहे हैं वह वेदादि शास्त्रों का ही तात्पर्य है। कबीर आदि सन्त तो और आगे बढ़ कर कहते हैं कि हम वेद से भी आगे की बात कहते हैं। कोई भी व्यक्ति सन्त का बाना धारण कर के वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कह सकता है। यदि उससे उसका आधारभूत वैदिक प्रमाण पूछा जाय तो वही आपका उत्तर सुना देगा। यह तो वेदों का सार है शब्दशः वेद नहीं है। जैन और बौद्ध भी यही कह सकते हैं कि वेदों का सार और वेदों से भी उच्च सिद्धान्त ही हमारा सिद्धान्त है। अर्थात् यदि शब्दों को देखने की बात न हो तो वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कही जा सकती है। जैसे समुद्र के जल की आकृति, प्रकृति और स्वाद से मेघ का जल विसदृश होने पर भी मेघ-जल समुद्र का ही है। उसी तरह हमारी बात भी वेद की आकृति, प्रकृति और स्वाद से विसदृश होने पर भी वेदसम्मत ही है। क्या यह उत्तर ठीक होगा ? क्या किसी तत्त्व का निर्णय हो सकेगा ? परस्परविरोधी वादी और प्रतिवादी वेद प्रमाण पूछनेवाले को समुद्रजल के स्वाद से परिचित व्यक्ति का ही उदाहरण देकर समाधान कर देगा ? किन्तु स्थिति इसके विपरीत हैं। द्वैतवादी, अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, शुद्धाद्वैतवादी तथा द्वैताद्वैतवादी अपनी अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिए वेद प्रमाण उपस्थित करते हैं। उसपर विचार किया जाता है कि क्या इस वैदिक वाक्य के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण और उपक्रम, उपसंहार आदि के आधार पर विवक्षित अर्थ सिद्ध होता है या नहीं ? तात्पर्य का निर्धारण भी मनमानी से नहीं होता । उपक्रम एवं उपसंहार के शब्दार्थों की एकरूपता, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन षड्विध लिङ्गों के आधार पर ही तात्पर्य का निर्धारण होता है, मनमाने ढंग से नहीं । आधुनिक लोग भी कहते हैं कि वेद की बुद्धिसंगत बातों को हम मानते हैं पर शब्दशः मानने को तैयार नहीं। क्या तुलसीदास भी ऐसे ही सुधारक थे ? किन्तु वे तो वेद को तर्क से दूषित करनेवाले को कोटि-कोटि कल्पभर नरक में पड़ने की बात कहते हैं। किसी भी दृष्टान्त की दार्शनिक में आंशिक ही तुल्यता होती है। जब “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इस अनुमान में महानस का दृष्टान्त दिया जाता है तब धूम और वह्नि का सम्बन्धमात्र ही ग्राह्य होता है। भले महानस ( रसोईघर ) में रोटी, दाल और चावल पकाया जाता है और पर्वत में वैसा नहीं होता है तो भी धूम और वह्नि का सम्बन्ध उभयत्र तुल्य ही है। उसी तरह वेद को समुद्र के समान कहने का इतना ही अर्थ है कि वेद समुद्र के समान गम्भीर एवं अगाध है और सर्वसाधारण के लिए अगम्य है।