रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 862, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८५ मानस में कहा गया है कि श्रीदशरथ और जनक के समान किसी ने शिव की आराधना नहीं की थी । इनके समान किसी ने फल नहीं साधा अर्थात् शिव की आराधना के प्रभाव से ही इनको सीता और राम की प्राप्ति हुई है— "इन सम काहू न शिव आराधे । काहु न इन समान फल साधे ॥" (रा०मा० १।३०७।१) भुशुण्डिरामायण के अनुसार भी श्रीसीता-राम की सभी लीलाओं में पार्वती-परमेश्वर का ही हाथ रहता है । श्रीसहजानन्दिनी की जन्मजात जड़ता, मूकता, भावमूर्च्छा आदि के निवारण के लिए श्रीराम की प्रेरणा से शिवजी ही जाकर एकान्त में दिव्य स्तुतियों द्वारा उन्हें प्रबुद्ध एवं सचेष्ट करने का प्रयत्न करते हैं । विवाहोत्तर पुनरपि जाड्यावस्थापन्न श्रीमहजानन्दिनी की स्वस्थता के लिए बटुवेषधारी श्रीराम कामेश्वर शिव की उपासना में उन्हें प्रवृत्त करते हैं और स्वयं आचार्य होकर उनसे श्रीशिव की आराधना सम्पन्न कराते हैं । गोपकन्याओं का अभीष्ट सिद्ध करने के लिए श्रीराम ने शिवजी का मामपर्यन्त व्रत करके उन्हें प्रसन्न कर मार्गदर्शन प्राप्त किया । कहा जाता है कि "मानस के आचार्य अपने सिद्धान्त के समर्थन में वैदिक परम्परा का ही उल्लेख करते हैं । मानस के परमाराध्य भगवान् राम भी अपने वाक्य की पुष्टि के लिए वेद की दुहाई देते हैं । किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे वेद, पुराणों की परम्परा की स्वीकृति से उत्पन्न समस्याओं से परिचित न रहे हों । वेद, पुराणों के लिए समुद्र की उपमा देकर जहाँ वे उनकी अगाधता और गम्भीरता की ओर इंगित करते हैं । वहीं साधा- रण व्यक्ति के लिए उनकी अगम्यता का भी परिचय देते हैं । मेघ यद्यपि समुद्र से ही जल ग्रहण करता है । किन्तु उस जल के परिष्कृत होने पर यह विश्वास करना भी कठिन हो जाता है कि यह जल खारेपन से भरे समुद्र का ही है । कई बार आलोचकों ने गोस्वामीजी पर यह आरोप लगाया कि वे जो कुछ वेद के नाम पर कहते हैं । वह वेदों में उपलब्ध नहीं है । ऐसे आरोपों के सन्दर्भ में— "वेद पुराण उदधि घन साधू ।” ( रा० मा० १।३५।२ ) इस पङ्क्ति का स्मरण आता है । विचारा आलोचक उसी व्यक्ति की भाँति है जो समुद्र में स्नान कर चुका है । उसके जल का स्वाद चख चुका है । किन्तु जब उससे कहा गया कि मेघ की वर्षा से प्राप्त जल भी समुद्र का ही है । तब उसके लिए इसपर विश्वास करना असम्भव हो गया, क्योंकि आकृति, प्रकृति और स्वाद किसी भी दृष्टि से उसे समुद्र के जल और मेघ के जल में सादृश्य की अनुभूति नहीं होती । परम्परा का तात्पर्य किसी सिद्धान्त को यदि शब्दशः स्वीकार करना हो तो इस प्रकार की परम्परावादिता गोस्वामीजी में नहीं है । इसे निःसंकोच मानूंगा । परम्परा के प्रति ऐसा आग्रह जड़ता ही है । परम्परावादियों के इस दुराग्रह से तुलसीदास परिचित थे । "श्रुति पुरान बहु कहहिं उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥" ( रा०मा० ७।११६।३ ) इस पङ्क्ति से उनकी इसी दृष्टि का परिचय मिलता है । वेद और पुराणों ने मनुष्य को बन्धनमुक्त करने के लिए अनेक उपाय बताये हैं । किन्तु व्यक्ति उनसे छूटने के स्थान पर अधिकाधिक उलझता ही गया । यह एक ऐसा यथार्थ सत्य है जिसका अनुभव समाज में पद पद पर होता है । जहाँ परम्परा के नाम पर स्थिरता होगी वहाँ जड़ता और अस्वस्थता को छोड़कर और आ ही क्या सकता है ? गोस्वामीजी की परम्परावादिता उस नदी की भाँति है जो अपने मूल स्रोत से कभी भी विच्छिन्न नहीं होतो, फिर भी उसमें प्रतिक्षण नूतन जल प्रवाहित होता है । अगणित वर्षों से प्रवाहित होनेवाली गंगा में स्नान करते