भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 861

७८४ रामायणमीमांसा एकविंश “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥” (रा० मा० १। मङ्गलाचरण २) के अनुसार भवानी और शङ्कर श्रद्धा और विश्वास रूप हैं । श्रद्धा और विश्वास के बिना सिद्ध लोग भी स्वान्तस्थ परमेश्वर को भी नहीं पहचानते । भवानी और शङ्कर दोनों अभिन्नरूप हैं । ‘‘वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” ( रघुवं० १।१ ) वाक् एवं अर्थ के समान दोनों सदा संपृक्त रहनेवाले हैं । जगत् के माता-पिता पार्वती और परमेश्वर की वाग् एवं अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए हम वन्दना करते हैं । जैसे शालग्राम की विष्णु-बुद्धि से पूजा की जाती है वैसे ही वाग् एवं अर्थ में पार्वती तथा परमेश्वर बुद्धि की जाती है । उसी तरह श्रद्धा और विश्वास को भवानी एवं शङ्कररूप कहा है । यद्यपि श्रद्धा एवं विश्वास दोनों अन्तःकरण के वृत्तिरूप हैं । वस्तुतस्तु शिव और विष्णु दोनों एक ही हैं । यह सब लीला शिव की महिमा के प्रख्यापनार्थ ही है । ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार विष्णु के दसों अवतार भगवती के दस नखों से ही प्रकट होते हैं—‘‘कराङ्गु- लिनखोत्पन्ना नारायणदशाकृतिः ।’’ जैसे विष्णु शिव की उपासना करके उनकी शरणागति ग्रहण कर उनके सम्बन्ध में मोह, अज्ञान और संशय प्रकट कर उनका माहात्म्य ख्यापन करते हैं वैसे ही भवानी और शङ्कर दोनों ही राम की महिमा का प्रख्यापन करने के लिए उनकी उपासना करते हैं । वस्तुतः सती ही पार्वती हैं । वे अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी परब्रह्मस्वरूपिणी हैं । उनमें अज्ञान, संशय, मोह और भ्रम की कल्पना नहीं की जा सकती है । जैसे राम ने कहा— “आत्मानं मानुषं मन्ये जातं दशरथात्मजम् ।” ( वा० रा० ६।११९।११ ) मैं अपने को मनुष्य मानता हूँ । यह सब जैसे लीलामात्र है वैसे ही सती का मोह भी । दाक्षायणी इतनी शिवभक्त थी कि वे शिव का अपमान नहीं सह सकीं । बल्कि उन्होंने अपने शरीर को इसी लिए त्याग दिया कि वह शिवद्रोही दक्ष के शुक्र से सम्भूत था । वस्तुतः सती एवं पार्वती दोनों ही एक तत्त्व हैं । सती में न कुतर्क था और न संशय ही था । उन्होंने तो श्रीराम का लोकोत्तर माहात्म्य प्रकट करने के लिए मोह का रूपक उपस्थित किया था । श्रीराम ने जैसे अज्ञान और मोह का रूपक उपस्थित कर के अगस्त्यजी से शिव का माहात्म्य और भक्ति सीखी वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गमय भगवान् शिव का ओर-छोर जानने के लिए हजारों वर्ष तक भटकते रहे, अन्त नहीं पा सके । यह सब लीलामात्र है । संशय आदि सब श्रीरामकथा की भूमिका मात्र हैं । तभी तो सीताजी भगवती की स्तुति करती हुईं उन्हें परब्रह्मरूपिणी ही कहती हैं— “जय जय गिरिवरराजकिसोरी । जय महेशमुखचन्द चकोरी ॥ जय गजबदन षडानन माता । जगतजननि दामिनिदुति गाता ॥ भव भव विभव पराभव कारिनि । विश्वविमोहिनि स्वबशबिहारिनि ॥ नहि तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाव बेद नहिं जाना ॥” (रा०मा० १।२३४।३,४) श्रुति और सूत्रों के अनुसार विश्वप्रपञ्च का उत्पादक, पालक और संहारक ही ब्रह्म होता है । वही आदि, मध्य और अवसान से रहित होता है ।