रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 860, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८३ नहीं कहा जा सकता है। फिर 'अन्ते या मतिः सा गतिः', 'अन्त भला सो भला' के अनुसार हरिश्चन्द्र की अन्तिम स्थिति की सत्यनिष्ठा सर्वोत्कृष्ट रही। उन्होंने सत्यरक्षा के लिए राज्य त्याग दिया। पत्नी और पुत्र का विक्रय कर अपना भी विक्रय किया और डोम के गुलाम बनकर सत्यनिष्ठा से उसकी नौकरी बजायी। मृत पुत्र के दहनादि के लिए अपेक्षित टैक्स वसूल करते समय पत्नी और पुत्र को पहचान लेने पर भी वे कर्तव्य पालन से नहीं हटे। अनादि काल में एक बार की ब्रह्मात्मनिष्ठा निर्णयरूप में आदरणीय होती है वैसे ही अन्तिम धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा प्राणी के जीवन को अलौकिक कर देती है। विश्वामित्र इसी प्रकार श्रीविश्वामित्र के सम्बन्ध में लेखक ने बहुत सी अनर्गल कल्पनाएँ की हैं। यहाँ भी भले उनके प्राक्कालिक जीवन में अनेक उग्रताएँ भी रही हों। परन्तु अन्तिम स्थिति में वे महातपा ब्रह्मविद्वरिष्ठ हो गये। महा- सिद्ध महर्षि वसिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि कहा और वे महाभाष्य के अनुसार स्वयं ही नहीं, किन्तु अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के सहित ब्रह्मर्षि हो गये। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ने उनके शिष्य होकर पाद-संवाहनादि सेवाएँ कीं। वसिष्ठ श्रीवसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक ने और भी अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ की हैं। परन्तु वसिष्ठ साक्षात् ब्रह्मा के पुत्र थे। निमि के शाप से देहपरित्याग कर मैत्रावरुण के तेज से महर्षि अगस्त्य के समान वे वसतीवरी यज्ञपात्र से उत्पन्न होकर कुम्भज भी कहलाये। किसी दिव्य अप्सरा के दर्शनप्रसङ्गज से ही मित्र एवं वरुण के तेज का प्राकट्य हुआ था। इतने मात्र से उन्हें वेश्यापुत्र कहना सर्वथा उपेक्षणीय है। सामान्यतया मनुष्यत्व, पशुत्व आदि जातियों में देह के रहते परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी लिए पशु, पक्षी आदि जातियाँ जैसे उसी देह में बदलती नहीं उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियाँ देह के रहते बदलती नहीं हैं। परन्तु जैसे विशेष तप या वर या शाप से राजा नहुष अजगर हो गया, नन्दी देवता हो गये, उसी प्रकार तपस्या विशेष से क्षत्रिय आदि ब्राह्मण हो सकते हैं। प्रकृति में सब शक्तियाँ विद्यमान होती हैं। सिद्धों के सङ्कल्पविशेष से प्रकृति का आवरण भेद होकर प्रकृत्यापूर से जात्यन्तर परिणाम हो सकता है। पूर्वजात्यारम्भक परमाणुओं का विघटन होकर अभीष्ट जात्यारम्भक परमाणुओं के सङ्घटन द्वारा अभीष्ट जात्यन्तर का निर्माण हो जाता है। विश्वामित्र स्वयं तो महर्षि ऋचीक के संकल्पित चरु एवं विधानों के द्वारा ब्राह्मतेज से पूर्ण थे ही। उन्हें तपस्या द्वारा केवल क्षेत्रान्तरजनित जात्यन्तरांश की निवृत्ति ही करनी पड़ी थी। परन्तु उनके पिता, पितामह, प्रपितामह आदि तो शुद्ध क्षत्रिय थे। तथापि विश्वामित्र के संकल्प विशेष से उनमें प्रकृत्यापूर द्वारा ब्रह्मर्षित्व सम्पन्न हुआ था। महर्षि वसिष्ठ तो ब्रह्मर्षि-पुत्र ही थे। देहान्तर से वे शुद्ध मैत्रावरुण थे। अतः उनके सम्बन्ध किसी भी आक्षेप को अवकाश नहीं है। वे उच्चकोटि के महातपा, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, ब्राह्मतेज से सम्पन्न, परमसिद्ध थे। सूर्यवंश एवं सूर्यवंशावतंस श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के गुरु थे। जिनकी महिमा सर्वविदित है। दाक्षायणी इसी तरह सती दाक्षायणी के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनर्गल प्रलाप है। वस्तुतः—