रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८२ रामायणमीमांसा एकविंश प्रतिपादन है, क्योंकि वे सभी ब्रह्म के ही विकार हैं। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० उ० २।१), 'विज्ञानं ब्रह्म' (तै० उ० ३।५), 'आनन्दो ब्रह्म' (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियाँ अन्यसम्बन्ध के बिना शुद्धरूप से ब्रह्मसम्बद्ध ही हैं। प्रथम कोटि की श्रुतियाँ अन्यपूर्विका हैं, द्वितीय कोटि की अनन्यपूर्विका हैं। अन्यपूर्विका श्रुतियाँ कृष्ण की परकीया हैं तथा अनन्यपूर्विका स्वकीया हैं। उनके पति उनके प्रतिपाद्य इन्द्र, वरुण आदि भिन्न भिन्न देव हैं। रघुवंश महाकाव्य में शिव एवं पार्वती को वाक् और अर्थ के समान परस्पर संपृक्त माना है— “वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” (रघुवं० १।१) इस प्रकार के सम्बन्ध को ही 'गिरा अर्थ जल वीचि सम' इस पद्य में तुलसीदासजी ने भी व्यक्त किया है। ऐसे अभेद, तादात्म्य आदि सम्बन्धों को ही रमण और सम्भोग आदि संज्ञा दे दी जाती है। विद्वानों की दृष्टि में 'स्वातन्त्र्यं पुंस्त्वम्' और 'पारतन्त्र्यं स्त्रीत्वम्' का सिद्धान्त है। सभी जीवों में परतन्त्रतारूप स्त्रीत्व स्वाभाविक है। स्वातन्त्र्य तो केवल एक परमेश्वर में ही है। इस दृष्टि से सभी जीव परतन्त्र होने से स्त्री ही हैं। स्वतन्त्र होने से पुरुष तो एकमात्र श्रीकृष्ण भगवान् ही हैं। इसी लिए गोपाङ्गना-भाव की प्राप्ति ही जीव के कल्याण का मार्ग है। जैसे पतिव्रता पति की काया की छाया बन जाती है। पति के मन में मन, हृदय में हृदय एवं आत्मा में आत्मा मिलाकर तदधीन स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाली हो जाती है। इसी तरह जीव भी यदि भगवान् की स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाला हो तो उसकी स्थिति ही गोपाङ्गना-भाव है। इसी दृष्टि का चित्रण करते समय स्त्री-पुरुष के रमण का रूपक दे दिया जाता है। इसी दृष्टि से कुब्जा और कृष्ण की कथा है। केवल बाहुपाश और स्तन के भीतर ही नहीं, किन्तु अपने अन्तःकरण, अन्तरात्मा और रोम-रोम में श्रीकृष्ण को स्थापित करना ही जीव का भगवान् के साथ रमण है। हरिश्चन्द्र हरिश्चन्द्र के सम्बन्ध में भी लेखक का दोषारोपण निरर्थक ही है। हरिश्चन्द्र ने वरुण से कहा था कि यदि आपकी कृपा से मेरे पुत्र हो तो उसके द्वारा मैं आपका यजन करूँगा। रोहिताश्व पुत्र उत्पन्न हुआ। वरुण ने कहा "पुत्र हो गया अब उससे यजन करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा "अभी तो नामकरण नहीं हुआ, नामकरण के बाद यजन करेंगे।" नामकरण के बाद फिर वरुण आये। तब कहा कि अभी दन्तहीन है। दन्त होने के अनन्तर यजन करेंगे इत्यादि। युवक होते ही रोहिताश्व आखेट के प्रसङ्ग से अरण्य चला गया। वहाँ से कई बार नगर आने को प्रस्तुत हुआ, परन्तु इन्द्र उसे विचरण का ही उपदेश करके रोकते रहे। अन्त में रोहिताश्व के पिता हरिश्चन्द्र जलोदर रोग से ग्रस्त हो गये। वरुण के प्रति की गयी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने के लिए शुनःशेप को खरीद कर वरुण का यजन किया। विश्वामित्र के उपदेश से शुनःशेप भी विभिन्न सूक्तों से वरुणादि की स्तुति कर मुक्त हो गया। इस ढंग की कथा ऐतरेयब्राह्मण आदि ब्राह्मणग्रन्थों में है। परन्तु अनादि जीव के अनादि जीवन में कौन-कौन घटनाएँ होती हैं। इसका ठिकाना नहीं। कभी का डाकू वाल्मीकि कालान्तर में महर्षि वाल्मीकि हो सकता है, हरिश्चन्द्र की पूर्वोक्त घटनाएँ तो कोई बहुत अनुचित नहीं हैं। अपने शिशु के बचाने की दृष्टि से कालातिक्रमण का प्रयत्न अनुचित