भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 858, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 858

किसी दृष्टि से तो चन्द्र-चन्द्रिका तथा भानु-प्रभा जैसा अव्यवधान अभीष्ट होता है। जैसे गङ्गाजल से भी अन्तरङ्ग उसकी शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता का सम्बन्ध होता है। आनन्दसिन्धु की तरङ्ग की अपेक्षा भी उसकी मधुरिमा का सम्बन्ध अन्तरङ्ग होता है। उसी तरह आनन्दसुधासिन्धु कृष्ण में तरंगस्थानीया गोपाङ्गनाएँ हैं किन्तु उनके माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री श्रीराधा हैं। उनका सम्बन्ध अत्यधिक अन्तरंग है। इस अत्यन्त अभेद में रमण और सम्भोग शब्द का प्रयोग होता है। भारतीय शास्त्रों में इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग मिलते हैं जो कि अश्लील-से प्रतीत होते हैं। गीता में कहा गया है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । ( गीता १४।३ ) महद् ब्रह्म प्रकृति मेरी योनि है। इसमें मैं गर्भाधान करता हूँ। यहाँ प्रकृति में ब्रह्मरूपी बिम्ब का प्रतिबिम्ब डालना ही गर्भाधान है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि जैसे कोई प्रियतमा भार्या का आलिंगन करके आनन्दोद्रेक में आन्तर और बाह्य सभी प्रपञ्चों को भूल जाता है वैसे ही जीवात्मा सुषुप्तिकाल में परमात्मा से मिलकर आनन्दोद्रेक में सब कुछ भूल जाता है— “तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तर- मेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम् ।।” (बृ०उ० ४।३।२१) “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते । (छा० उ० ६।८।१) कबीरदास तक सातवें आसमान में अपने निर्गुण पिया की सेज की कल्पना कर वहाँ पहुँचने की तैयारी करते हैं। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के सम्मिलन में नायिका तथा नायक के सम्मिलन और रमण का आरोप किया जाता है। इसमें भी स्वसुखसुखित्व की भावना के कारण कुब्जा की साधारणी रति मणि तुल्य दुर्लभ होती है। रुक्मिणी प्रभृति की समञ्जसा रति में तत्सुखसुखित्व एवं स्वसुखसुखित्व का समन्वय होने से वह चिन्ता- मणि के तुल्य अतिदुर्लभ है। गोपाङ्गनाओं की रति शुद्ध तत्सुखसुखित्व की होने से वह समर्था रति कौस्तुभमणि के तुल्य अनन्यलभ्य है। संसार से विमुख होकर भगवत्सम्मिलन-सुख प्राप्त करना योगीन्द्र-मुनीन्द्रों का लक्ष्य होता है। परन्तु वहाँ भी “निःसंगः प्रज्ञया भवेत्” के अनुसार सुखास्वादन की आसक्ति का त्याग विवक्षित होता है। इसे पर वैराग्य कहा जा सकता है। दृष्ट एवं आनुश्रविक विविध विषयों से वितृष्णता अपर वैराग्य है। परन्तु गुणों से भी शान्ति, सत्त्वपुरुषान्यताख्याति आदि दिव्य सात्त्विक भावों से भी निःस्पृहता होनी ‘पर वैराग्य’ है। ब्रह्मरसास्वादन में भी स्वसुख के लिए नहीं, किन्तु कृष्णसुख के लिए ही सर्वचेष्टा तत्सुखसुखित्व है। इसी प्रकार अन्यपरा श्रुतियाँ परकीया मानी जाती हैं। ब्रह्मपरा स्वकीया मानी जाती है। “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” (क० उ० २।१५ ) के अनुसार सभी वेद-मन्त्रों का महातात्पर्य ब्रह्म में ही है, फिर भी इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि के भी सूक्त हैं। वे इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं का भी प्रतिपादन करते हैं। परन्तु इसका अभिप्राय यही है कि उन उन मन्त्रों और सूक्तों का अवान्तर तात्पर्य उन उन देवताओं में होने पर भी उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्म में ही है। वस्तुतः जैसे किसी पादुका, पाषाण या प्रासाद कहीं पर भी पादविन्यास भूमण्डल पर ही पादविन्यास हैं, क्योंकि वे सभी भूमण्डल के ही विकार हैं। उसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि किसी का भी प्रतिपादन ब्रह्म का ही