भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 857

७८० रामायणमीमांसा एकविंश “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” काम से और भय से जैसे प्राणी तन्मयता को प्राप्त होता है वैसे अन्य उपायों से नहीं । “यथा कामाद् भयाद् वापि मर्यस्तन्मयतामियात् । न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥” वही वस्तु लोकसम्बन्ध में निन्य होने पर भी भगवत्सम्बन्ध से प्रशंसनीय हो जाती है। संसार की तृष्णा निन्द्य है, परन्तु भगवान् के पाने की तृष्णा प्रशंसनीय होती है। संसार की इच्छाएँ त्याज्य होती हैं, भगवत्तत्त्वज्ञान की इच्छा जिज्ञासा यज्ञ, तप, दान आदि से साध्य होती है— “तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन ।” (बृ०उ० ४।४।२२) जैसे चिन्तामणि की ओर दीपकबुद्धि से भी प्रवृत्ति होने से चिन्तामणि की ही प्राप्ति होती है, दीपक की नहीं। उसी तरह श्रीकृष्ण परमात्मा में जार (उपपति) बुद्धि से भी प्रवृत्ति होने पर परमेश्वर की ही प्राप्ति होती है, जार की नहीं। लौकिक जार धर्म, पुण्य और परलोक को जलाता है। किन्तु श्रीकृष्ण अविद्या-ग्रन्थि, कर्म-जाल तथा पञ्चकोशों को जलाते हैं। इसी लिए वे भी जार हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान् आनन्दसमुद्रतुल्य हैं। जीव सब उनके तरङ्गतुल्य हैं। यही शङ्कराचार्य भी मानते हैं— “सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” ( षट्पदी ) “बारि बीचि जिमि गावहिं बेदा ।” ( रा० मा० ७।११०।३ ) एक तरङ्ग का तरङ्गान्तरों के साथ सम्बन्ध अस्थिर तथा व्यभिचरित होता है। किन्तु तरङ्गों का समुद्र के साथ सम्बन्ध स्थिर नित्य होता है। वैसे ही पति, पुत्र और पत्नी रूप से जीवों का सम्बन्ध अस्थिर एवं अनित्य ही होता है। किन्तु उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध ही स्थिर हैं। इस तरह कुब्जा एवं गोपाङ्गनाएँ तथा उनके पति सभी जीव हैं। उनका पारस्परिक सम्बन्ध अस्थिर है। भगवान् का सम्बन्ध ही समुद्र-तरङ्ग के तुल्य नित्य है। अतः कुब्जा आदि का लौकिक पति आदि जीवों का सम्बन्ध ही व्यभिचार है, भगवत्सम्बन्ध ही शुद्ध पातिव्रत है। पति-पत्नी का सम्बन्ध भी वारिवीचि से उपमित है— “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) नन्ददासजी के अनुसार गोपाङ्गनाओं के अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम रोम में श्रीकृष्ण इस तरह भरपूर हैं जैसे तरङ्गों में जल भरपूर होता है— “तरङ्गनि वारि ज्यों ।” सम्भोग भी भोक्ता का भोग्य के साथ तादात्म्यापत्ति ही है। “सविता गोभी रसं भुङ्क्ते” सविता अपनी किरणों से भूमि के रस का सम्भोग करते हैं। दिव्यदम्पती पति-पत्नी भी प्रेमोद्रेक में व्यवधानशून्य होकर मिलते हैं। हार, भूषण, कञ्चुकी आदि का व्यवधान असह्य होता है। प्रेमोद्रेकजनित रोमाञ्च-व्यवधान भी बाधक प्रतीत होता है। सर्वाधिक व्यवधानराहित्य तरङ्ग और जल में ही है।