रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 856, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७९ “इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे” इस लक्ष्मीरूपा कन्या को मैं विष्णुरूपी वर के लिए प्रदान करता हूँ। भगवान् ने वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग कर के पातिव्रत का परमफल उसे प्रदान कर दिया अर्थात् उसे परम पति परमेश्वर भगवान् विष्णु की प्राप्ति हो गयी। बड़े बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र जिसकी प्राप्ति के लिए जप, तप, योग, समाधि का अभ्यास करते हैं वही भगवान् वृन्दा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हुए। छल-छद्म से भी वे उसे प्राप्त करते हैं। भक्तों के लिए भगवान् प्रेम के विषय होते हैं। परन्तु यहाँ तो वृन्दा प्रेम का विषय थी, प्रेम की आस्पद थी। भगवान् तो प्रेम के आश्रय हुए। रहस्य विदित होने पर वृन्दा भगवान् को शाप देती है कि “तुम पाषाण हो जाओ” भगवान् उसके शाप को स्वीकार कर शालग्राम बन जाते हैं। फिर भी वृन्दा को तुलसी के रूप में साथ ही रखते हैं। हजारों पकवानों के होने पर भी तुलसी-दल के बिना स्वीकार नहीं करते हैं। वन्दा अपने पति जालन्धर के साथ चिता में जल जाती है, भगवान् की उपेक्षा कर के। फिर भी प्रभु उसके विप्रलम्भजन्य तीव्र ताप में विह्वल होकर उसके चिताभस्म में विलुष्ठित होते रहे। यह एकाङ्गी प्रेम अद्भुत है। भगवान् में भक्त का नहीं किन्तु भक्त में भगवान् का एकाङ्गी प्रेम, यह भक्त परवशता का उदाहरण है। वस्तुतः वृन्दा भगवान् की ही सदा सर्वदा दिव्य शक्ति लक्ष्मी के समान ही थी। किसी शापादि वश वह जालन्धर की पत्नी बनी थी। उसी स्वाभाविकी प्राचीन भक्तिवशात् भगवान् हठात् छल-छद्म से उसे प्राप्त करते हैं। उसके अधीन सदा के लिए बन जाते हैं। इससे अधिक पातिव्रत का फल क्या होगा ? वास्तव में भगवान् आनन्द- समुद्र हैं। जीव उनकी तरङ्ग चेतन अमर सहज सुखराशि हैं। तरङ्ग का जल के साथ स्थिर सम्बन्ध है। एक तरङ्ग का दूसरी तरङ्ग के साथ स्थिर सम्बन्ध नहीं है। पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि के सम्बन्ध बनते बिगड़ते रहते हैं। अतः लौकिक पति-पत्नी का सम्बन्ध अस्थिर है, वही व्यभिचार है। भगवान् का सम्बन्ध ही स्थिर होने से अव्यभिचरित सम्बन्ध है। जीवात्मा भगवान् से विमुख होकर इतर जीवों पति, पुत्रादि में आसक्त रहता है, तो वही व्यभिचार है। सबसे विमुख होकर भगवान् में अभिमुख होना ही उसका शुद्ध पातिव्रत है। यही गोपाङ्गना-भाव है। पति की काया की छाया बनना ही पातिव्रत है। तरङ्ग की स्थिति, गति और प्रवृत्ति जल की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति, गति तथा प्रवृत्ति बिम्ब की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। घटाकाश महाकाश के पराधीन होता है। जीवात्मा इसी प्रकार भगवान् की काया की छाया बनकर भगवान् को प्राप्त कर लेता है। कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण कुछ लोग कुब्जा के प्रसङ्ग को लेकर श्रीकृष्ण के चरित्र पर आक्षेप करते हैं, परन्तु जिस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण का कुब्जा के साथ अङ्गसङ्ग वर्णित है उसी में श्रीकृष्ण को परात्पर ब्रह्म कहा गया है और यह भी कहा गया है कि प्राणीमात्र के कल्याणार्थ निर्गुण निराकार भगवान् का श्रीकृष्णरूप में प्राकट्य हुआ है। अतः उनमें काम, क्रोध, भय और स्नेह से अथवा किसी तरह भी मन लगाने से प्राणी का कल्याण हो सकता है—