भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 855, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 855

७७८ रामायणमीमांसा एकविंश पितहि तजे प्रह्लाद विभीषण बन्धु भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कान्त ब्रज वनितन भे जगमङ्गलकारी ॥” सीताहरण के कारण लंका जलायी गयी। बड़े-बड़े प्रबल राक्षसों का संहार हो गया। कुम्भकर्ण को जगाया गया। उससे सीताहरण आदि की चर्चा की गयी। उसने पहले रावण की इस अनीति के कारण भर्त्सना की। पश्चात् उसने कहा—'जब आप उस पतिव्रता धरित्री-सुता को लाये और वह पतिव्रता होने के कारण वशवर्तिनी नहीं होती थी तो माया द्वारा स्वयं राम का स्वरूप क्यों नहीं धारण कर लिया ?' रावण ने कहा मैंने वह भी कर के देख लिया। जिस समय मैंने दूर्वादलश्याम 'राम का रूप धारण किया तो मुझे ब्रह्मपद भी तुच्छ प्रतीत होने लगा फिर परस्त्रीसङ्ग की वासना का तो प्रसङ्ग ही कैसे उठ सकता था ? “आनीता भवता यदा पतिरता साध्वी धरित्रीसुता स्फूर्जद्राक्षसमायया न च कथं रामाङ्गमङ्गीकृतम् । कर्तुंञ्चेतसि रामरूपममलं दूर्वादलश्यामलं तुच्छं ब्रह्मपदं परवधूसङ्गप्रसङ्गः कुतः ॥” फिर स्वयं उन भगवान् में कामवासना से परस्त्री के पातिव्रत्य-भङ्ग में प्रवृत्ति कैसे हो सकती थी ? जालन्धर दैत्य अपनी पतिव्रता पत्नी के बल के कारण अवध्य था। वह अनेक पतिव्रताओं का पातिव्रत्य- भङ्ग करता था। रुद्रपत्नी रुद्राणी का भी वह हरण करना चाहता था। परन्तु उसका वध वृन्दा के पातिव्रत्य रहते सम्भव ही नहीं था। यहाँ धर्म ही अधर्म की रक्षा कर रहा था और अधर्म का अभेद्य दुर्ग बन रहा था। अतः जैसे शत्रु-वध के लिए उसके अभेद्य दुर्ग या अभेद्य कवच का विध्वंस आवश्यक होता है वैसे ही जालन्धर-वध के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करना आवश्यक था। वही काम भगवान् ने किया। पर वह सब किया जगन्मंगल के लिए, धर्म-रक्षा के लिए एवं लाखों पतिव्रताओं के पातिव्रत की रक्षा के लिए; काम से या स्वार्थ से नहीं । यह काम दूसरा नहीं कर सकता था, क्योंकि अन्य को वैसा करने का अधिकार नहीं था। हत्या के अपराधी को फाँसी देने का अधिकार राजा या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को ही होता है, अन्य को नहीं। अन्य व्यक्ति वैसा करेगा, तो उसको स्वयं भी फाँसी पर लटकना पड़ेगा। राजा के दण्ड से अपराधी पापों से मुक्त हो जाता है, परन्तु औरों के द्वारा वध से अपराधी अपराध से मुक्त भी न होगा और फाँसी देनेवाला भी स्वयं फाँसी पायेगा। दूसरा कोई वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करता तो वह भी नरक का भागी होता और वृन्दा का पातिव्रत- पालन निष्फल हो जाता, क्योंकि ईश्वर ब्रह्म भगवान् को छोड़कर सब जीव हैं। निषेधातिक्रमण से वे सभी पाप के भागी होते हैं। ईश्वर विधि-निषेधातीत होता है और वही कर्मफलदाता होता है। भगवान् ने यद्यपि संसार के हित के लिए अगणित पतिव्रताओं की रक्षा के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भंग किया तथापि वृन्दा के पातिव्रत का फल वृन्दा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वही कर्मफल दाता हैं। वस्तुतः पातिव्रतधर्म के द्वारा भी परमेश्वर की प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है। जैसे शालग्राम की पूजा से विष्णु-प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है एवं जैसे शालग्राम की विष्णुबुद्धि से ही पूजा की जाती है वैसे ही परमपति परमेश्वर की प्राप्ति के लिए नारी अपने पति की उपासना करती है। कन्यादान के अवसर पर संकल्प भी वैसा ही होता है—