भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 854

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७७ वृन्दा "तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्म वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥" तप, अध्ययन, स्वाभाविक वेदविधान-यज्ञ, उञ्छ, शिल आदि वृत्तियाँ सुपुण्य हैं, पाप नहीं। किन्तु वही सब भावदुष्ट होने पर पाप बन जाती हैं। भगवान् राम ने तपस्वियों के तप की रक्षा के लिए दण्डकवन की यात्रा की थी। परन्तु धुन्धु नामक दैत्य महान् तप कर रहा था। वह किसी समुद्र की रेती में विलीन रहकर प्राणायाम करता था। साल, साल के कुम्भक के बाद जब वह रेचक करता था तो धरित्री में कम्प होता था। धरित्री की धूलि चन्द्र, सूर्य को आच्छन्न कर देती थी। पर्वतों में हड़कम्प मच जाता था। समुद्र उद्वेलित हो अपनी उत्ताल तरङ्गों से विश्व को आप्लावित करने लगता था। पर उसके तप का लक्ष्य था शक्तिसम्पन्न होकर वेदादि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम धर्म का विनाश करना। इसी लिए देवता और ऋषि उसके वध के लिए प्रयत्नशील हो धुन्धुमार नामक राजा को प्रेरित कर के उसका वध कराते हैं। यज्ञ का बहुत बड़ा महत्त्व है। राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए बड़ा परिश्रम किया था। परन्तु जब लङ्का में मेघनाद और रावण का यज्ञ चल रहा था तब उसके विनाश के लिए अङ्गद, हनुमान्, लक्ष्मण आदि ने प्रयत्न किया। क्यों ? इसी लिए कि ऐसे तप एवं यज्ञ, भावदुष्ट होने के कारण, धर्म नहीं अधर्म हो गये हैं। यदि उनका यज्ञ सफल होता तो रावण और मेघनाद अजेय ही हो जाते। वस्तुतः उनका यज्ञ तो दूसरों की बहू-बेटियों के अपहरण के लिए ही था। ऐसा यज्ञ धर्म नहीं। इसी तरह वृन्दा का पातिव्रत्य-धर्म भी हजारों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु हो रहा था। अतः वह अधर्मप्राय हो गया था। उसका विध्वंस ही उस परिस्थिति में धर्म था। भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम एवं परम निष्काम थे। अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी उनकी पत्नी थी। माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता और राधा श्रीराम और श्रीकृष्ण रूप में उनकी पत्नी थीं। काम, वसन्त तथा अप्सराएँ उनके मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सके थे। लोग क्रोधवृत्ति से काम को नष्ट कर सकते हैं। परन्तु क्रोध का उपशमन करना उनके लिए कठिन ही है। वह क्रोध जिनके मन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनसे डरता है; उनके मन में काम कहाँ से कैसे आ सकता है ? भगवान् ने काम से और अप्सराओं से वर माँगने के लिए कहा और अपने ऊरु से उर्वशी जैसी दिव्य अप्सरा को प्रकट कर के इन्द्रलोक के लिए भूषण के रूप में प्रदान किया था। उसका सौन्दर्य, माधुर्य एवं कान्ति निहारकर देवता और अप्सराएँ दोनों हतप्रभ हो गये थे, अतः वे विषयभोग की दृष्टि से जालन्धर की पत्नी के पातिव्रत्य-भङ्ग के लिए प्रयत्न क्यों करते ? उन्होंने अकीर्ति या शाप आदि की चिन्ता न करके लोककल्याण ही किया- "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।" ( रा० मा० १।१२३ ) माता, पिता, गुरु और पति की महिमा शास्त्रों में बहुत वर्णित है। परन्तु वे ही सब यदि श्रीराम-प्राप्ति में बाधक हों तो उन सबका त्याग ही प्रशस्त है- "जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये तिनहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही ।