रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७४ रामायणमीमांसा एकविंश जहाँ सत्य निरपराधों का संरक्षक न होकर उनके नाश का कारण बनता हो वह धर्म नहीं है ! इसी दृष्टि से यदि किसी एक स्त्री के पातिव्रत से सुरक्षित जालन्धर लाखों स्त्रियों का पातिव्रत्य-भङ्ग करता हो और शिव की पार्वती को अपनी पत्नी बनाने का प्रयत्न करता हो और संसार में हिंसा का विस्तार कर के सम्पूर्ण वैदिक धर्म-कर्म को नष्ट कर के लोक का उत्सादन करता हो और जिस पातिव्रत्य के कारण शिवजी के लिए भी अजेय बना हो उस एक स्त्री के पातिव्रत्य का भङ्ग करना धर्म ही है अधर्म नहीं, क्योंकि उससे लाखों का पाति- व्रत्य बचेगा, लाखों की जानें बचेंगी । वेदोक्त धर्म-कर्म की रक्षा होगी । उससे उस अन्यायी असुर का विनाश होगा जिसके द्वारा अहिंसा, धर्म, न्याय और संसार की रक्षा को खतरा उत्पन्न हुआ है । अधर्म का बचाव करनेवाले कवच- रूपी धर्म का विनाश करना ही उचित है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसमें वृन्दा का क्या दोष है ? जो दोष है वह जालन्धर का है । वृन्दा तो अपना धर्म पालन करती है । पति को परमेश्वर मानकर पूजती है । यही उसका धर्म है । उस अपने इष्ट की रक्षा करना भी उसका कर्त्तव्य ही है । पर उसका उद्देश्य अधर्म, हिंसा या व्यभिचार फैलाना तो नहीं है । पर जिस किसी तरह से भी हो चाहे न चाहे उसके पातिव्रत्य से उसका अत्याचारी हिंसक जब अपरिगणित पतिव्रताओं का पातिव्रत्य नाशक असुर अमर होता है, अवध्य होता है तो उसके मूलभूत एक पातिव्रत्य का कोटि-कोटि पातिव्रत्यों की रक्षा के लिए ध्वंस होना ही उचित है । लाघव और गौरव की दृष्टि से भी यही धर्म है । फिर भी जैसे अनधिकृत व्यक्ति द्वारा हत्यारे की भी हत्या पाप ही है । हत्यारे की हत्या करनेवाला अन- धिकृत व्यक्ति भी मृत्युदण्ड पाता है । राजा ही दण्ड देने का अधिकारी होता है । उसके द्वारा नियुक्त अधिकृत व्यक्ति ही हत्यारे को प्राणदण्ड दे सकता है, अन्य नहीं । इसी तरह कर्मफल दाता भगवान् विष्णु ही हैं । वे ही लाखों के पातिव्रत्य के रक्षणार्थ, लोकरक्षणार्थ तथा धर्मरक्षणार्थ एक वृन्दा का पातिव्रत्य-भङ्ग कर सकते हैं और वृन्दा को पातिव्रत्य धर्म का सर्वोत्कृष्ट फल भी प्रदान कर सकते हैं । आखिर सभी धर्मों का अन्तिम परमफल तो भगवत्प्राप्ति ही है । भगवान् ने सीधे उसके धर्म का हरण करके उसके धर्म का परमफल भगवत्प्राप्ति उसे सुलभ करा दिया । शास्त्रों के अनुसार जैसे विष्णु, विष्णुप्रतिमा शालग्राम की पूजा करते करते प्राणी विष्णु की प्राप्ति कर लेता है वैसे ही स्त्री परम मुख्य पति विष्णु की प्रतिमास्वरूप लौकिक पति की पूजा करते करते परम मुख्य पति विष्णु को प्राप्त कर लेती है । विवाह में वर को विष्णुरूप मानकर उसे लक्ष्मीरूपा कन्या का प्रदान किया जाता है । वैसा ही संकल्प पढ़ा जाता है—"इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे" । इस स्थिति में जैसे विष्णु-प्राप्ति होने पर शालग्राम की पूजा का छूट जाना कोई दोष नहीं है उसी तरह परमपति विष्णु की प्राप्ति में वृन्दा का जालन्धरसम्बन्धी पातिव्रत्य-भङ्ग हो जाना कोई दोष नहीं है, क्योंकि उसका फल उसे प्राप्त हो गया । भगवान् शङ्कराचार्य के अनुसार और तुलसी के अनुसार ईश्वर जीव का सम्बन्ध वारिवीचिसम्बन्ध जैसा ही है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) "सो तैं ताहि तोहि नहि भेदा । बारि बीचि जिमि गावहि बेदा ॥” (रा०मा० ७।११०।३) हे नाथ ! यद्यपि हमारा आपका भेद नहीं है तथापि मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं । जैसे समुद्र का तरङ्ग कहा जाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहा जाता है । वह तू है उसमें तुझमें भेद नहीं है । भेद वैसा ही है जैसा वारि और वीचि का भेद है ।