रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 852, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७५ इस दृष्टि से विष्णु सच्चिदानन्द-समुद्र हैं । अनन्तानन्त जीव उनकी अनन्तानन्त तरङ्ग ही हैं । अतएव वे भी चेतन, अमल, सहजसुखराशि हैं । संसार के सभी जीव तरङ्ग ही हैं । पति, पुत्रादि जीव का आपसी सम्बन्ध वैसा ही है जैसे तरङ्गों का आपसी सम्बन्ध । एक तरङ्ग का अपर तरङ्गों के साथ सम्बन्ध स्थायी नहीं होता है । तरङ्गों के समान ही संयोग-वियोग होता ही रहता है । जैसे चौराहे के प्याऊ पर चारों तरफ से राहगीर आकर इकट्ठे होते हैं । आपस में मेलजोल और प्रेम की बातें करते हैं । फिर अपने-अपने रास्ते सब चले जाते हैं । किसी का कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं होता । “कति नाम सुता न लालिताः कति वा नेह वधूरभुञ्जि हिं । क्व नु ते क्व नु ताश्च के वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः ॥” कितने पुत्रों का लालन-पालन नहीं किया, कितनी ही वधुओं का सम्बन्ध नहीं किया । परन्तु आज कहाँ वे सब हैं कहाँ हम हैं । निश्चित भवसङ्गम पान्थ-सङ्गम ही है । नदी की बाढ़ में इधर-उधर से आकर काष्ठ मिल जाते हैं । कुछ दूर तक मिले भी रहते हैं । परन्तु प्रवाह के थपेड़ों से सब पुनः विभक्त होकर बह जाते हैं । वैसे ही जीव कर्मों के अनुसार पति-पत्नी आदि रूप से मिल जाते हैं— “यथा काष्ठञ्च काष्ठञ्च समेयातां महोदधौ । संयुज्य च व्यपेयातां तद्वज्जीवसमागमः ॥” परन्तु किसी भी हालत में तरङ्ग का जैसे जल के साथ वियोग नहीं होता है, उसी तरह जीवों का परमेश्वर के साथ वियोग नहीं होता । अतएव जीवों के सच्चे सङ्गी-साथी परमेश्वर ही हैं । जीव नहीं । मुख्य पति- पत्नी का सम्बन्ध भी वारि-वीचि जैसा ही है । “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीतारामपद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) सीता और राम का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा गिरा एवं अर्थ का तथा जल एवं वीचि का । इस दृष्टि से सब तरङ्गरूप जीवों के परम पति समुद्रस्वरूप भगवान् ही हैं । उनमें मुख्य निष्ठा ही मुख्य पातिव्रत्य है । उन्हें छोड़कर अन्य जीवों से सम्बन्ध जोड़ना ही पातिव्रत्य-भङ्ग है । इस तरह लौकिक पातिव्रत्य धर्म है तो परम परमेश्वर के साथ अखण्डसम्बन्ध-निष्ठारूप परम पातिव्रत्य परम धर्म है । इस तरह वृन्दा के. लौकिक पातिव्रत्य को भङ्ग कर के जहाँ भगवान् ने जालन्धर का वध कराकर अगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य और लोक की रक्षा की वहीं वृन्दा को परम पातिव्रत्यरूप परम धर्म प्रदान कर उसे कृतार्थ कर लोकोत्तर पद प्रदान किया । बड़े बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र जिस भगवान् से प्रेम की भीख माँगते हैं वही भगवान् वृन्दा से प्रेम की भीख माँगते हैं । वृन्दा के लिए पागल होकर अपने लौकिक पति के साथ भस्मीभूत वृन्दा की चिता की भस्म में महीनों लोटते रहे । इसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया है कि भगवान् प्रेमास्पद ही नहीं, किन्तु प्रेमाश्रय भी हैं । जैसे भगवान् से मिलने के लिए भक्त लालायित होते हैं वैसे ही भगवान् वृन्दा से मिलने के लिए लालायित होते हैं । यहाँ तक कि छल-छद्म से भी वृन्दा की प्राप्ति के लिए सचेष्ट होते हैं । उसके प्रेम न करने पर भी उससे प्रेम करते हैं । उसके शाप देने पर भी उसके शाप को अङ्गीकार कर के शालग्राम शिला बनकर भी तुलसी का वियोग नहीं सहन कर सकते । हजारों व्यञ्जन समर्पण करने पर भी तुलसी बिना कोई नैवेद्य ग्रहण नहीं करते हैं ।