रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९१ गोस्वामी वेद-पुराण के पावन पर्वत में ही रामकथा रुचिराकार को सत्ता कहते हैं। परन्तु वेद में राम और सीता का वर्णन ही न हो और उनका वेदों में कोई महत्त्वपूर्ण पद ही न हो। वेदों में इन्द्र ही परम पूज्य हो और रामचरितमानस में श्वानतुल्य इन्द्र निन्दनीय हो; क्या यह प्रत्यक्ष वेद-विरोध नहीं है ? इसका समाधान केवल ‘बाबावाक्यम्’ से नहीं हो सकता । महानुभाव ! वस्तुतः वेद, पुराण और मानस में विरोध खड़ा करना कुटिलता है। वेद और पुराण को नीचा दिखाने की दुश्चेष्टा है। इससे तुलसी या मानस की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, किन्तु प्रतिष्ठा घटेगी । तुलसी वाल्मीकि कवीश्वर को कपीश्वर के समान ही सीताराम-गुणग्राम-पुण्यारण्यविहारी कहते हैं । रामायण को दूषणसहित होने पर भी दोषरहित कहते हैं। सखर सकोमल कहते हैं। आप वाल्मीकि की भूल सुधार उन्हीं तुलसी द्वारा कराना चाहते हैं— “अहो मोह महिमा बलवाना ।” हाँ, तो अब सुनिये वेद, रामायण और मानस का समन्वय । पहले आपको जानना चाहिये कि वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास, जैमिनि, शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व, वल्लभ, शवरस्वामी, कुमारिल, विद्यारण्य, मधुसूदन, श्रीधर, उब्बट, महीधर, पाणिनि, पतञ्जलि तथा कात्यायन सभी वैदिक दयानन्दियों को छोड़कर मन्त्र, ब्राह्मण एवं उपनिषदों को मिलाकर वेद मानते हैं। साथ ही चार संहिता ही वेद नहीं हैं, किन्तु ११३१ ग्यारह सौ एकतीस संहिताएँ तथा उतने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि सब वेद हैं। जिनमें से बहुत आज मर्त्यलोक में अप्राप्त भी हैं। अतएव उपलब्ध ऋचाएँ उनमें से कुछ अंश ही हैं। यजुःसंहिताएँ एवं उनके ब्राह्मण, उपनिषद् आदि भी वेद हैं और ऋचाएँ किसी के द्वारा लिखी या निर्मित नहीं होती हैं । किन्तु सभी वेद भगवान् के निःश्वास से प्रकट होते हैं— “जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ ) ईश्वर के तुल्य ही वे नित्य एवं अनादि हैं। वेदों में सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र हैं । उनको ही केन्द्रित करके ऋचाएँ लिखी गयी हैं । ये विचार पाश्चात्य वेदविरोधियों के हैं, आस्तिकों के नहीं । बेबर, मैक्समूलर, राय आदि ही दुरभिसन्धिवशात् ऐसा लिखते हैं । यह हमारी रामायणमीमांसा में स्पष्टरूप से वर्णित है । वेदों और उपनिषदों के अनुसार सब वेदों का तात्पर्य सच्चिदानन्द परब्रह्म में ही है— “जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ ) “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्....यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।” ( श्वेता० उ० ४।८ तथा बह्वृचोपनिषत् ) “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” ( कठउ० २।१५ ) ऋक् उपलक्षित सभी वेदों का तात्पर्य अक्षर ब्रह्म में ही है जो उसको नहीं जानता तो उसे ऋक् से क्या लाभ ? गीता भी यही कहती है— “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” ( गीता० १५।१५ ) सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ ।