भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 869

७९२ रामायणमीमांसा एकविंश जैसे पादुका, शिविका, सिंहासन आदि पर पैर धरने से भी कोई नहीं कह सकता कि मैं पृथिवी पर पैर नहीं धरता । क्योंकि वे सब भी पृथिवी के विकार हैं। इसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि का प्रतिपादन भी परमात्मा का ही प्रतिपादन है, क्योंकि वे सब परमात्मा के ही विकार हैं— “कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ।” (भाग० १०।८७।१५–वेदस्तुतिः ) वेदलक्षणा भारती उक्थजड़ों को अपनी अभिधा, लक्षणा, गौणी आदि वृत्तियों से भ्रमित कर देती है। वेदों में इन्द्र, अग्नि आदि की स्तुतियाँ अवश्य अधिक हैं। परन्तु शिव तथा विष्णु के भी बहुत से मन्त्र हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि वेदों में जिसका बहुत वर्णन हो वही वेदार्थ है। क्योंकि वेदों में तो कर्मकाण्ड का ही अधिक वर्णन है। उससे कम उपासना का वर्णन है। ज्ञानकाण्ड का तो बहुत ही कम वर्णन है, तथापि मुख्य ज्ञान- काण्ड ही है। साध्य-सिद्धि के लिए अधिकांश प्रयास तो साधन में ही करना पड़ता है। कुल्हाड़ी से वृक्ष काटा जाता है। सारा प्रयास कुठार के उद्यमन तथा निपातन में ही किया जाता है। काष्ठ का द्वैधीभाव फल तो साधन-व्यापार में ही सम्पन्न होता है। प्राणियों की ब्रह्म-प्राप्ति होने में मल, विक्षेप और आवरण ये तीन ही बाधक होते हैं। तीनों की निवृत्ति के लिए कर्म, उपासना और ज्ञान की अपेक्षा होती है। प्रत्येक शाखा के लक्ष संख्यावाले वेदों में अस्सी- हजार मन्त्र और ब्राह्मण कर्म का प्रतिपादन करते हैं। सोलह हजार उपासना का और चार हजार ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं। कर्मों में भी काम्य कर्मों का प्रतिपादन अधिक है, निष्काम कर्मों का कम, क्योंकि पाशविक काम, कर्म, ज्ञानरूप मृत्यु का अतिक्रमण करने के लिए पहले वैदिक कर्मज्ञान की अपेक्षा होती है। “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” ( ईशोपनिषद् ११ ) इन्द्र, अग्नि आदि कर्म के प्रधान देवता हैं अतः उनका अधिक वर्णन ठीक ही है। देवता भी ईश्वर के ही अंश हैं। फिर उनका ऐश्वर्य निःसीम नहीं है। परन्तु कर्मफलदाता तो ईश्वर हैं। देवताओं में निरतिशय सर्वज्ञता नहीं होती। वे जगत् के कारण भी नहीं होते। अनन्त ब्रह्माण्डात्मक विश्व का कारण परमेश्वर होता है। यह नासदीय आदि सूक्तों और अपरिगणित मन्त्रों एवं उपनिषदों से सिद्ध है। कर्माङ्गभूत इन्द्र की खूब महिमा वर्णित है। पर उसे जगत् का निरपेक्ष कारण नहीं कहा गया है। देवतारूप इन्द्र भी उत्कृष्ट कोटि का जीव ही है। यह ब्रह्मसूत्रों की प्रतर्दन-विद्या में स्पष्टतया कहा गया है। इसी लिए बृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषदों में अखण्ड भूमण्डलाधिपति द्रढिष्ठ, बलिष्ठ और धर्मिष्ठ सम्राट् के मानवानन्द से शतगुणित आनन्द मानवगन्धर्व का माना गया है। उससे सौ गुना देवगन्धर्व का आनन्द और उससे सौ गुना देवों का, उससे सौ गुना कर्मदेवों का, उससे सौ गुना बृहस्पति का आनन्द, उससे सौ गुना प्रजापति का, उससे सौ गुना ब्रह्मा का, उससे भी अनन्त गुना अधिक परब्रह्म का आनन्द होता है। ब्रह्मा आदि का आनन्द ब्रह्मानन्द का एक कणमात्र है। ब्रह्मानन्द तो अनन्त समुद्र तुल्य है— “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० उ० २।५।२१ ) इत्यादि स्थलों में तो इन्द्रशब्द का अर्थ शुद्ध परमात्मा ही है, देवात्मा नहीं। इसी तरह—'इन्द्रवरुणं मित्रवरुणम्' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ), 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं १।१६४।४६ ) इत्यादि स्थलों में इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि शब्दों का परमेश्वर ही अर्थ है, परिच्छिन्न देवता नहीं। ब्रह्मसूत्रों के प्रकरणानुसार आकाश, प्राण आदि शब्दों से भी परमात्मतत्त्व ही विवक्षित कहा गया है। विशेष जानकारी के लिए उन उन प्रकरणों को देखें। परन्तु विष्णु, रुद्र आदि सूक्तों द्वारा शिव या विष्णु को जगत् का परम कारण परब्रह्म कहा गया है—