भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 870

“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । “दिवीव चक्षुराततम्” (ऋ० सं० १।२२।२०), “जागृवांसः समिन्धते ॥” (ऋ० सं० १।२२।२१), “विष्णोः कर्माणि पश्यत ।” “इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधाऽस्य निदधे पदम् ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० ) “पुरुष एवेदं सर्वम् ।” “एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे । शिव और विष्णु सम्बन्धी थोड़े मन्त्रों में भी उन्हें ईश्वर परमात्मा सर्वकारण कहा गया है । परन्तु इन्द्र, अग्नि आदि के बहुत मन्त्रों में भी उनकी ईश्वरता का वर्णन नहीं किया गया है । “येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥” ( गीता ९।२३ ) “लभन्ते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ।” ( गीता ७।२२ ) इन्द्र, वरुण और अग्नि के यजन-पूजन से अपरिगणित फल मिलते हैं । इसी लिए उन्हें कर्मफल देनेवाला भी कहा जाता है । परन्तु जो अनन्त ब्रह्माण्डों एवं एक एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं उनके अनन्त जन्मों एवं एक एक जन्म के अनन्त कर्मों को जान सकता है वह परमेश्वर ही मुख्य फलदाता है । उन देवताओं की पूजा भी परमेश्वर की ही पूजा है । उनका भी फल भगवान् ही देते हैं । ईश्वर एक ही होता है । उनके नाम और स्वरूप भिन्न हो सकते हैं । परन्तु तत्त्व एक ही होता है । अतः भिन्न स्थलों में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, सीता, राधा आदि रूप में उसी का वर्णन होता है । “यथा अनेक वेष धरि नृत्य करे नट कोई । जोइ जोइ रूप दिखावइ आपुनु होइ न सोइ ॥” ( रा० मा ७।७२ ) वेद के ही शिव का शिव, स्कन्द आदि पुराणों में सर्वातिशायी महत्त्व वर्णित है । वेद के ही विष्णु का विष्णुपुराण और पद्मपुराण में लोकोत्तर माहात्म्य वर्णित है । विष्णुपुराण के अनुसार विष्णु ही राम हैं । वही कृष्ण हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार उन्हीं अनन्त ब्रह्माण्डनायक ईश्वर विष्णु का राम के रूप में वर्णन है । पुराणों, अध्यात्म आदि अनेक रामायणों में भी परब्रह्म रूप में राम का वर्णन है । वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्ण भी कहा गया है—“कृष्णश्चैव बृहद्बलः” श्रीभागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि में उसी परमविष्णु का कृष्ण के रूप में वर्णन है । भिन्न भिन्न नामों से एक वेदवेद्य परमात्मा का ही वर्णन है । समन्वय कर सकने में असमर्थ अनभिज्ञ लोग हो भिन्न भिन्न शिव, विष्णु, राम और कृष्ण को अलग अलग मानकर भ्रान्त होते हैं । “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥” खण्डन-मण्डन तथा उत्कर्ष-अपकर्ष के वर्णन का तात्पर्य उन उन स्वरूपों की प्रशंसा में ही है, खण्डन या निन्दा में तात्पर्य नहीं है— “नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् ।” निन्दा का तात्पर्य निन्दा में न होकर विधेय की स्तुति में ही होता है । इस दृष्टि से वेदों में कर्माङ्गदेवता के रूप से वर्णित इन्द्र का अधिक वर्णनमात्र देखकर अनभिज्ञ उन्हीं को सर्वोत्कृष्ट देवता मानने लगते हैं । पुराणों में नहीं, मन्त्रों और ब्राह्मणों में इन्द्र को वृत्र के हनन में विष्णु की १००