भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 873, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 873

विश्वासी बन जाय अपने पुत्र की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए दूसरे के पुत्र को बलि देने के लिए सङ्कोच का अनुभव न करे । विश्वामित्र वेद और पुराणों के मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। उनके त्याग और तपस्या की अद्भुत गाथाओं से पुराणों के पृष्ठ अङ्कित हैं पर उनका चरित्र भी अपूर्णताओं का पुञ्ज है। अपनी महत्त्वाकाङ्क्षाओं की पूर्ति के लिए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के सौ पुत्रों को नष्ट कर देना एवं वसिष्ठ का वध करने के लिए प्रस्तुत हो जाना इसी अन्धकार पक्ष का परिचय देता है । अतः उनके ऋषित्व से समाज दिग्भ्रान्त हो सकता है । वह यह समझकर सन्तुष्ट हो सकता है कि अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए यदि विश्वामित्र सब कुछ कर सकते हैं तो हमारे लिए वह और भी स्वाभाविक है। वेदों में बहुत कुछ ऐसा अग्राह्य अंश किसी विशेष काल के लिए ही समझना चाहिये । उसे भगवान् व्यास ने परिष्कृत करने का प्रयास किया था। किन्तु पुराण केवल आदर्श नहीं, अनादर्श भी प्रस्तुत करते हैं। इनके भी परिष्कार की आवश्यकता थी । यह कार्य रामकथा द्वारा सम्पन्न होता है सारे वेदों और पुराणों में चरित्र की समग्रता का यदि कोई मापदण्ड हो सकता है तो एकमात्र भगवान् श्रीराम । इतिहास में ऐसे सहस्रों व्यक्ति हुए जो किसी विशेष घटना के कारण लोकमानस में धूमकेतु के समान अचानक चमक उठे। किन्तु प्रकाश तो सूर्य का ही है । जो अगणित वर्षों से प्रतिदिन समाज और व्यक्ति को प्रकाश देता है और देता रहेगा ।" उत्तरपक्ष यह है वेदों और पुराणों के प्रति आधुनिक मानसवक्ता महाशय की धारणा । उनको यह भी नहीं समझ में आया है कि हम मानस और उसके आचार्य शिव और परमाराध्य श्रीराम तथा तुलसी का आदर कर रहे हैं या निरादर कर रहे हैं। शायद उनका ध्यान तुलसी की— "जो कोइ दूषइ श्रुति करि तरका । परइ ते कोटि कल्प भरि नरका ॥" इस पंक्ति पर नहीं गया है। "तुलसी महिमा बेद की को करि सकै बिचार । जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥" मालूम होता है कि उनकी दृष्टि में जैसे वेद का परिष्कार व्यास ने पुराणों द्वारा किया तथा इतिहास एवं पुराणों का परिष्कार तुलसी ने मानस द्वारा किया, वैसे ही वे मानस का परिष्कार अपनी मानसमुक्तावली द्वारा कर रहे हैं। परिष्कार का अर्थ काटछाँट प्रसिद्ध ही है । दोषों को निकाल देना तथा गुणों का आधान करना, मलापनयन और गुणाधान ही तो परिष्कार हो सकता है, परन्तु सनातन वैदिक परम्परा के यह सर्वथा विरुद्ध है । वेद अपौरुषेय होने से अपास्तसमस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्क हैं । वेदों को सदोष मानने का अर्थ है कि उनका अप्रामाण्य मानना । पुरुष में भ्रम, प्रमाद आदि दोष होते हैं, अतः पौरुषेय ग्रन्थों में दोषों की शङ्का बनी रहती है। तभी तुलसी वेद को दूषणयुक्त कहनेवाले के लिए कोटिकल्प तक नरकवासी होना कहते हैं । वे तो रामायण को भी दूषणसहित होने पर भी दोषरहित कहते हैं। परन्तु उक्त वक्ता तुलसी को इतिहास और पुराणों का भी परिष्कार करनेवाला कहना चाहते हैं । राम की दृष्टि में— "सिबि दधीच हरिचन्द नरेसा । सहेउ धरम हित कोटि कलेसा ।।" (रा० मा० २।९४।२)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 873, कुल 1049 में से · BharatKosha