रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 872, कुल 1049 में से
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अष्टम अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९५ ब्रह्माजी कहते हैं कि तम प्रकृति, महान्, अहं, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी आदि अष्टावरणोंसे समावृत सात वितस्ति (बित्ता) परिमाणवाला ब्रह्माण्ड का अभिमानी कहाँ ब्रह्मा मैं और कहाँ अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके एक एक रोम में परिभ्रमण करते हैं ऐसी आपकी महिमा । इसी प्रकार शिव की महिमा का भी वर्णन है। शिवजी के भी अंश से अनेक ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, इन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं। शिवपुराण, शिवरहस्य, स्कन्दपुराण काशीखण्ड, केदारखण्ड आदि में यह स्पष्ट है। अतएव रामभक्ति की दृष्टि से श्रीराम ही वेदों, पुराणों, तन्त्रों और आगमों में अनेक नामों एवं रूपों में वर्णित हैं। वही नाम- रूपातीत निर्गुण निर्विशेष रूप में भी वर्णित हैं । जब राम, कृष्ण, विष्णु, शिव एक ही वस्तु हैं तब कौन कह सकता है कि वेदों में उनको महत्त्वपूर्ण पद नहीं प्राप्त है। वेदों में ब्रह्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है । वही ब्रह्मा, विष्णु, राम और कृष्ण हैं । सीता का भी मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं उपनिषदों में महत्त्वपूर्ण वर्णन है। सीता लाङ्गुलपद्धति के रूप में वर्णित होती हुई भी निर्विशेष सत्तासामान्यरूप में तथा ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के रूप में भी वर्णित है । प्रणव बहुत छोटा सा मन्त्र है । परन्तु उसी से सम्पूर्ण वेद का प्रादुर्भाव होता है। वेद उसी की व्याख्या है। व्यक्ति और समाज को वेदादि शास्त्रानुसारी बनना चाहिए । वेदों, शास्त्रों और पुराणों को समाज के अनुसार बनाने की रीति भारतीय नहीं है। फिर यह कहना कहाँ तक सङ्गत है कि "वेदों और पुराणों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे शब्दशः ग्रहण करने पर व्यक्ति और समाज दोनों का अकल्याण ही हो सकता है । हरिश्चन्द्र पूर्वपक्ष - यद्यपि उनमें शतशः ऋषियों और अगणित राजपुरुषों के चरित्रों का वर्णन आता है। धर्म और जीवन के किसी किसी अङ्ग पर उनसे प्रकाश पड़ता है। किन्तु वे ऋषि या महापुरुष दुर्बलताओं से सर्वथा शून्य नहीं हैं। उनमें जीवन की समग्रता का आदर्श प्राप्त नहीं होता । महाराज हरिश्चन्द्र की गणना महा- पुरुषों में की जाती है। सत्यवादिता के प्रतीक के रूप में वे समाज में सर्वमान्य हैं । सत्य की रक्षा के लिए वे बड़ा से बड़ा बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । पर उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी है। वे सन्तान की कामना से प्रेरित होकर यह मनौती मान लेते हैं कि सन्तान होने पर मैं बालक का ही बलिदान कर दूंगा। इससे उनकी मोहान्धता का परिचय मिलता है । लगता है कि वे अनपत्यता के कलङ्क से इतने भयभीत थे कि समाज पुत्रहीन समझ कर उनको हेय दृष्टि से देखे यह उनको असह्य था। इस कलङ्क को मिटाने के लिए वे इस सीमा तक जाने को प्रस्तुत होते हैं। सोचा कि पहले पुत्र हो फिर देखा जायगा । पुत्र होने के बाद बलिदान के वचन को टालते गये । अन्त में वे अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए तथा स्वयं की रुग्णता के निवारणार्थ शुनःशेप नाम के बालक को खरीद कर उसका बलिदान करने को प्रस्तुत होते हैं । महर्षि विश्वामित्र की कृपा से बालक की रक्षा होती है । यह भाग उनके चरित्र के निम्नतम भावों एवं दुर्बलताओं का परिचायक है । हरिश्चन्द्र का एक महापुरुष के रूप में वर्णन करने का भी दुष्परिणाम हो सकता है कि व्यक्ति जीवन के उत्तरार्द्ध में उनकी सत्यवादिता के स्थान पर बलिदान के द्वारा निःसन्तान को पुत्रप्राप्ति की परम्परा का अन्ध-