भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

Here is the line-by-line transcription of the Hindi text from the provided image:

अष्टम अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९५ ब्रह्माजी कहते हैं कि तम प्रकृति, महान्, अहं, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी आदि अष्टावरणोंसे समावृत सात वितस्ति (बित्ता) परिमाणवाला ब्रह्माण्ड का अभिमानी कहाँ ब्रह्मा मैं और कहाँ अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके एक एक रोम में परिभ्रमण करते हैं ऐसी आपकी महिमा । इसी प्रकार शिव की महिमा का भी वर्णन है। शिवजी के भी अंश से अनेक ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, इन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं। शिवपुराण, शिवरहस्य, स्कन्दपुराण काशीखण्ड, केदारखण्ड आदि में यह स्पष्ट है। अतएव रामभक्ति की दृष्टि से श्रीराम ही वेदों, पुराणों, तन्त्रों और आगमों में अनेक नामों एवं रूपों में वर्णित हैं। वही नाम- रूपातीत निर्गुण निर्विशेष रूप में भी वर्णित हैं । जब राम, कृष्ण, विष्णु, शिव एक ही वस्तु हैं तब कौन कह सकता है कि वेदों में उनको महत्त्वपूर्ण पद नहीं प्राप्त है। वेदों में ब्रह्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है । वही ब्रह्मा, विष्णु, राम और कृष्ण हैं । सीता का भी मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं उपनिषदों में महत्त्वपूर्ण वर्णन है। सीता लाङ्गुलपद्धति के रूप में वर्णित होती हुई भी निर्विशेष सत्तासामान्यरूप में तथा ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के रूप में भी वर्णित है । प्रणव बहुत छोटा सा मन्त्र है । परन्तु उसी से सम्पूर्ण वेद का प्रादुर्भाव होता है। वेद उसी की व्याख्या है। व्यक्ति और समाज को वेदादि शास्त्रानुसारी बनना चाहिए । वेदों, शास्त्रों और पुराणों को समाज के अनुसार बनाने की रीति भारतीय नहीं है। फिर यह कहना कहाँ तक सङ्गत है कि "वेदों और पुराणों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे शब्दशः ग्रहण करने पर व्यक्ति और समाज दोनों का अकल्याण ही हो सकता है । हरिश्चन्द्र पूर्वपक्ष - यद्यपि उनमें शतशः ऋषियों और अगणित राजपुरुषों के चरित्रों का वर्णन आता है। धर्म और जीवन के किसी किसी अङ्ग पर उनसे प्रकाश पड़ता है। किन्तु वे ऋषि या महापुरुष दुर्बलताओं से सर्वथा शून्य नहीं हैं। उनमें जीवन की समग्रता का आदर्श प्राप्त नहीं होता । महाराज हरिश्चन्द्र की गणना महा- पुरुषों में की जाती है। सत्यवादिता के प्रतीक के रूप में वे समाज में सर्वमान्य हैं । सत्य की रक्षा के लिए वे बड़ा से बड़ा बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । पर उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी है। वे सन्तान की कामना से प्रेरित होकर यह मनौती मान लेते हैं कि सन्तान होने पर मैं बालक का ही बलिदान कर दूंगा। इससे उनकी मोहान्धता का परिचय मिलता है । लगता है कि वे अनपत्यता के कलङ्क से इतने भयभीत थे कि समाज पुत्रहीन समझ कर उनको हेय दृष्टि से देखे यह उनको असह्य था। इस कलङ्क को मिटाने के लिए वे इस सीमा तक जाने को प्रस्तुत होते हैं। सोचा कि पहले पुत्र हो फिर देखा जायगा । पुत्र होने के बाद बलिदान के वचन को टालते गये । अन्त में वे अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए तथा स्वयं की रुग्णता के निवारणार्थ शुनःशेप नाम के बालक को खरीद कर उसका बलिदान करने को प्रस्तुत होते हैं । महर्षि विश्वामित्र की कृपा से बालक की रक्षा होती है । यह भाग उनके चरित्र के निम्नतम भावों एवं दुर्बलताओं का परिचायक है । हरिश्चन्द्र का एक महापुरुष के रूप में वर्णन करने का भी दुष्परिणाम हो सकता है कि व्यक्ति जीवन के उत्तरार्द्ध में उनकी सत्यवादिता के स्थान पर बलिदान के द्वारा निःसन्तान को पुत्रप्राप्ति की परम्परा का अन्ध-

विश्वासी बन जाय अपने पुत्र की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए दूसरे के पुत्र को बलि देने के लिए सङ्कोच का अनुभव न करे । विश्वामित्र वेद और पुराणों के मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। उनके त्याग और तपस्या की अद्भुत गाथाओं से पुराणों के पृष्ठ अङ्कित हैं पर उनका चरित्र भी अपूर्णताओं का पुञ्ज है। अपनी महत्त्वाकाङ्क्षाओं की पूर्ति के लिए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के सौ पुत्रों को नष्ट कर देना एवं वसिष्ठ का वध करने के लिए प्रस्तुत हो जाना इसी अन्धकार पक्ष का परिचय देता है । अतः उनके ऋषित्व से समाज दिग्भ्रान्त हो सकता है । वह यह समझकर सन्तुष्ट हो सकता है कि अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए यदि विश्वामित्र सब कुछ कर सकते हैं तो हमारे लिए वह और भी स्वाभाविक है। वेदों में बहुत कुछ ऐसा अग्राह्य अंश किसी विशेष काल के लिए ही समझना चाहिये । उसे भगवान् व्यास ने परिष्कृत करने का प्रयास किया था। किन्तु पुराण केवल आदर्श नहीं, अनादर्श भी प्रस्तुत करते हैं। इनके भी परिष्कार की आवश्यकता थी । यह कार्य रामकथा द्वारा सम्पन्न होता है सारे वेदों और पुराणों में चरित्र की समग्रता का यदि कोई मापदण्ड हो सकता है तो एकमात्र भगवान् श्रीराम । इतिहास में ऐसे सहस्रों व्यक्ति हुए जो किसी विशेष घटना के कारण लोकमानस में धूमकेतु के समान अचानक चमक उठे। किन्तु प्रकाश तो सूर्य का ही है । जो अगणित वर्षों से प्रतिदिन समाज और व्यक्ति को प्रकाश देता है और देता रहेगा ।" उत्तरपक्ष यह है वेदों और पुराणों के प्रति आधुनिक मानसवक्ता महाशय की धारणा । उनको यह भी नहीं समझ में आया है कि हम मानस और उसके आचार्य शिव और परमाराध्य श्रीराम तथा तुलसी का आदर कर रहे हैं या निरादर कर रहे हैं। शायद उनका ध्यान तुलसी की— "जो कोइ दूषइ श्रुति करि तरका । परइ ते कोटि कल्प भरि नरका ॥" इस पंक्ति पर नहीं गया है। "तुलसी महिमा बेद की को करि सकै बिचार । जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥" मालूम होता है कि उनकी दृष्टि में जैसे वेद का परिष्कार व्यास ने पुराणों द्वारा किया तथा इतिहास एवं पुराणों का परिष्कार तुलसी ने मानस द्वारा किया, वैसे ही वे मानस का परिष्कार अपनी मानसमुक्तावली द्वारा कर रहे हैं। परिष्कार का अर्थ काटछाँट प्रसिद्ध ही है । दोषों को निकाल देना तथा गुणों का आधान करना, मलापनयन और गुणाधान ही तो परिष्कार हो सकता है, परन्तु सनातन वैदिक परम्परा के यह सर्वथा विरुद्ध है । वेद अपौरुषेय होने से अपास्तसमस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्क हैं । वेदों को सदोष मानने का अर्थ है कि उनका अप्रामाण्य मानना । पुरुष में भ्रम, प्रमाद आदि दोष होते हैं, अतः पौरुषेय ग्रन्थों में दोषों की शङ्का बनी रहती है। तभी तुलसी वेद को दूषणयुक्त कहनेवाले के लिए कोटिकल्प तक नरकवासी होना कहते हैं । वे तो रामायण को भी दूषणसहित होने पर भी दोषरहित कहते हैं। परन्तु उक्त वक्ता तुलसी को इतिहास और पुराणों का भी परिष्कार करनेवाला कहना चाहते हैं । राम की दृष्टि में— "सिबि दधीच हरिचन्द नरेसा । सहेउ धरम हित कोटि कलेसा ।।" (रा० मा० २।९४।२)

अध्यार्थ रामचरितसम्बन्धी लेख ७९७ हरिश्चन्द्र भारतीय संस्कृति के परम आदर्श हैं। विश्वामित्र के तो श्रीरामजी शिष्य ही थे। क्या श्रीराम और शिवजी और तुलसी ने यह नहीं सोचा कि हम हरिश्चन्द्र को महत्त्व दे रहे हैं। विश्वामित्र को गुरु मानकर पूज रहे हैं पादसंवाहन कर रहे हैं। परन्तु उसको महत्त्व देने से समाज दिग्भ्रान्त हो जायगा। हरिश्चन्द्र का अनुकरण कर अपने पुत्र के लिए दूसरे के पुत्रों का बलिदान देगा। विश्वामित्र की तरह अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा के लिए वसिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों की हत्या करने में न संकुचायेगा। वस्तुतः—"नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति" यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा नहीं देख सकता। जो सुधारवाद के व्यामोह से वेद, पुराण और मानस का अर्थ न समझे या उसके अर्थ का अनर्थ करे तो उसमें न वेदादि का दोष है और न तुलसी आदि का दोष है। वेदव्याख्याता जैमिनि, शबरस्वामी एवं कुमारिलभट्ट के अनुसार—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य- मतदर्थानाम्" (जै० सू० १।२।१) आम्नाय सकल वेदराशि का वैदिक यज्ञादि क्रियाओं के प्रतिपादन में ही तात्पर्य है। जो क्रियार्थक भाग नहीं है, उसका स्वार्थ में तात्पर्य नही है— "विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै० सू० १।२।७) जो भाग क्रियार्थक नहीं हैं ऐसे अर्थवाद आदि विध्यर्थ के स्तावक होने से ही प्रमाण हैं। निषिद्ध से निवृत्ति के लिए निन्दार्थवाद होते हैं। व्यास, शङ्कर, रामानुज आदि पूर्व वेद के काण्डका जैमिनि के समान यज्ञक्रिया के प्रतिपादन में तात्पर्य मानते हुए भी सम्पूर्ण वेद का विशेषतः वेदान्तों का तात्पर्य परब्रह्म परमेश्वर के ही प्रतिपादन में मानते हैं। सृष्टि-प्रतिपादक वाक्यों का भी ब्रह्मस्वरूप के निरूपण में ही पर्यवसान है। वेद के जितने व्याख्यान या इतिहास हैं वे लौकिक इतिहासों के समान नहीं हैं, क्योंकि लौकिक इतिहासों का उल्लेख घटनाओं के पश्चात् उल्लिखित किया जाता है। किन्तु वेद अनादि एवं नित्य हैं। अतः उनका घटना के पश्चात् उल्लेख का प्रश्न हो नहीं उठता। किन्तु जैसे किसी विद्यार्थी को गणित विद्या बताने के लिए अध्यापक कल्पित आख्यायिका का प्रयोग करता है, वैसे ही किसी तत्त्व को समझाने के लिए वेद में भी आख्यानों की कल्पना की जाती है। अध्यापक कहता है कि रामनगर के रामदत्त ने पाँच रुपये मन के हिसाब से भूसा खरीदा तो डेढ़ हजार रुपये का कितना भूसा हुआ? वस्तुतः अध्यापक का न रामनगर से प्रयोजन है और न रामदत्त से प्रयोजन है। उसका तात्पर्य केवल गणित समझाने में है। गणित समझाने के लिए आख्यायिका की कल्पना की है। इसी तरह वेद की आख्यायिका या इतिहास सब काल्पनिक आख्यानमात्र होते हैं। वेदों और मन्वादि के अनुसार वैदिक शब्दों के अनुसार ही ईश्वर सृष्टि करता है। अतः उन आख्या- यिकाओं या इतिहासों के आधार पर घटनाएँ भी हो सकती हैं। अतः वैदिक इतिहास घटनापूर्वक नही होते। किन्तु घटनाएँ तदनुसार हो सकती हैं। फिर भी आचरण में हिस्ट्री या इतिहास प्रमाण नहीं होता। किन्तु उसमें विधि, संविधान या कांस्टिट्यूशन कानून का ही आश्रयण किया जाता है— "प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्" प्रजापति ने अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ किया। पर उनके अनुसार यह विधि नहीं होती कि मनुष्य को भी अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ करना चाहिये। मन्त्र और अर्थवाद का जहाँ प्रत्यक्ष विधि से विरोध न हो वहाँ लिङ्गबलात् विधि की कल्पना हो सकती है। कल्पित विधि का प्रत्यक्ष विधि से विरोध होने पर कल्पित विधि बाधित हो जाती है। जहाँ प्रत्यक्ष विधि का विरोध न हो वहाँ कल्पित विधि से भी अनुष्ठान होता है।

७९८ रामायणमीमांसा एकविंश हरिश्चन्द्र की कथा का सम्बन्ध ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण से है। अन्यत्र भी उसकी चर्चा है। पुत्रेष्टि याग का वह अर्थवाद है। पुत्रेष्टि याग की प्रशंसा में ही उसका तात्पर्य है। “पुत्रेणायं लोको जय्यः कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः।” इन श्रुतियों के अनुसार पुत्र से मनुष्यलोक की प्राप्ति होती है, कर्म से पितृलोक और विद्या (उपासना) से देवलोक की प्राप्ति होती है। तीनों से जो विरक्त होता है उसके ही लिए ब्रह्मविद्या का उपदेश है। “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।” (कैवल्योपनिषत् १।२) “किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः।” (बृ० उ० ४।४।२२) हरिश्चन्द्र जैसे महान् सम्राट् ने भी पुत्र के लिए अपने को सङ्कट में डाला था। अतः पुत्र के लिए पुत्रेष्टि करनी चाहिये। प्रवृत्ति या निवृत्ति विधि या निषेध के ही बल पर होती है, आख्यान के बल पर नहीं। कई ऐतिहासिक घटनाएँ दौर्भाग्यपूर्ण भी होती हैं। पर उनका आचरण नहीं किया जाता है। इसी लिए विधि अथवा निषेध के अनुसार ही प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है। वेदों में ही— “न हिंस्यात् सर्वा भूतानि” के अनुसार हिंसा निषिद्ध है। फिर यदि पुत्रार्थ मनुष्य की हिंसा विहित होती तो उत्सर्ग अपवाद भाव हो सकता था। परन्तु ऐसी कोई विधि है नहीं। कल्पित विधि ‘न हिंस्यात्’ से विरुद्ध होने के कारण बाधित हो जाती है। अतः हरिश्चन्द्र के आख्यान पर वैसी दुष्कल्पनाएँ नहीं हो सकती हैं। विधि का बोध लिङ् या लोट् लकार एवं तव्यादि प्रत्ययों से होता है। कहीं-कहीं अपूर्व द्रव्य देवता का ज्ञापक वाक्य होने से तो अन्यथा भी अर्थात् लट् लकार से भी विधिका बोध हो जाता है। हरिश्चन्द्र का सत्यनिष्ठावाला आदर्श सत्यविधि के अनुकूल होने से सत्य एवं अनुकरणीय भी है। वेद केवल निवृत्तिमार्गीय के ही लिए नहीं हैं। वे राजस, तामस और सात्त्विक सभी प्राणियों के लिए हितोपदेश करते हैं। वेदों में शत्रुमरण की कामना से श्येनयाग का भी विधान है। वेदों में जहाँ यज्ञ-पूत्ति के लिए हिंसा-विधि के द्वारा हिंसा विहित है वहाँ ‘न हिंस्यात्’ इस उत्सर्ग का बाध होता है। परन्तु जहाँ हिंसा की विधि नहीं हैं, किन्तु हिंसा विधेय न होकर हिंसा उद्देश्य है वहाँ ‘न हिंस्यात्’ यह उत्सर्ग वचन निषेध वचन ही प्रबल होता है। श्येनयाग में शत्रुमरण उद्देश्य है विधेय नहीं। अतः वहाँ ‘न हिंस्यात्’ इस निषेध का ही प्राबल्य होता है। फिर भी श्येनयाग की विधि प्राणी के हितार्थ ही है। हितशासन से ही वेद शास्त्र कहलाते हैं। अतः उनका तात्पर्य स्वाभाविक राग-द्वेषान्ध की प्रवृत्ति रोकने में ही है। काम, क्रोधादि जनित प्रवृत्ति को रोक देना सबसे बड़ा प्राणी का हित है। लौकिक मार्ग से शत्रुहिंसा में प्रवृत्ति अधिक अनिष्टजनक है, क्योंकि हो सकता है कि अस्त्र-शस्त्रादि द्वारा वध में प्रवृत्त प्राणी को शत्रु ही मार दे अथवा शत्रु का सहायक भी मार सकता है। कथञ्चित् सफलता मिलने पर भी राजा के द्वारा मृत्युदण्ड का भागी होना पड़े। अतः शास्त्र लौकिक मार्ग से हिंसाप्रवृत्ति को रोकने के लिए उसकी अपेक्षा निरापद श्येनयाग को शत्रुमरण का साधन बताकर प्राणी की प्रवृत्ति को रोक देता है। एक बार प्रवृत्ति रुक जाने पर काम, क्रोध का वेग रुक जाने से विचार को अवकाश मिल जाता है। अतः श्येनयाग की प्रवृत्ति भी रुक सकती है। यदि अधिक क्रोधादि रहा तो भी श्येनयागसम्पादन के लिए अन्य वैदिक विद्वानों को भी बुलाना पड़ेगा और उनके उपदेश से परिणाम में हानिकारक होने से भी श्येनयाग की प्रवृत्ति रुक सकती है। यदि उपदेश से न रुकी तो भी सामग्री-सम्पादन की कठिनाई से भी निवृत्ति हो सकती है। यदि उससे भी प्रवृत्ति न रुकी तो श्येनयाग के अनुष्ठान में बहुत से देवता और ब्राह्मणों की पूजा और दान आदि से कुछ पुण्य भी साथ में अनिवार्यरूप से हो जायेंगे। श्येनयाग में सफलता होने से वेदोक्त उपाय में दृढ़ विश्वास होने से उसके निवारणार्थ प्रायश्चित्त का

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९९ अनुष्ठान कर के अहिंसा, सत्यादि साधनों का अनुष्ठान कर के ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्राप्ति की भी संभावना हो जाती है। इस तरह शब्दशः विचार करने पर भी श्येनयागविधि का तात्पर्य भी हिंसानिषेध में ही होता है। इसी तरह पुत्र की कामनावाले प्राणी के लिए पुत्रेष्टि आदि का विधान होता है। अन्य भी काम्य कर्मों का तात्पर्य कामना-पूर्ति में न होकर पाशविक काम-कर्मनिवृत्ति में ही होता है। माता बच्चों को मोदक प्रदान का प्रलोभन देकर गुडूची-पान कराती है। बालक मोदक के लोभ से गुडूची-पान करता है। बालक गुडूची-पान का फल मोदकप्राप्ति समझता है। परन्तु माता तो गुडूची-पान का फल रोगनिवृत्ति ही मानती है। मोदकदान तो केवल प्रलोभनार्थ ही है। यदि प्रदान न करे तो बालक दूसरे दिन गुडूची-पान नहीं करेगा। इसी तरह वेद पाशविक काम-कर्म-रूप मृत्यु से छुड़ाकर ब्रह्मज्ञान की ओर लगने के लिए विविध काम्य कर्मों का विधान करते हैं। जैसे कण्टकेन कण्टकोद्धार होता है, वैसे ही वैदिक काम-कर्म के द्वारा लौकिक पाशविक काम-कर्म को मिटाया जा सकता है। वैदिक काम-कर्मों द्वारा राजस काम-कर्मों से निवृत्ति करायी जाती है। अन्त में निष्काम कर्म के द्वारा सब प्रकार के काम-कर्म-ज्ञान को मिटाया जाता है। बुद्धि-शुद्धि, नित्यानित्यविवेक, वैराग्य, शम, दमादि द्वारा पूर्ण ब्रह्मज्ञान एवं नैष्कर्म्यसम्पत्ति सम्पन्न होती है। जिसका वर्णन इस प्रकार है— "यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥" ( क० उ० २।६।१० ) जब कर्मेन्द्रियों के साथ पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ अवस्थित (निरुद्ध) हो जाती हैं और बुद्धि भी निर्विचेष्ट हो जाती है। उसी को परा गति कहा जाता है। उसी निर्विकल्प समाधि से ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार सम्पन्न होता है। श्रीभागवत में भगवान् उद्धव को यही बतलाते हैं कि जो प्राणी अज्ञ एवं अजितेन्द्रिय होने पर भी वेदोक्त कर्म नहीं करता वह अवश्य ही विकर्मरूप अधर्म से मृत्यु से पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होता है। "नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥" ( भाग० ११।३।४५ ) तस्मात् निःसंग होकर भगवत्समर्पणबुद्धि से वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ प्राणी नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है। स्वर्गादि फलश्रुति तो केवल रोचनार्थ ही है— "वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः॥" ( भाग० ११।३।४६ ) इसलिए गीता भी वेदों के अर्थवादों में रतों की निन्दा करके निष्काम कर्म की ही प्रशंसा करती है। व्यावहारिक दृष्टि से यदि हरिश्चन्द्र भी पहले अत्यन्त कामान्ध रहे हों और उन्होंने पुत्रप्राप्ति के लिए बलिदान की मनौती भी मानी हो और शुनःशेप को खरीदकर बलिदान देकर भी आत्मरक्षा का प्रयत्न किया भी हो तो भी अन्त में निष्काम उपासक तथा तत्त्वज्ञान-सम्पन्न होकर एवं महान् सत्यनिष्ठ होकर वे विश्वमान्य हो गये हैं। सभी जीव अनादि हैं। प्रथम अवस्था में किसने क्या नहीं किया ? "अन्ते या मतिः सा गतिः।" अन्त में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है। तपस्या में स्वधर्मानुष्ठान में उच्चपद प्राप्त कराने की सामर्थ्य होती ही है। तपस्या से वाल्मीकि क्या से क्या हो गये।

८०० रामायणमीमांसा एकविंश इसी प्रकार विश्वामित्र भी पूर्व में चाहे जैसे रहे हों । परन्तु उन्होंने तीव्र तपस्या द्वारा न केवल अपने को ही किन्तु अपने पिता, पितामह एवं प्रपितामह को भी ब्राह्मण बना दिया था। तभी तो स्वयं वसिष्ठ ने उनकी प्रशंसा की और राम ने उन्हें अपना गुरु माना और पादसंवाहन किया । “तपो हि दुरतिक्रमम् ।” तुलसी ने भी माना कि तप के बल से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, तप के बल से विष्णु पालन करते हैं एवं तपोबल से रुद्र संहार करते हैं । तप से ही शेष पृथ्वी का भार वहन करते हैं । परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि आज भी कोई थोड़ा सा तप कर के ब्राह्मण बन जाय । जो तपस्या से या योगशक्ति से क्षात्रदेहारम्भक परमाणुओं को विघटित कर के ब्रह्मदेहारम्भक परमाणुओं को संघटित करने की सामर्थ्य रखता है वही वैसा कर सकता है। जो चूहे को बिल्ली भी नहीं बना सकता है, वह किसी भी जाति को कैसे बदल सकता है ? विश्वामित्र ने तो मेनका को शाप से ही पहाड़ी बना दिया था । तो भी उस स्थिति तक भी वे ब्राह्मण नहीं बन सके थे । यद्यपि उनके देह का उपादान ब्राह्माचरु ही था। वे क्षात्र क्षेत्र के कारण ही क्षत्रिय थे । अतः उनका ब्राह्मण बनना बहुत कठिन नहीं था । तथापि महाभाष्य के अनुसार उनके पिता, पितामह और प्रपितामह तो सर्वथा क्षत्रिय होते हुए भी उन्हीं के ( विश्वामित्र के ही ) तप से ब्राह्मण हो सके थे । तुलसी भी कहते हैं कि— “बालमीकि नारद घटयोनी । निज निज मुखन कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२ ) ऐसी स्थिति में हरिश्चन्द्र या विश्वामित्र किसी की भी अन्तिम स्थिति का ही स्वरूप देखना चाहिये, पूर्वरूप देखने का कोई अर्थ नहीं । सर्वथापि वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, मानस सभी हमारे आदर्श ग्रन्थ हैं । निर्भ्रान्त होकर इनका प्रामाण्य मानना चाहिये । किसी का अप्रामाण्य नहीं है। किसका क्या अभिप्राय है, यही समझने का प्रयत्न करना उचित है । स्थालीपुलाकन्याय से इतना लिखा गया । इसी प्रकार अन्य भी बहुत सी विवादास्पद बातें पुस्तक में हैं। पर सबपर विचार करने तथा लिखने का अवकाश न होने से विराम लेते हैं । श्रीराम का प्रादुर्भाव मुख्यरूप से मर्त्यो को धर्म-शिक्षा देने के लिए हुआ है । यह श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” (भाग० ५।१९।५ ) परन्तु श्रीभगवान् ने भी धर्म के सम्बन्ध में शास्त्र को ही प्रमाण माना है । उसी के अनुसार चलकर उन्होंने लोगों को धर्म की शिक्षा दी थी । अतएव यह कहना सही नहीं है कि संसार के अन्य मार्गों का पता तो अन्य व्यक्तियों को होता हैं परन्तु प्रभु का मार्ग कौन जाने ? मत समेत जहँ जाय न बानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥” (रा० मा० १।३४०।४ ) इसका अर्थ यह है कि प्रभु का मार्ग स्वयं प्रभु को छोड़कर अन्य कोई नहीं जानता, किन्तु यह प्रभु के गीता-वचन से ही विरुद्ध है । गीता में भगवान् ने यह नहीं कहा कि जो मैं कहूँ वह धर्म है, किन्तु उन्होंने यही कहा कि शास्त्रविधि के अनुसार ही कर्त्तव्य को जानकर अनुष्ठान करना चाहिये । जो शास्त्रविधि का उल्लङ्घन करता है वह सुख, सिद्धि और शान्ति नहीं पाता । अतः शास्त्रविधानोक्त कर्म को जानकर ही उसका अनुष्ठान करना उचित है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०१ “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२३,२४ ) मन समेत जहाँ जाय न बानी” ( रा० मा० १।३४०।४ ) यह भी शास्त्र की ही बात है—‘‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।” इस श्रुति का अर्थ उक्त चौपाई में कहा गया है। सबसे बड़ी बात यह कि बुद्ध भी तो भगवान् ही थे। यदि राम और कृष्ण की बात मानी जाय तो उनकी वाणी क्यों न मानी जाय ? स्पष्ट है कि वेदविरुद्ध भगवान् की वाणी भी अमान्य ही है। यह गोस्वामी तुलसीदास को भी मान्य है— “तुलसी महिमा बेद की को करि सकइ बिचार। जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥” श्रीकृष्ण की गीता उपनिषद्रूप गायों का दुग्धरूप है, वेदसम्मत है। इसी लिए मान्य है। वाल्मीकि- रामायण वेद का उपबृंहणरूप है। श्रीराम वेदमार्ग के अनुयायी एवं रक्षक हैं। इसी लिए उनकी उक्तियाँ एवं उनके आचरण धर्म में परम प्रमाण हैं। धर्म और ब्रह्म दोनों ही वेदैकसमधिगम्य हैं। अन्य किसी प्रमाण से विदित नहीं होते— “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” ( जै० सू० १।१।२ ) “शास्त्रयोनित्वात्” ( ब्र० सू० १।१।३ ) “तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि” (बृ० उ० ३।९।२३) अतः वेद-शास्त्र ही धर्म और ब्रह्म का स्वरूप बतलाते हैं एवं उनकी प्राप्ति का मार्ग बतलाते हैं। भगवान् राम और भगवान् कृष्ण भी उन्हीं वेदों का गुणगान करते हैं, यह कभी भी नहीं भूलना चाहिये। राम ब्रह्म होते हुए भी शास्त्रानुसार ही सब क्रियाएँ करते हैं। इसी लिए धर्म भी उनका अनुसरण करता है। यही बात ‘आगे राम पीछे सीता लक्ष्मण हैं’ से स्पष्ट होती है। धर्म को मार्गदर्शक नहीं माना जाता। मार्गदर्शक शास्त्र और आचार्य होते हैं। भागवत के अनुसार राम धर्म के शिक्षक हैं। जब वह स्वयं शास्त्रानुसार चलते हैं तब सीतारूपिणी सत्क्रिया और लक्ष्मणरूपी धर्म उनके पीछे चलकर सम्पूर्ण संसार का कल्याण करते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले की प्रत्येक क्रिया ऐसी होती है, जिसका धर्म समर्थन करता है। परन्तु अन्तःकरण की शुद्धि भी तो धर्म पर ही निर्भर है। तभी तो श्रीराम ने रामगीता में अन्तःकरण की शुद्धि के लिए वेदोक्त कर्मों का करना आवश्यक बतलाया था—‘‘आदौ स्ववर्णाश्रम····।” अधर्म के कारण ही अशुद्ध अन्तःकरण में वासना और स्वार्थ अधिकार जमाते हैं। तभी वह अधर्म में प्रवृत्त होता है। उपनिषदों तथा गीता ने भी अन्तःकरण को पवित्र करने के लिए स्वधर्मानुष्ठान द्वारा परमेश्वर की आराधना को ही आवश्यक कहा है— “वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ।” ( बृ० उ० ४।४।२२ ) “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” ( गीता १८।४६ )

मूल प्रश्न है उन वासनाओं और स्वार्थों को मिटाकर हटाकर शास्त्रानुगामी बनना । यदि अन्तःकरण शुद्ध हो गया हो तब तो वह प्राणी उपासना और ज्ञान का अधिकारी हो जाता है । यह भी कहना गलत है कि जहाँ स्वार्थ और वासना का अभाव है वहाँ उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्म का पालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । उसके द्वारा धर्म की क्रिया छोड़कर अधर्म की क्रिया हो नहीं सकती । क्योंकि उस स्थिति में वेदादि शास्त्र सभी व्यर्थ ही हो जायेंगे । स्वार्थ और वासनाओं के रहने पर जब लाखों उपदेश करने पर भी वह अधर्म ही करेगा और स्वार्थ तथा वासनाओं के मिटने पर बिना शास्त्र देखे ही धर्म का अनुष्ठान अपने आप ही उससे होगा तब वेद शास्त्र की आवश्यकता ही क्या है ? फिर भगवान् के द्वारा — निज निज धर्मनिरत श्रुति नीति के उपदेश का क्या अर्थ है ? गोस्वामीजी के— “वर्णाश्रम निज निज धरम निरत बेदपथ लोग” ( रा० मा० ७।२० ) की चर्चा का क्या अर्थ है ? यह भी कहना अत्यन्त अशुद्ध है कि वसिष्ठ ने उत्तर दिया—तुम मुझ से पूछते हो यह धर्म है अथवा अधर्म ? अब अधर्म का निर्णय कैसे हो ? धर्म का निर्णय शास्त्रों द्वारा किया जाता है— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता० १६।२४ ) धर्मनिर्णायक शास्त्र हैं । पर शास्त्रों का अर्थ कौन लगाता है व्यक्ति की बुद्धि ? और तब समस्या जहाँ की तहाँ अटक जाती है । व्यक्ति की बुद्धि में स्वार्थ है । तो वह शास्त्र का अर्थ भी वैसा ही लगा देगा जिसके द्वारा उसके स्वार्थ की सिद्धि हो, क्योंकि वसिष्ठजी ने ऐसा न कभी कहा है न कह ही सकते हैं । क्योंकि यह सब मनगढन्त और शास्त्रविरुद्ध ही है । जब स्वार्थरहित एवं वासनारहित कोई है ही नहीं, शास्त्र का अर्थ किसी को लग ही नहीं सकता तो फिर श्रीराम आदि द्वारा शास्त्र की मान्यता का प्रचार सर्वथा व्यर्थ ही होगा । फिर तुलसी ने भी वेदादि शास्त्र समझा है कि नहीं ? उनके मानस में भी सब बातें शास्त्र-सम्मत हैं यह भी कैसे निर्णय होगा और मानस का अर्थ भी किसी को लगता है कि नहीं ? यह भी तो सन्देहास्पद ही रहेगा ? वस्तुतः वेदादि शास्त्रों के अर्थ आचार्य परम्परा से जाने जाते हैं । सहस्रों ऋषि-महर्षि स्वार्थ और वासनाओं से रहित होकर शास्त्रार्थ जानते हैं एवं उसका वर्णन करते हैं । वे भी अपने गुरुओं से शास्त्र एवं शास्त्रोक्त धर्म जानकर स्वार्थ और वासनाओं से रहित होते हैं । श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥” (रा० मा० ७।११६।३) इस चौपाई का भी अर्थ लेखक ने उल्टा ही समझा है । इसका तो इतना ही अर्थ है कि भगवदनुग्रह के बिना केवल श्रुति और पुराणों के बताये हुए उपायों के अनुष्ठान में भी अनेक बाधाएँ आ जाती हैं । उपनिषदों ने भी यह कहा है— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।” ( कठ उ० २।२२ ) गीता ने कहा— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥” ( गीता ११।५३ ) उक्त वचनों में भक्ति और अनुग्रह की प्रधानता कही गयी है, वेदादि साधनों की निरर्थकता नहीं, क्योंकि— “नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ।”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०३ अवेदवित् भगवान् को नहीं जानता इत्यादि श्रुतियों का विरोध स्पष्ट है । वहाँ भी वही— “रामनाम एक अङ्क है सब साधन हैं शून्य । अङ्क गये सब शून्य हैं अङ्क रहे दश गून ॥” का ही न्याय लागू होता है । तभी तो जिस भक्तिमणि से ग्रन्थि खुल सकती है उसकी प्राप्ति ही वेद और पुराण से ही कही गयी है— “पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ज्ञानविराग नयन उरगारी ॥ भावसहित जो खोजहिं प्रानी । पाव भक्ति मणि सब सुखखानी ॥” (रा०मा० ७।११९।७,८) जैसे राम शास्त्रानुयायी परमधर्मनिष्ठ हैं वैसे ही उनके परमभक्त भरत भी हैं । अतएव उनका समझना, कहना, करना सब धर्मसार होना उचित है । क्या किसी वेदविरोधी का कहना, समझना, करना भी धर्मसार हो सकता है ? इसी लिए तो— “सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।” (अभि० शा० अङ्क १।२१) वेदादि शास्त्रोक्त धर्मनिष्ठ सज्जनों की अन्तःकरणप्रवृत्तियाँ सन्देहछेदन में परम प्रमाण होती ही हैं । गुरु वसिष्ठ के निर्णीत धर्म पर कुचोद्य करना सबसे अधिक दुर्बुद्धि का लक्षण है । यह कहना पूर्णतः असत्य है कि “वसिष्ठ के प्रत्युत्तर में भरत ने जो प्रश्न उठाये थे वे यथार्थ स्थिति के दिग्दर्शक थे । उनकी जिज्ञासा वास्तविक अनुभूति पर स्थित थी । इसी लिए गुरु वसिष्ठ को भरत के वाक्यों का उत्तर दे पाना सम्भव नहीं हुआ । उन्होंने पूछा वस्तुतः धर्म क्या है ? क्या महाराज श्रीदशरथ ने राम को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की और यदि वह धर्म था तो उसका परिणाम प्रत्यक्ष था । धर्म का तात्पर्य यदि समाज का धारण है और संरक्षण है तो फिर यह कैसा धर्म ? जिसने स्वयं अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी । राम को वन जाना पड़ा । फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ? जब इसी धर्म का पालन करने के लिए मुझे कहा जाता है तो मैं यह जानना चाहूँगा कि इसमें किसका हित निहित है ? वस्तुतः भरत ने कुछ रूढ़िगत वाक्यों को ही वास्तविक धर्म मान लेने की ही धारणा के विरुद्ध मृदु वाक्यों में बड़ा तीक्ष्ण प्रहार किया है । वे रूढ़िवाक्य जिनकी आज्ञा पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है । अथवा पिता जिसे देता है वही राज्य का अधिकारी है । क्या वस्तुतः ये वाक्य निर्विवाद हैं ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ स्वयं पिता पितृत्व पर आरूढ़ है या नहीं और यदि उस समय वह स्वयं भी किसी आवेशजन्य भावना से ग्रस्त हो । उस समय उसकी आज्ञा का पालन करना स्वयं आज्ञा देनेवाले के हित में होगा या नहीं । दृष्टान्त के रूप में स्वामी ने सुरापान कर लिया हो नशे में उन्मत्त होकर सेवक को आज्ञा दे कि सामनेवाले व्यक्ति का सिर तोड़ दो । स्वामी की आज्ञा मानना सेवक का धर्म है, परन्तु ऐसी स्थिति में योग्य सेवक स्वामी की आज्ञा मानने के स्थान पर उस नशे को ही दूर करने की चेष्टा करेगा । ठीक इसी तरह काम, क्रोध, लोभ या ममता के द्वारा ग्रस्त व्यक्ति भी उन्मादी ही है । ऐसी स्थिति में पिता की आज्ञा के नाम पर यदि आज्ञा स्वीकार की जाती है तो वह धर्म का उपहास ही होगा ।” क्योंकि वस्तुतः यह सब कथन शास्त्रीय सिद्धान्तों युक्तियों तथा मानस से भी विरुद्ध ही है । यह महान् साहस ही नहीं किन्तु पाप भी है । महर्षि वसिष्ठ चक्रवर्ती दशरथ महाराज को परम धार्मिक एवं सत्य के रक्षक मानते हैं कि—

८०४ रामायणमीमांसा एकविंश “सोचयोग दशरथ नृप नाहीं। सोचिय बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धर्म बिषय लवलीना ॥ सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ॥ सोचिय बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि प्रिय भगति सुजानू ॥ सोचिय सूद्र बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ज्ञानगुमानी ॥ सोचिय पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥ सोचिय बटु निज ब्रत परिहरई । जो नहि गुरु आयसु अनुसरई ॥ सोचिय गृही जो मोह बस करइ करमपथ त्याग। सोचिय यती प्रपंचरत बिगत बिबेक बिराग ॥ बैखानस सोइ सोचन जोगू । तप बिहाइ जेहि भावहि भोगू ॥ सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुरु बंधु विरोधी ॥ सब विधि सोचिय पर अपकारी। निज तन पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सब ही बिधि सोई। जो न छाड़ि छल हरिजन होई ॥ सोचनीय नहिं कोसल राऊ। भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ ॥” ( रा० मा० २।१७०।२ से १७१।३ तक ) श्रीवसिष्ठजी की एक एक पंक्ति धर्मशास्त्र, सन्त और शिष्ट सम्मत है। “भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥ विधि हरिहर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुनगाथा ॥” (रा०मा० २।१७१।४) क्या ये बातें मिथ्या हैं ? आश्चर्य है अपने आप को एक मानसवक्ता होने का दावा करनेवाला इन तथ्यों को झुठलाने का साहस करता है— “कहहु तात केहि भाँति कोउ करइ बड़ाई तासु । राम लखन तुम्ह शत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥” ( रा० मा० २।१७२ ) उक्त बातें स्वतःसिद्ध जैसी हैं। जो राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म, तद्रूप ही लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जो हिरण्यर्भ, तुरीय अव्याकृत, तुरीय विराट् एवं तुरीय रूप हैं। वे सब जिनके पुत्र के रूप में प्रकट हैं उन दशरथ की तुलना में किसी शराबी या क्रोधी और कामी को उपस्थित करना कितना बड़ा पाप है। “सब प्रकार भूपति बड़भागी” । ( रा० मा० २।१७२।१ ) लेखक अपने ज्ञान गुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पिता का ही नहीं, राम के गुरु वसिष्ठ एवं राम के गुरु विश्वामित्र तथा श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछ,लेदर करता है । महर्षि वसिष्ठ धर्मसम्मत ही बात करते हैं। श्रीभरत को उपदेश करते हैं— “सिर धरि राजरजायसु करहू ।” ( रा० मा० २।१७२।१ ) राजा ने तुमको राज दिया है। उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य है। “तजे राम जेहि बचनहिं लागी । तन परिहरेउ राम बिरहागी ॥” ( रा० मा० २।१७२।२ )

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०५ श्रीदशरथ परम भक्त तो थे ही तभी तो राम के विरहाग्नि में उन्होंने प्राणों को त्याग दिया । इस दृष्टि से दशरथ के तुल्य दशरथ ही हैं। दूसरा कोई उदाहरण नहीं । श्रीराम के विरह में उन्होंने प्राणों को तृण के तुल्य छोड़ दिया। उनमें किसी प्रकार के काम, क्रोध, लोभ या ममता की कल्पना कर के सुरापायी का दृष्टान्त देकर उनकी आज्ञा को उपेक्ष्य कहना आस्तिकता है या नास्तिकता ? समझदार समझें । "नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना ।।" ( रा० मा० २।१७२।३ ) में दो मत हो ही नहीं सकते। श्रीराम तथा भरत किसी ने भी वसिष्ठ की उक्त बातों का विरोध नहीं किया । बल्कि सभी ने किसी न किसी रूप में उन्हें दुहराया ही है । वसिष्ठ ने श्रीभरत के लिए भी राज करने में दोष नहीं है यही कहा है । काम करना ही चाहिये । राजा न बनने में अमुक अमुक दोष हैं या पाप लगेगा यह वसिष्ठजी ने कभी भी नहीं कहा है, क्योंकि राज करना तो रागप्राप्त ही था । कैकेयी ने भरत के हितार्थ ही वैसा वरदान माँगा था। यदि राम के वनगमन का वरदान न माँगा जाता तो उसके देने में कोई कठिनाई नहीं थी। राम के वनवास न देने से ही वचनभङ्ग का दोष उपस्थित हो सकता था । भरत को राज दे देने पर भी यदि भरत राज स्वीकार नहीं करते तो इसमें श्रीदशरथ के वचनभङ्ग का प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । माता कैकेयी भी इस सम्बन्ध में चक्रवर्ती को दोषी नहीं ठहरा सकती थी । इसलिए वसिष्ठ ने अनेक दृष्टान्तों से यही कहा था कि यदि भरत राज करते हैं तो इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि पिता की आज्ञा से अनुचित काम करने पर भी परशुराम आदि को कोई दोष नहीं लगा था। यद्यपि बड़े भाई के रहते हुए छोटे भाई का राजा होना अनुचित है, फिर भी पिता की आज्ञा के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई दोष नहीं है । "करहु तात पितु वचन प्रमाना । करहु सीस धरि भूपरजाई । हुइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥ परसुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥ तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ॥ ( रा० मा० २।१७२।३,४ ) क्या महामति लेखक परशुराम और पुरु को पापी कहना चाहता है ? "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बयन । ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपुर अयन ॥" ( रा० मा० २।१७३ ) उक्त वचन भी निर्विवाद है । श्रीराम, भरत तथा जनक आदि कोई भी उस परम तथ्य का विरोध कैसे कर सकता है ? "सुरपुर नृप पावहिं परितोषू । तुम्ह कहँ सुकृत सुजस नहि दोषू । बेदबिदित सम्मत सब ही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥" (रा० मा० १७३।१,२) अगर इन बातों में किसी को कोई भी आपत्ति होती तो चित्रकूट में कोई भी इसके विरोध में आवाज उठा सकता था। यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है फिर भी राजा चाहे तो अन्य को भी राज्य दे सकता है । तभी तो यज्ञों में राजा सर्वस्वदान कर सकता है। शतपथश्रुति में भी राजा अध्वर्यु, होता, उद्गाता, ब्रह्मा आदि के लिए सम्पूर्ण राज्य के प्राची आदि दिशाओं का दान कर देता है। जब अध्वर्यु आदि राज्य स्वीकार नहीं करते तब उसके बदले में राजा उनको बहुतसा धन प्रदान करता है । श्रीभागवत

८०६ रामायणमीमांसा एकविंश के अनुसार श्रीराम ने भी अश्वमेधयज्ञ में ऐसा ही दान किया था। "भगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः । सर्वदेवमयं देवमीज आचार्यवान् मखैः ॥" (भाग० ९।११।१) भगवान् श्रीराम ने आचार्यवान् होकर उत्तम कल्पवाले यज्ञों से सर्वदेवमय आत्मा का ही यजन किया। "होत्रेऽदाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु उदीचीं सामगाय सः ॥ आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा । मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥" (भाग० ९।११।२,३) श्रीराम ने होता को प्राची दिशा प्रदान कर दी, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अध्वर्यु को प्रतीची तथा उद्गाता को उदीची दिशा प्रदान कर दी। मध्य की सब भूमि आचार्य को प्रदान कर दी। महारानी वैदेही ने भी मङ्गलसूत्र के अतिरिक्त सम्पूर्ण अलङ्कारादि प्रदान कर दिये थे— "तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमङ्गल्यावशेषिता।" (भाग० ९।११।४) अतः राजा चाहे तो छोटे पुत्र को भी राज्य दे ही सकता है। वसिष्ठ ने कहा कि यह सुनकर श्रीराम और वैदेही भी प्रसन्न होंगे और कोई भी इसे अनुचित नहीं कहेगां— सुनि सुख लहब राम वैदेही। अनुचित कहब न पंडित केही।" (रा० मा० २।१७३।३) कौशल्यादि माताएँ भी प्रसन्न होंगी। वे सभी प्रजा के सुख से सुखी होंगी। श्रीराम आपके हृदय को जानते हैं। वे सब तरह से तुम्हारी भलाई मानते हैं। जब राम आयेंगे तो उनका राज उन्हें सौंपकर सब प्रकार की सेवा करना। श्रीवसिष्ठ का उक्त कथन में कोई विशेष तर्क नहीं है, जिसको उनकी तर्कप्रणाली कहा जाय। तर्क या कुतर्क तो लेखक का ही है, जो शास्त्रविरुद्ध है, मनमानी है। वसिष्ठजी जिस सभा में बैठकर यह उपदेश कर रहे थे उसमें बड़े बड़े विद्वान् बैठे थे। धर्मज्ञ मन्त्रिमण्डल तथा कौशल्या आदि माताएँ उपस्थित थीं। मन्त्रियों ने भी वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन किया— "कीजिय गुरु आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आये उचित जस तब तस करिय बहोरि ॥" (रा० मा० २।१७४) श्रीकौशल्याजी ने भी कहा— "पूत पथ्य गुरु आयसु अहई ॥" (रा० २।१७४।१) श्रीभरतजी ने स्पष्ट कहा कि— "मोहि उपदेस दीन्ह गुरु नीका । प्रजा सचिव सम्मत सब ही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहिए कीन्हा ॥ गुरु पितु मातु स्वामी हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किये विचारू । धरम जाइ सिर पातक भारू ॥"

ये सब बचन निष्कपट भरत जैसे परम भक्त की उक्ति हैं। वह आज के लोगों जैसी कपटपूर्ण कोई पालसी नहीं कही जा सकती । भरत के वचन में सरलता है कोई कौटल्य नहीं है । वसिष्ठादि के वचनों में उन्हें कोई दोष नहीं दिखाता है । उनके वचनों से वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन मिलता है । परन्तु भरतजी यह जानते ही हैं कि गुरुदेव के वचन का स्पष्ट ही अभिप्राय यह नहीं है कि यदि मैं राज्य न करूंगा तो पापी बन जाऊँगा । हाँ, राज्य करूँगा तो दोष का भागी न बनूँगा । परन्तु जिसमें पुत्र को स्वतः राग हो वही पिता की आज्ञा भी हो तो उसके पालन में क्या कठिनाई है ? कठिनाई तो वहाँ होती है जहाँ पिताजी राज्यत्याग की आज्ञा देते हों । प्रकृत में सारी कठिनाई तो राम के सामने थी । उनका राज्य में स्वाभाविक अधिकार था । पिताजी भी उन्हें राज्य देना चाहते थे । पर माता कैकेयी ने पिताजी का कभी प्राण बचाया था। उन्होंने प्रसन्नता से उन्हें वरदान माँगने को कहा था। माता कैकेयी ने कहा कभी माँग लूंगी। उसके अनुसार उन्होंने राम को वनवास और मेरे लिए राज्य की मांग की। पिताजी ने सत्य-पालन की दृष्टि से उनकी माँग स्वीकार कर ली। मेरे लिए उन्होंने राज्य दे दिया । उनका वचन पूरा हो गया। मैं न लूं इससे उनकी सत्यनिष्ठा में, सत्य-पालन में कोई फरक नहीं पड़ता । वे राम को वनवास की आज्ञा न देते या मुझे राज्य न देते तो सत्य वचन में बाधा पड़ सकती थी । श्रीवसिष्ठजी पिताजी के द्वारा कैकेयी को दिये हुए वर प्रदान के अनुसार तथा श्रीराम और सीता के अभिप्राय के अनुसार, सचिवों, प्रजाओं तथा कौशल्या के अभिप्राय के अनुसार मुझसे राज्य करने के लिए कहते हैं । परन्तु श्रीभरतजी भगवान् राम के अनन्य निःस्पृह धर्मनिष्ठ भक्त थे। उन्होंने बड़ी नम्रता से कहा— "तुम्ह तो देहु सरल सिख सोई। जो आचरण मोर भल होई।।" (रा० मा० २।१७५।३) यद्यपि इस बात को मैं समझता हूँ तथापि मेरे हृदय को इससे सन्तोष नहीं होता । कृपा कर मेरी प्रार्थना सुन ली जाय तब मेरे योग्य उपदेश किया जाय । मैं उत्तर देता हूँ मेरे अपराध को क्षमा करें, क्योंकि साधु पुरुष दुःखित व्यक्ति के दोषों पर ध्यान नहीं देते— "यद्यपि यह समुझत हउँ नीके । तदपि होत परितोष न जी के ।। अब तुम्ह बिनय मोर सुन लेहू । मोहि अनुहरत सिखावन देहू ।। उत्तर देहुं छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू । (रा०मा० २।१७५।३,४) श्रीभरतजी लेखक के द्वारा उठाये हुए किसी तर्क की बात नहीं करते । वे तो अपनी निष्ठा और अभिरुचि को ही सरलता से कह देते हैं— “पितु सुरपुर सियराम बन करन कहहु मोहिराज । एहि ते जानहु मोर हित कै आपन बड़काज ।।" ( रा० मा० १।१७६ ) पिताजी देवलोक चले गये । श्रीसीता-राम वन चले गये । आप लोग मुझे राज्य करने को कहते हैं क्या यह मेरा हित है ? या इससे आप लोगों का कोई बड़ा काम बनेगा ? जिसको राज्य चाहिए, उसके लिए आप लोगों की बात ठीक ही है । मेरी अपनी दृष्टि में परमहित है सीतापति राम की सेवकाई । परन्तु माँ की कुटिलता के कारण मेरे उस हित का अपहरण हो गया। मैं अच्छी तरह देख रहा हूँ, मेरा हित अन्य प्रकार से नहीं है । "सोकसमाज राज केहि लेखे । लखन राम सिय बिन पद देखे ।। बादि बसन बिनु भूषनभारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ।।

८०८ रामायणमीमांसा एकविंश सरुज शरीर बादि बहु भोगा । बिन हरि भगति जायं जप जोगा ॥ जायं जीव बिन देह सुहाई । बादि मोर सब बिन रघुराई ॥”(रा०मा० २।१७६।२,३) सचमुच भरत के इन वचनों में उनके सरल निष्कपट हृदय का भाव व्यक्त हुआ है । उसमें किसी पर आक्षेप नहीं है और किसी पर कटाक्ष भी नहीं है। वे अन्त में यही कहते हैं कि— “जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आंक मोर हित एहू ॥” ( रा० मा० २।१७६।४ ) मेरी इच्छा, मेरी अभिरुचि यही है कि मैं राम के पास जाऊँ । उनकी शरण ग्रहण-ही मेरा सब कुछ है । यदि आप मुझे राजा बनाकर अपना और प्रजा का कल्याण चाहते हैं तो मैं यही कहूँगा कि आप स्नेहमयी विभोरता के कारण ही ऐसा कह रहे हैं— “मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥” (रा० मा० १।१७६।४) “कैकेयी सुअ कुटिलमति रामबिमुख गतलाज । तुम्ह चाहत सुख मोहबस मोहि से अधम के राज ॥” ( रा० मा० २।१७७ ) “कहउँ साँच सब सुनि पतिआहू । चाहिय धर्मशील नरनाहू ॥ मोहिं राज हठि देहहु जहहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥ मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनवासू ॥”(रा० मा० २।१७७।१,२) ये सब बातें यद्यपि वस्तुस्थिति के अनुगुण नहीं हैं तथापि लोकोत्तर रामभक्त भरत के मन में दीनता वश ऐसी ही प्रतीति हो रही है। यह दीनता भक्तों का असाधारण लक्षण है ही । “मो सम कौन कुटिल खल कामी” यह भी तो एक भक्त के मन की बात है । इस प्रकार अपनी दीनता को प्रकट करते हुए भरतजी कहते हैं—कोई मनुष्य भूतादि ग्रहों से गृहीत हो । उसपर भी बिच्छू ने डङ्क मार दिया हो । उसपर भी उसको वारुणी पिला देना क्या उपचार है ? “ग्रहगृहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार । तेहि पिलाइय बारुनी कहहु काह उपचार ॥” ( रा० मा० २।१७९ ) इस दारुण दशा में वे राज्य देने की बात को अपने लिए वारुणी-पान के तुल्य समझते हैं । भरतजी कहते हैं कि वास्तव में चतुर विरञ्चि ने मुझे कैकेयी के योग्य समझकर ही मुझे उसका पुत्र बनाया है । परन्तु इसके साथ मुझे श्रीदशरथ का पुत्र और श्रीराम का लघु भ्राता होने का गौरव प्रदान किया है, यह तो व्यर्थ ही है— “दशरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि विधि बादि बड़ाई ॥” ( रा० मा० २।१७९।१ ) उसपर भी आप लोग मुझे राजसिंहासन देना चाहते हैं । मैं कैसे किस-किस को क्या उत्तर दूँ । भला मुझे छोड़कर चराचर प्रपञ्च में कौन ऐसा है जिसे श्रीसीताराम प्राण के समान प्रिय नहीं हैं । “मो बिन को सचराचर माहीं । जेहि सिय राम प्राणप्रिय नाहीं ॥” ( रा० मा० २।१७९।३ ) श्रीकौशल्या अम्बा तो सरलचित्त हैं । मुझपर तो उनका सदा ही विशेष प्रेम है । वह मेरी दीनता देखकर स्वाभाविक स्नेह से मुझे राज्य करने को कहती हैं—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०९ “राममात सुठि सरलचित मोपर प्रेम बिशेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।” (रा० मा० २।१८०) श्रीगुरुजी महाराज तो विवेक के समुद्र हैं। सम्पूर्ण विश्व जिनके लिए करतलगत बदर (बैर) के समान हैं। पर वे भी मुझे राजतिलक देने की बात करते हैं। वास्तव में विधाता के विमुख होने से ही सब मुझसे विमुख हो गये हैं। भरत को लगता है, ये सब लोग मेरे मन में राज्य करने की लालसा जानकर ही ऐसा कहते होंगे। इनके मन में यह भी होगा कि भरत की भी राम के वनगमन और राज्य पाने की भीतरी सहमति जरूर होगी। परन्तु एक सीताराम को छोड़कर कौन मानेगा कि मेरा वैसा मत नहीं है— “गुरु बिबेकसागर जग जाना। जिनहिं विश्व करबदर समाना॥ मो कहूँ तिलक साज सज सोऊ। भये विधि विमुख विमुख सब कोऊ॥ परिहरि रामसीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥” (रा०मा० २।१८०।१,२) “आपनि दारुन दीनता कहहूँ सबहिं सिर नाय। देखे बिन रघुनाथपद जिय कै जरनि न जाय॥” (रा० मा० २।१८१) “आन उपाय मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिन बूझा॥ यद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारण सकल उपाधी!। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा विसेषी॥ सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक यद्यपि बामा॥” (रा०मा० २।१८१।१-३) आप सब लोग आज्ञा और आशीर्वाद दें जिससे मेरी विनय सुनकर राम पुनः राजधानी में आ जायँ। यद्यपि कैकेयी जैसी कुमाता से मेरा जन्म हुआ है और मैं अच्छी तरह सदोष हूँ तो भी अपना जानकर श्रीराम मुझे त्यागेंगे नहीं, ऐसा मुझे श्रीरघुवर पर दृढ़ भरोसा है। सरल, दुस्तर्करहित और आक्षेपरहित भरतजी के वचन सबको ही ऐसे प्रिय लगे जैसे रामसनेहसुधा से पगे हों— “भरतबचन सब कहँ प्रिय लागे। रामसनेहु सुधा जनु पागे॥” (रा० मा० २।१८२।१) माताएँ, सचिव तथा गुरुदेव और सभी पुरवासी नरनारी परम स्नेह में विकल हो उठे और सभी भरत की भूरि-भूरि सराहना करते हैं— “भरतहि कहहिं सराहि सराही। रामप्रेम मूरति तनु आही॥” तात भरत अस काहे न कहहू। प्रानसमान रामप्रिय अहहू॥ जो पाँवरु अपनीं जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातकुटिलाई॥ सो सठ कोटिक पुरुष समेता। बसहि कलप सत नरकनिकेता॥ (रा०मा० २।१८२।२-४) भरत, तुम तो साक्षात् राम के मूर्तिमान् प्रेम ही हो। कोई पामर प्राणी अपनी जड़ता से ही तुम्हारे प्रति कुटिलता की शङ्का कर सकता है। जो माता की कुटिलता तुममें आरोप करेगा वह तो अपनी कोटि पीढ़ियों के साथ सैकड़ों कल्प तक नरक में रहेगा। जैसे सर्प में रहती हुई भी मणि सर्प के अघ और अवगुण को नहीं ग्रहण करती। किन्तु वह गरल के दुःख और दरिद्रता की दाहक ही होती है। वैसे ही आप कैकेयी से उत्पन्न होने पर भी उसके कुटिलता आदि दोषों से मुक्त हैं। अज्ञान, भगवद्वैमुख्य आदि दोषों को दहन करनेवाले हैं। १०२

८१० रामायणमीमांसा एकविंश इस तरह संक्षिप्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि भरतजी के मन में वैसी कोई बात नहीं थी, जिसको लेखक ने उठाया है। श्रीभरत ऐसा प्रश्न कभी कर ही नहीं सकते थे— "धर्म क्या है ? क्या महाराज ने राघवेन्द्र को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की है.........यह कैसा धर्म जिसने अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी । राघवेन्द्र को वन जाना पड़ा, फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ।" भरतजी तो धर्म के परम फल साक्षात् भगवत्प्रेम के मूर्त रूप हैं। कोई सामान्य आस्तिक भी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता है। सभी आस्तिक जानते हैं कि- "न सुखाल्लभते सुखम्" सुख से सुख नहीं मिलता। धर्म के आचरण में कठिनाइयाँ होती हैं। श्रीराम ने ही कहा है कि— "सिबि दधीचि हरिचन्द नरेसू । सहेउ धर्महित कोटि कलेसू ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरम धरेउ सहि संकट नाना ॥" (रा०मा० २।९४।२) शिबि ने धर्म-रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काट काट कर कपोत के बराबर तराजू पर तौल तौल कर प्रदान किया था। हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिए क्या क्या दुःख नहीं भोगा । दधीचि ने तथा स्वयं श्रीराम ने, धर्मराज युधिष्ठिर ने एवं राजा नल ने धर्म-रक्षण के लिए कितने ही कष्ट झेले हैं। हर एक तपस्या से कृच्छ्र, चान्द्रायण, पराक आदि व्रतों में भी तो प्रथम कष्ट ही होता है। विशेषतया ब्राह्मण के लिए तो तपोमय जीवन ही आदरणीय होता है— "ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छ्राय तपसे चैव प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥" इसी लिए तो— "तपबल बिप्र सदा बरियारा ।" ( रा० मा० १।१६४।२ ) कहा गया है। "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ॥" ( गीता १८।३७ ) जो पहले विषतुल्य प्रतीत होता है और परिणाम में अमृतमय होता है। वही तो सात्त्विक सुख कहा जाता है। महाराज दशरथ की वसिष्ठ महर्षि जैसे महापुरुष प्रशंसा कर रहे हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि महाराज दशरथ के समान न कोई हुआ है, न है, न होनेवाला है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी महाराज दशरथ की महिमा गाते हैं— "बिधि हरि हर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दशरथ गुन गाथा ॥" (रा०मा० २।२४१।४) ये सब बातें वे वसिष्ठजी बोल रहे हैं जिनके लिए गोस्वामीजी कहते हैं— "बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।" ( रा० मा० २।१७१।४ ) तुलसी की दृष्टि से तो महाराज दशरथ धन्य धन्य हैं— "जियन मरन फल दशरथ पावा । अंड अनेक अमल जस छावा ॥ जियत राम बिधु बदन निहारा । रामबिरह करि मरन सँवारा ॥

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८११ भक्तिशास्त्र की दृष्टि से रामप्रेम में श्रीरामविरहाग्नि से प्राणप्रयाण स्वयं में परमपुरुषार्थ है और उनके द्वारा माँगे हुए अन्तिम वरदान के रूप में उन्हें मिला था। दशरथजी ने प्रभु से वरदान माँगा था— “सुतबिषयक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहिं अधीना॥ हे नाथ ! पुत्रवात्सल्यरूप अभङ्ग प्रीति मुझे प्राप्त हो भले कोई (पण्डितम्मन्य तथोक्त कथाकार) मुझे मूढ़ भी क्यों न कहें। जैसे मणिधर नाग का जीवन मणि बिना जीवित नहीं रहता, जल बिना मीन जीवित नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा जीवन आपके अधीन रहे। अर्थात् आपके मुखचन्द्र-दर्शन के बिना मेरा जीवन नहीं ही रहना चाहिए। धर्म रूढ़िगत वाक्यों से नहीं वेद-वाक्यों से सिद्ध होता है। गुरुदेव ने कहीं भी रूढ़िगत वाक्यों की दुहाई नहीं दी थी। "मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव" (तै० उ० १।११।२), "मातृमान् पितृमान् आचार्यवान्” (बृ० उ० ४।१।५) ये वेदवाक्य हैं। रूढ़िगत वाक्य नहीं। पिता जिसे देता है वही राज्य पाता है, यह भी रूढ़ि- वाक्य नहीं। शतपथादि वाक्यों से तथा श्रीभागवत के वाक्य से सिद्ध है, यह कहा जा चुका। यदि पिता किसी ब्राह्मण को होता और अध्वर्यु को राज्य दे देता है तो वह भी राज्य पा जाता है, फिर यदि छोटे पुत्र को राज्य दे दे तो वह क्यों नहीं पायेगा ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ पिता स्वयं पितृत्व में आरूढ़ है या नहीं ? यह कथन तो नास्तिकता और अव्य- वस्था फैलानेवाला है। इस तरह तो किसी भी धर्म का अनुष्ठान ही असंभव होगा। यदि पत्नी कहे कि पति ठीक हो तो हम पतिव्रता रहेंगी। पति कहे कि पत्नी ही पतिव्रता हो तो तब हम ठीक पति बनेंगे। पुत्र कहे पिता ही योग्य पिता हो तब हम ठीक पुत्र बनेंगे। पिता कहे कि पुत्र ठीक हो तब हम ठीक पिता बनेंगे तो क्या संसार का व्यवहार चल सकेगा ? धर्म-पालन शर्तों के साथ नहीं होता। विधायक वचन भी ऐसी कोई शर्त नहीं रखते हैं, प्रत्येक के लिए विधान है। जो विधान का पालन करेगा वही ईश्वर का अनुग्राह्य होगा। इस प्रकार के धर्म आपसी समझौते पर आधारित नहीं, किन्तु ईश्वरीय विधानों पर ही आधारित हैं। जो पिता अपना कर्तव्य नहीं पालन करेगा वह कर्म के अनुसार फल पायेगा। जो पुत्र अपना कर्तव्य पालन करेगा वह अपने कर्तव्य का फल पायेगा। इतना ही नहीं यह भी संभव होता है कि पुत्र अपना कर्तव्य पालन करके पिता का ही नहीं अनेक पीढ़ियों का भी कल्याण कर लेता है। साध्वी पतिव्रता पत्नी पातिव्रत धर्म के पालन से अपने दुराचारी पति का भी कल्याण करती है। प्रकृत में तो ऐसा कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। महाराज दशरथ के लिए शराबी स्वामी का दृष्टान्त नहीं दिया जा सकता। उन्हें आवेशजन्य भावनाग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। उन्हें काम, क्रोध या ममता से ग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में उनकी आज्ञा को स्वीकार करने में धर्म का उपहास ही होगा, यह कैसे कहा जा सकता है ? यद्यपि सामान्यतया धर्म-पालन में विवेक की आवश्यकता होती है। जिससे आज्ञा देनेवाले और आज्ञा- पालन करनेवाले दोनों ही के लिए भी खतरा उपस्थित हो सकता हो वहाँ आज्ञा देनेवाले को स्वस्थ सावधान करना भी आवश्यक हो सकता है तथापि कई अवस्थाओं में आज्ञापालन का ही महत्त्व उत्कृष्ट होता है जैसा कि पीछे कहा गया है—

८१२ रामायणमीमांसा एकविंश "परसुराम पितु आज्ञा राखी। मारी मात लोक सब साखी ।। तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ।।" (रा० मा० २।१७२।४) ऊँची धर्मनिष्ठा में आज्ञा सर्वोपरि धर्म है। क्या इन दोनों पङ्क्तियों का कोई भी आस्तिक खण्डन कर सकता है ? तभी तो वसिष्ठ ने कहा कि- "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पित बयन । ते भाजन सुख सुजसु के बसहिं अमरपति अयन ।।" (रा० मा० २।१७३ ) श्रीभरतजी का उनके वचनों पर शङ्का करना तो दूर उन्होंने तो और भी बढ़कर कहा कि- “गुरु पित मात स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानी ।। उचित कि अनुचित किये विचारू । जाई धर्म सिर पातक भारू ।।" (रा०मा० १।१७५।२) परन्तु महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता। कहीं भी और मानस में भी किसी ने भी अनुचित नहीं कहा। लखनलाल ने जो कुछ कहा था; उसे श्रीराम ने उनका लड़कपन या भावावेश मानकर सुमन्त्र से उसे न कहने का ही आग्रह किया था । श्रीभरद्वाज भी वही कहते हैं जो श्रीवसिष्ठ ने कहा था कि- "लोक वेद सम्मत सब कहई । जेहि पित देइ राज सो लहई ।।" (रा० मा० २।२०५।४) वसिष्ठ की तरह ही वह भी कहते हैं कि- करतेहु राज त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) महाराज दशरथ में भरद्वाज भी कोई दोष नहीं देखते हैं । वे दशरथ की प्रशंसा करते हैं- “दशरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिक कहा जेहिं सम जग नाहीं ।।" (रा०मा० २।२०७।४) “जासु सनेह सकोच बस राम प्रकट भये आइ । जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नाहिं अघाइ ।।" ( रा० मा० २।२०८ ) भरद्वाज का स्पष्ट ही कहना है कि लोक वेद सबकी यही सम्मति है कि पिता जिसको राज्य देता है वही पाता है। ययाति ने ही ज्येष्ठ पुत्र यदु को राज्य नहीं दिया, किन्तु छोटे पुत्र पूरु को ही राज्य दिया। दायभाग के अनुसार उपरमस्वत्ववाद चलता है, जिसमें पिता के मरने पर ही पुत्र को अधिकार मिलता है। मिताक्षरा के अनुसार जन्मना स्वत्ववाद मान्य होता है। जिसके अनुसार जन्म से किं वा गर्भ में ही पुत्र को अपनी बपौती सम्पत्ति का अधिकार होता है । उसके अनुसार पिता पुत्र की सम्मति के बिना मौसी सम्पत्ति का दान, विक्रय, वितरण कुछ भी नहीं कर सकता है। परन्तु यह नियम सामान्य जनों के लिए ही है। राजाओं के नियम उनसे पृथक् होते हैं। इसी लिए सामान्य सम्पत्तियों के समान राज्य का बँटवारा नहीं होता है। सामान्यतया ज्येष्ठ का ही राज्य में अधिकार होता है। वह अपना राज्य किसी को भी दान कर सकता है किसी भी पुत्र को दे सकता है। सामान्य नियम के अनुसार दशरथजी पहले श्रीराम को ही राज्य देना चाहते थे। परन्तु पूर्वदत्त वरदान के अनुसार सत्य वचन से बद्ध होने के कारण उन्हें अपना मन बदलना पड़ा। अपनी स्वाभाविक इच्छा को रोककर शास्त्र और सत्य के अनुसार उन्होंने कैकेयी की इच्छापूर्ति की।

जैसे भरत के प्रति किसी प्रकार के कौटिल्य की कल्पना पाप का परिणाम है, वैसे ही महाराज दशरथ के दिव्य गुणों में कालिमा की कल्पना अपने हृदय की ही कालिमा को प्रकट करना है। श्रीतुलसी तो वन्दना में ही कहते हैं कि— “बन्दहुँ अवध भुवाल सत्यप्रेम जेहि रामपर। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तन तृण इव परिहरेउ ॥” (रा० मा० १।१६) हाँ, तो श्रीदशरथजी के वचन को शराबी के वचन से उपमा देना या उस भङ्गड़ की उपमा देना जो कहता है कि हमें स्मशान ले चलो या उन्हें काम, क्रोध, लोभ या ममता के आवेश का उन्मादी कहना वसिष्ठ, भरद्वाज, राम, भरत और तुलसी सबका ही अपमान करना है। महाराज दशरथ का कैकेयी से प्रेम था। परन्तु वह अनुचित नहीं है। अपनी विवाहिता पत्नी में प्रेम कथमपि अनुचित नहीं कहा जा सकता। जिस क्षण उन्होंने कैकेयी का श्रीराम के विरुद्ध भाव देखा एकदम कैकेयी से उदासीन हो गये। कामी व्यक्ति तो राज्य, धन, पुत्र सबको ही त्यागकर कामिनी पर ही मुग्ध रहता है। परन्तु महाराज ने कैकेयी को समझाकर देख लिया कि यह असाध्य व्याधि है। तब महाराज ने यही कहा कि— “चहत न भरत भूपतहि भोरे। बिधिबस कुमति बसी उर तोरे ॥ सो सब मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहि बिधि बामू ॥ सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुनधाम राम प्रभुताई ॥ करिहहि भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँपुर राम बड़ाई ॥ तोर कलंक मोर पछिताऊ। मुयेहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुँह गोई ॥ फिर पछितैहसि अन्त अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी ॥” (रा० मा० २।३५।१-४) यह कहना ही अनभिज्ञता ही है कि “पहले दशरथ ने कहा था कि ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है। परन्तु अब जब आज भरत से राज्य लेने के लिए कहा जाता है तब धर्म परिवर्तित रूप से उसके पक्ष में समर्थन दे देता है।” क्योंकि लेखक उत्सर्ग और अपवाद के सिद्धान्त से अपरिचित ही प्रतीत होता है। सामान्य नियम सर्वत्र प्रसिद्ध है। हरि इ इस स्थिति में सामान्य शास्त्र “इको यणचि” (पा० सू० ६।१।७७) के अनुसार यण् प्राप्त होता है। परन्तु उससे प्रबल “अकः सवर्णे दीर्घः” (पा० सू० ६।१।१०१) के अनुसार यण् न होकर दीर्घ ही होता है। सामान्यतया सदा सन्ध्या करने का विधान है। परन्तु सूतक-पातक में उसका संकोच भी होता है। उसी तरह सामान्यतया ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देना उचित ही था। वही वसिष्ठसम्मति के अनुसार महाराज करने जा रहे थे। परन्तु अब जब पूर्वदत्तवरा भरतमाता महारानी कैकेयी ने नयी परिस्थिति पैदा कर दी तो अब विशेष स्थिति में पूर्वधर्म की अपेक्षा प्रबल धर्म यही है कि भरत को राज्य दिया जाय। पूर्वोक्त वैदिक वचनों और श्रीभागवत के अनुसार जब राजा यज्ञों में अपना राज्य ब्राह्मणों में प्रदान कर सकता है और श्रीराम ने भी वैसा ही किया था। तब राजा को सुतरां कनिष्ठ पुत्र को राज्य देने का अधिकार तो है ही तो भी यहाँ किसी राग और द्वेष के वशीभूत होकर नहीं, किन्तु सत्य की रक्षा के लिए कैकेयी की माँग को पूर्ण करना ही इस समय का सबसे बड़ा धर्म है। महाराज ने यह सब अपनी इच्छा के विरुद्ध शुद्ध धर्म-पालन के लिए ही अपने प्रिय प्राणों का बलिदान कर के भी किया था। तभी वसिष्ठ और भरद्वाज दोनों ही उस समय के प्रख्यात महर्षियों ने उसका समर्थन किया।

“विदित वेदसम्मत सब ही का। जेहि पित देई सो पावइ टीका॥” (वसिष्ठ) “लोक वेद सम्मत सब कहई। जेहि पित देइ राज सो लहई॥” (भरद्वाज) अतः इन महर्षियों के वचनों के सामने किसी के दुस्तर्क का कोई महत्त्व ही नहीं है। यह भी कहना गलत है कि “यद्यपि गुरु वसिष्ठ यह जानते हैं कि लोभग्रस्त कैकेयी ने महाराज श्रीदशरथ से दबाव डालकर ही राम के वनगमन की आज्ञा प्राप्त की है। फिर भी उसे आज्ञा-पालन का धर्म कहकर श्रीभरत से उसे मान लेने की आज्ञा दी जा रही है। यदि धर्म स्वार्थसमर्थन में ही प्रयुक्त किया जाने लगे तब उसके द्वारा लोकसंरक्षण का प्रश्न ही कहाँ उठता है।” क्योंकि भले ही माँ कैकेयी लोभग्रस्त रही होंगी। परन्तु महाराज तो लोभग्रस्त नहीं थे। यदि कैकेयी को पूर्व में वरदान न दिया होता तो क्या महाराज किसी तरह कैकेयी के दबाव से प्रभावित होते ? पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि महाराज सत्य के रक्षार्थ ही यह निर्णय लेने के लिए बाध्य हुए थे। उनके मन पर किसी भी काम, क्रोध, लोभ तथा ममता का प्रभाव या आवेश नहीं था। महाराज के लिए तथा महर्षि वसिष्ठ के लिए स्वार्थ का तो कोई प्रसङ्ग ही नहीं था। अतः शुद्ध धर्म की दृष्टि से ही महाराज ने राम को वनगमन और भरत को राज्य देने का निर्णय लिया था। “श्रीराम गुरु वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र की परम्परावाले तर्क को वस्तु धर्म के रूप में मन से नहीं स्वीकार कर पाये। इसी लिए उन्होंने उसके औचित्य पर सन्देह प्रकट करते हुए सोचा था— “जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपवीत विवाहा। संग संग सब भये उछाहा॥ विमल वंश यह अनुचित एकू। बन्धु विहाइ बड़ेहि अभिषेकु॥” (रा० मा० २।९।३,४) यह कहना भी अनभिज्ञता ही है, क्योंकि राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं हैं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करते हों। आश्चर्य है कि मानस के ही पण्डित मानस की ही बात नहीं समझ पाते हैं। यद्यपि वसिष्ठ ने ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई चर्चा नहीं की थी। “श्रवन समीप भये सित केसा। मनहुँ चौथपन अस उपदेसा॥ नृप जुवराम राम कहँ देहू। जावन जन्म लाहु किन लेहू॥” (रा० मा० २।१।४) इस तरह वृद्धावस्था देखकर उससे ही महाराज दशरथ के मन में श्रीराम के यौवराज्य का विचार उठा था। “यह बिचार उर आनि नृप उचित सुअवसर पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरुहिं सुनायउ जाइ॥” (रा० मा० २।२) गुरुदेव ने उसी का अनुमोदन किया था। महाराज ने फिर मन्त्रियों एवं पुरजनों की सम्मति लेकर मुनि को राम के भवन में विधि-विधान सिखाने के लिए भेजा— “तब नरनाहु वसिष्ठ बुलाये। रामधाम सिख देन पठाये॥” (रा० मा० २।८।१) वहाँ भी वसिष्ठ ने अपनी तरफ से ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई बात नहीं कही थी। किन्तु यही कहा था कि राजा ने आपके यौवराज्याभिषेक का आयोजन किया है। तदर्थ आपको आवश्यक संयम-नियम का पालन करना चाहिये— “भूप सजेउ अभिषेकसमाजू। चाहत देन तुमहिं युवराजू॥” (रा० मा० २।९।१)