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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 891

“विदित वेदसम्मत सब ही का। जेहि पित देई सो पावइ टीका॥” (वसिष्ठ) “लोक वेद सम्मत सब कहई। जेहि पित देइ राज सो लहई॥” (भरद्वाज) अतः इन महर्षियों के वचनों के सामने किसी के दुस्तर्क का कोई महत्त्व ही नहीं है। यह भी कहना गलत है कि “यद्यपि गुरु वसिष्ठ यह जानते हैं कि लोभग्रस्त कैकेयी ने महाराज श्रीदशरथ से दबाव डालकर ही राम के वनगमन की आज्ञा प्राप्त की है। फिर भी उसे आज्ञा-पालन का धर्म कहकर श्रीभरत से उसे मान लेने की आज्ञा दी जा रही है। यदि धर्म स्वार्थसमर्थन में ही प्रयुक्त किया जाने लगे तब उसके द्वारा लोकसंरक्षण का प्रश्न ही कहाँ उठता है।” क्योंकि भले ही माँ कैकेयी लोभग्रस्त रही होंगी। परन्तु महाराज तो लोभग्रस्त नहीं थे। यदि कैकेयी को पूर्व में वरदान न दिया होता तो क्या महाराज किसी तरह कैकेयी के दबाव से प्रभावित होते ? पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि महाराज सत्य के रक्षार्थ ही यह निर्णय लेने के लिए बाध्य हुए थे। उनके मन पर किसी भी काम, क्रोध, लोभ तथा ममता का प्रभाव या आवेश नहीं था। महाराज के लिए तथा महर्षि वसिष्ठ के लिए स्वार्थ का तो कोई प्रसङ्ग ही नहीं था। अतः शुद्ध धर्म की दृष्टि से ही महाराज ने राम को वनगमन और भरत को राज्य देने का निर्णय लिया था। “श्रीराम गुरु वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र की परम्परावाले तर्क को वस्तु धर्म के रूप में मन से नहीं स्वीकार कर पाये। इसी लिए उन्होंने उसके औचित्य पर सन्देह प्रकट करते हुए सोचा था— “जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपवीत विवाहा। संग संग सब भये उछाहा॥ विमल वंश यह अनुचित एकू। बन्धु विहाइ बड़ेहि अभिषेकु॥” (रा० मा० २।९।३,४) यह कहना भी अनभिज्ञता ही है, क्योंकि राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं हैं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करते हों। आश्चर्य है कि मानस के ही पण्डित मानस की ही बात नहीं समझ पाते हैं। यद्यपि वसिष्ठ ने ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई चर्चा नहीं की थी। “श्रवन समीप भये सित केसा। मनहुँ चौथपन अस उपदेसा॥ नृप जुवराम राम कहँ देहू। जावन जन्म लाहु किन लेहू॥” (रा० मा० २।१।४) इस तरह वृद्धावस्था देखकर उससे ही महाराज दशरथ के मन में श्रीराम के यौवराज्य का विचार उठा था। “यह बिचार उर आनि नृप उचित सुअवसर पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरुहिं सुनायउ जाइ॥” (रा० मा० २।२) गुरुदेव ने उसी का अनुमोदन किया था। महाराज ने फिर मन्त्रियों एवं पुरजनों की सम्मति लेकर मुनि को राम के भवन में विधि-विधान सिखाने के लिए भेजा— “तब नरनाहु वसिष्ठ बुलाये। रामधाम सिख देन पठाये॥” (रा० मा० २।८।१) वहाँ भी वसिष्ठ ने अपनी तरफ से ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई बात नहीं कही थी। किन्तु यही कहा था कि राजा ने आपके यौवराज्याभिषेक का आयोजन किया है। तदर्थ आपको आवश्यक संयम-नियम का पालन करना चाहिये— “भूप सजेउ अभिषेकसमाजू। चाहत देन तुमहिं युवराजू॥” (रा० मा० २।९।१)