भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 892

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८१५ श्रीराम स्वयं भी यह नहीं कहते हैं कि गुरुदेव ने या पिताश्री ने यह अनुचित किया है अपितु वे कहते हैं कि हम सब भाइयों का जन्म, भोजन, शयन, खेल, उपवीत संस्कार, विवाह आदि सब साथ साथ हुआ अब अभिषेक केवल मेरा ही हो यह एक बात इस विमलवंश सूर्यवंश की अच्छी नहीं लगती। परन्तु तुलसी और उनके राम तो मर्यादापालक हैं। उस मर्यादा में तो वंशपरम्परा की बातों का परम आदर होता है। मनु ने भी श्रुति और स्मृति के साथ सदाचार को भी धर्म में प्रमाण माना है— “वेदः स्मृतिः सदाचारः ।” (मनु० २।१२) भगवान् भी गीता में— “उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ।” (गीता १।४३) जातिधर्म और कुलधर्म की रक्षा को आवश्यक मानते हैं। फिर सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को राम अनुचित कैसे कह सकते हैं ? इसी बात का समाधान करते हुए गोस्वामीजी भी कहते हैं— 'प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगतमन की कुटिलाई ।। (रा० मा० २।९।३) अर्थात् यह प्रभु का पछताना स्वाभाविक प्रेम की परिणतिमात्र है। इससे यह सप्रेम पछताना भक्तों के मन की कुटिलता का ही हरण करता है। विमल वंश की असूया में उसका तात्पर्य नहीं है। उक्त बात केवल सूर्यवंश में ही नहीं, किन्तु चन्द्रवंश में भी है और यौक्तिक भी है। राज्य के बँटवारे से व्यवस्था नहीं चल सकती। बारी-बारी सभी भाई राजा हों यह भी बात नहीं चल सकती। हाँ, मन्त्री आदि के रूप में तो भाइयों का सम्मान होता ही है। किसी क्षेत्र में अन्य भाई भी राजा हो सकते ही हैं। जैसा कि श्रीराम ने शत्रुघ्न को मथुरा का शासक बनवाया था और भरत तथा लक्ष्मण के पुत्रों को भी विभिन्न क्षेत्रों में राजा बनाया था। मनु के अनुसार सम्पूर्ण पित्र्य धन को ज्येष्ठ पुत्र ही ग्रहण करता है। शेष सभी भाइयों को पिता के समान ही ज्येष्ठ बन्धु का ही अनुवर्तन करना चाहिये। मन्थरा ने भी कहा था कि राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। यदि सभी राजा हों तो महान् अन्याय एवं अव्यवस्था होगी। अतः राजा लोग शासन-व्यवस्था ज्येष्ठ पुत्र में ही स्थापित करते हैं। हाँ, कभी ज्येष्ठ के अयोग्य होने से गुणवान् कनिष्ठ पुत्रों के अधीन भी राज्यव्यवस्था स्थापित हो सकती है। फिर भी राज्य के अनेक शासक नहीं हो सकते; वैसा होने पर अव्यवस्था से महान् अन्याय हो सकता है— “नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि । स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत् ॥ तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः । स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि ।।” (वा० रा० २।८।२३, २४) इस प्रकार मनु और वाल्मीकिरामायण के अनुसार स्वाभाविकरूप से ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है। परन्तु विशेष अवस्था में गुणवान् कनिष्ठ राजपुत्र भी राज्य का अधिकारी हो सकता है। परन्तु राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। इस तरह शास्त्रसम्मत सिद्धान्त का अपलाप मिथ्या दुस्तर्कों से नहीं हो सकता। श्रीभरत ने किसी भी धर्म-व्याख्या के प्रति अपनी असहमति प्रकट नहीं की। पहले हम कह चुके हैं कि महाराज दशरथ अथवा श्रीवसिष्ठ किसी ने भरत को आज्ञा के रूप में राजा होने को कहा ही नहीं। किन्तु कैकेयी के लिए जो दो वर प्रदान किये थे। उसी दृष्टि से वसिष्ठ ने भरत को राजा होने को कहा था। भरद्वाज ने भी