भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 893

८१६ रामायणमीमांसा एकविंश उसी दृष्टि से कहा था कि यदि तुम राज्य करते तो भी कोई दोष नहीं था। वैसा सुनकर राम को सन्तोष ही होता। परन्तु अब तुमने और अच्छा किया जो श्रीराम को ही राजा बने रहने के लिए तुम राम से आग्रह करने जा रहे हो— करतेहुँ राज तुम्हहि नहिं दोषू। रामहि सुनतः होत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) “अब अति कीन्हेउ भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु । सकल सुमंगल मूल जग रघुपतिचरन सनेहु ॥” (रा० मा० २।२०६) श्रीवसिष्ठजी ने भी महाराज का वरदान और कैकेयी की इच्छा के अनुसार कौशल्या आदि माताओं तथा प्रजा के शान्ति और सन्तोषार्थ भरत के राज करने को लोकवेद-सम्मत कहा था। उनका राज करना अनुचित नहीं है— “सुनि सुख लहब राम बैदेही । अनुचित कहब न पंडित केही ॥” (रा० मा० २।१७३।३) राज्य करना सर्वसाधारण के लिए रागतः प्राप्त होता है। उसकी विधि अपेक्षित नहीं होती है। क्योंकि विधि तो अत्यन्त अप्राप्त की होती है, “विधिरत्यन्तमप्राप्तौ”—अतः प्राप्त राज्य त्याग देने में भी कोई दोष होने की संभावना नहीं होती है। अतः भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की संभावना भी नहीं । आज्ञा और विधियों में रागतः अप्राप्त कर्मों का ही विधान होता है। राज्य त्यागकर वन जाने की आज्ञा ही मुख्य आज्ञा है, क्योंकि वह रागतः प्राप्त नहीं है। उसी का गुणगान किया जाता है। भरतजी राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व नहीं था। महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है। “श्रीभरत धर्म को नया अर्थ प्रदान करते हैं। उनका सिद्धान्त यह है कि यदि राज्य के वास्तविक स्वामी महाराज दशरथ हों तो उन्हें ऐसा अधिकार हो सकता था। पर यह राज्य उन्हें क्रमशः उत्तराधिकार में मिला था। अतः राज्य के मूल स्वामी का अन्वेषण किया जाना चाहिये और अन्त में यह निष्कर्ष निकलेगा कि संसार में सम्पत्ति और राज्य के एकमात्र स्वामी भगवान् राम ही हैं— “संपति सब रघुपति कै आही ।” (रा० मा० २।१८४।२ ) इस तरह की मान्यता से धर्म भक्तिपरक हो जाता है। धर्म और अधिकार जब तक व्यक्तिपरक होंगे तब तक स्वार्थ और संघर्ष की भावनाएँ बनी रहेंगी। व्यक्ति कितना भी भला क्यों न हो भय, प्रलोभन और वासना की वृत्तियाँ उसमें परिवर्तन ला ही सकती हैं। अतः धर्म का केन्द्र अधिकार के स्थान पर सेवा और व्यक्ति के स्थान पर प्रभु को ही होना चाहिये ।” किन्तु उक्त कथन सर्वथा लोक, वेद तथा तर्क के विरुद्ध है। धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं होता। धर्म में तर्क का भी कोई आदर नहीं होता। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज कोई भी धर्म के निर्माता नहीं हो सकते। धर्म किसी का सिद्धान्त नहीं है। जब श्रीराम धर्म की व्यवस्था नहीं बना सकते तो भरत तो वैसा साहस कभी कर ही नहीं सकते। व्यक्ति में भ्रम, प्रमाद, करणापाटव तथा विप्रलिप्सा हो सकती है। अतः किसी भी जीव या ईश्वर द्वारा निर्मित ग्रन्थ धर्म में प्रमाण नहीं है। ईश्वर में भी छलछद्म सम्भव होता है। मोहिनीरूपधारी भगवान् ने भी छल किया था। श्रीविष्णु ने भी छल किया था— “छल करि टारेउ तासु व्रत प्रभु सुरकाज कीन्ह ।”