भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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भले ही वह छल संसार के हित में ही हो, परन्तु है तो छल ही । इसी दृष्टि से किसी ऋषि, आप्त या ईश्वर का वही वचन धर्म में प्रमाण है जो वेदसंमत एवं वेद के अविरुद्ध हो। इसलिए वेद को भगवान् का निःश्वासरूप माना जाता है—"अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यद्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम् ।” श्वास अकृत्रिम पुरुषबुद्धि-प्रयत्नानपेक्ष होते हैं । अतः वेद के निर्माण में जीव की कौन कहे ईश्वर की भी बुद्धि और प्रयत्न नहीं खर्च होता । इसलिए वेद अपौरुषेय अपास्तसमस्तपुंदोष होने से निर्विवाद प्रमाण होते हैं । इसी लिए भगवान् राम, कृष्ण, शिव, व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि, तुलसी सभी वेदों की ही दुहाई पद पद पर देते हैं । अतः धर्म को नया रूप या नया अर्थ कोई भी नहीं प्रदान कर सकता है । यह तुलसी को कदापि मान्य नहीं है । उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए ही होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही स्वत्व होता है । अतः परम्पराप्राप्त राज्य का भी दान किया ही जा सकता है । भगवान् की गीता भी धर्म में शास्त्र को ही प्रमाण मानती है—"तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते” राज्य ही क्या सम्पूर्ण प्रपञ्च का मूल स्वामी परमेश्वर है । यह भरत का कोई नया मत नहीं है । “सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः” इत्यादि श्रुतियों से ही सिद्ध है । परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि कोई अपनी वस्तु का दान, व्यय, वितरण नहीं कर सकता, क्योंकि जैसे भूमिका मूल स्वामी राजा के होने पर भी अवान्तर स्वामी जमीन्दार, जागीरदार और काश्तकार भी होते ही हैं । वे भी अपनी भूमिसम्पत्ति का दान, वितरण या विक्रय कर ही सकते हैं । इसी तरह समस्त विश्व का मूल स्वामी परमेश्वर के होने पर भी भिन्न-भिन्न राजा भी अपनी अपनी सम्पत्तियों के मालिक होते ही हैं । तभी पृथिवी के दान, विक्रय आदि की व्यवस्था होती है । यदि यह स्थिति न मानी जायगी तब तो भू-दान का शास्त्रोक्त विधान ही बाधित हो जायगा । अतएव यदि सम्पत्ति किसी की हो ही नहीं सब ईश्वर की ही है । तब फिर सर्वस्वदान, भूमिदान, स्वर्ण- दान, रत्नदान, अन्नदान आदि की व्यवस्था कैसे बनेगी ? यदि सब संपत्ति ईश्वर की है किसी व्यक्ति की नहीं हो तब तो चोर को दण्ड भी क्यों हो, क्योंकि सभी संपत्ति ईश्वर की है तो चोर ने ईश्वर की संपत्ति ली है फिर उसे ही दण्ड क्यों ? ईश्वर की संपत्ति रखने पर भी यदि दण्ड हो तब तो जिसके पास थी उसे भी दण्ड मिलना चाहिये । “यदन्यद् ब्राह्मणस्य वित्तात् सभूमि सपुरुषं प्राची दिग्घोतुर्दक्षिणा ब्रह्मणः प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्- गातुः ।” (शत०ब्रा० १३।७।१।१३) में राजा ब्राह्मण का वित्त छोड़कर सभूमि सपुरुष राष्ट्र के मध्य से प्राची, दक्षिणा, प्रतीची और उदीची दिशाओं का होता, ब्रह्मा, अध्वर्यु एवं उद्गाता के लिए दक्षिणा के रूप में प्रदान करता है । महाराज दशरथ ने भी अश्वमेधयज्ञ में अपनी भूमि का दान किया था— “प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् ॥ उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणेषा विनिर्मिता । अश्वमेधमहायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा ॥ क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः । ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरा तां कुलवर्धनः ॥” ( वा० रा० १।१४।४३-४५) “ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकल्बिषम् । भवानेव महीं कृत्स्नामेकां रक्षितुमर्हति ॥ न भूम्याः कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने । रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप ॥