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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८१८ रामायणमीमांसा एकविंश निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति । गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः । दशकोटि सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम् ॥ ५१ ॥” यदि सारी सम्पत्ति ईश्वर की है तो इस प्रकार के दान कैसे सम्भव हो सकते ? श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था। वह श्रीमद्भागवत से प्रमाणित ही है। अतः भरत कभी भी ऐसा शास्त्रविरुद्ध सिद्धान्त स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। यह कहा जा चुका है कि श्रीवसिष्ठ ने कैकेयी के वर की दृष्टि से ही भरत को राजा होने की बात कही थी । महाराज के वैसा न करने पर उनके सत्य धर्म का नाश हो सकता था । परन्तु भरत उसे न स्वीकार करें तो इससे किसी के भी धर्म-नाश की सम्भावना नहीं । वरदान देनेवाला यदि वरदान से मुकरता है तो उसका सत्य-भङ्ग होता है। पर यदि कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध नहीं है तो वह प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता । राज्य स्वीकार कर लेने पर ही वशिष्ठजी की यह सलाह थी कि जब राम १४ वर्ष के बाद लौटकर आयें तब राम को राज्य पुनः प्रदान कर के उनकी सेवा करना । जब उन्होंने राज्य स्वीकार ही नहीं किया तो दूसरे परामर्श का प्रश्न ही नहीं उठता । यह कहना भी गलत है कि “गुरु वसिष्ठ का विचार यह था कि महाराज दशरथ से राज्य पाने के बाद तुम्हें यह अधिकार होगा कि १४ वर्ष के बाद राम को राज्य दे सको । इस तरह पिता की आज्ञा का पालन और राम को राजा बनाने की तुम्हारी आकाङ्क्षा पूरी हो जायगी । किन्तु श्रीभरत की दृष्टि में यह धृष्टता की पराकाष्ठा थी । वे स्वयं राज्य के स्वामी बनकर भगवान् राम को राज्य दान करने की चेष्टा करे क्यों ?” पर यह ठीक नहीं क्योंकि यह तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि किसी तरह भी प्राप्त निज वस्तु को भगवान् के अर्पण करके भगवान् को ही उसका स्वामी बना दे । इसमें किञ्चिन्मात्र भी धृष्टता का प्रश्न ही नहीं उठता है । भगवान् गीता में कहते हैं— “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्करिष्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥” ( गीता ९।२७ ) “कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥” (भाग० ११।२।३६) आप भी मानते हैं । सब सम्पत्ति भगवान् की ही है । यदि भगवान् को उसका अर्पण करना धृष्टता है तो भगवद्वचन की क्या गति होगी । अपनी सब वस्तुओं को राम की बना देना ही रामराज्य है। “त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।” यह भी कहना गलत है कि “चित्रकूट की यात्रा का तात्पर्य था भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी है ।”