रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 896, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यायै रामचरितसम्बन्धी लेख ८१९ भगवान् राम वैसी धर्मविरुद्ध बात कभी स्वीकार कर ही नहीं सकते थे । उन्होंने स्पष्ट ही चौदह वर्ष तक राज्य के स्वामित्व को स्वीकार करने से इनकार ही किया था । जब भरत की दृष्टि से राम सकल विश्व के ही वास्तविक स्वामी थे तो अयोध्या के भी स्वामी थे ही । फिर उन्हें अयोध्या का स्वामी बनने के लिए आग्रह करना क्या धृष्टता की पराकाष्ठा नहीं थी । यह भी कहना गलत हैं कि “प्रभु से पादुका प्राप्त करने के पश्चात् वे प्रसन्न हो गये । उन्होंने उसका अर्थ यही लिया कि पादुका तो पद के लिए ही दी जाती है । प्रभु ने पादुका देकर अयोध्या का राज्यपद स्वीकार कर लिया । इसी लिए भरत ने पादुकाओं को अयोध्या में ले जाकर सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया और उसके पश्चात् एक सेवक के रूप में वे राज्यसञ्चालन करते रहे ।” भरत जैसे निष्छल निष्कपट पुरुष में ऐसे छल की कल्पना करना ही धृष्टता की परा काष्ठा है । आज किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु के न लेने का दृढ़ निश्चय कर रखा हो उसे स्पष्टरूप से बिना बताये छल से उसको उसका प्रतिग्राही मान लेना छल भी है और धृष्टता भी है । यह भी कहना गलत है कि “गुरु वसिष्ठ स्मृतिमूलक धर्म के व्याख्याता थे । वहीं दूसरी ओर श्रीभरत प्रेमपरक धर्म के व्याख्याता थे । उनकी दृष्टि में जब तक जीव स्वयं दैन्यग्रस्त है तब तक उनसे यह आशा करना कि वह समाज में सुख और शान्ति का प्रसार करेगा मृगतृष्णामात्र है ।” वस्तुतः स्मृति कोई स्वतन्त्र प्रमाण ही नहीं है । वह तो श्रुतिमूलक ही है । इसी लिए किसी भी स्मृति- वचन का प्रामाण्य ‘इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वात्, मनुस्मृतिवत्’ इस प्रकार श्रुतिमूलकता के आधार पर ही स्मृति प्रमाण होती है । जो स्मृति श्रुति से विरुद्ध होती है वह प्रमाण नहीं होती । स्मृति श्रुति के अनुगुण होने पर ही प्रमाण होती है । प्रेमपरक धर्म भी कोई स्वतन्त्र धर्म नहीं है । धर्म तो एकमात्र वेदशास्त्रमूलक ही है वही धर्म भगवच्चरण- पङ्कजसमर्पणबुद्धि से अनुष्ठीयमान होकर प्रेमपरक हो जाता है । फिर कथावाचकजी के अनुसार वेश्यापरक प्रेम भी धर्म हो जायगा । यह कहना अत्यन्त असंगत है कि “जिसमें वासना और स्वार्थ होगा वह लाखों उपदेश करने पर भी अवश्य अधर्म करेगा । जिसमें स्वार्थ और वासना का अभाव है उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्मपालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्लोंकि शास्त्र तो साधक के लिए होते हैं सिद्धों के लिए नहीं; क्योंकि सिद्ध तो कृतार्थ ही होता है । जिसने नाव का सहारा लेकर नदी पार कर ली उसके लिए फिर नाव का आश्रयण आवश्यक नहीं है ।” ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से ही मूलाज्ञान की निवृत्ति और वासनाक्षय होता है । जिसने अहन्ता को बाधित कर दिया उसमें अहन्तामूलक स्वार्थ भी नहीं होते । भरत आदि तो भगवान् के ही स्वरूप हैं । उनका धर्मानुसरण तो उसी तरह लोकसंग्रहार्थ है जैसे श्रीराम का । किन्तु सामान्यतया मनुष्य वासना और स्वार्थ से रहित नहीं होते हैं । उन्हीं के उद्धार के लिए शास्त्रों का प्रयास होता है । श्रीमद्भागवत में एकादशस्कन्ध में श्रीभगवान् ने कहा है कि जैसे माता कटु गिलोय पिलाने के लिए बालक को मोदक का प्रलोभन देती है । बालक मोदक पाने के लोभ से गिलोय पी लेता है । माता मोदक देती है । बालक समझता है कि गिलोय पीने का फल मोदक-प्राप्ति है । परन्तु माता समझती है उसका फल है रोगनिवृत्ति । ठीक इसी तरह स्वर्ग, पशु, पुत्र, धनादि का प्रलोभन देकर श्रुति जीव को विविध धर्मों के अनुष्ठान में लगाती है । जीव को उनके अनुष्ठानों से विविध फल भी मिलते हैं और जीव उन्हें उन कर्मों का वही फल समझता है । परन्तु श्रुति तो स्वाभाविक पाशविक काम-कर्म और ज्ञान की निवृत्ति के लिए ही वैदिक काम, कर्म