भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 897

८२० रामायणमीमांसा एकविंश और ज्ञान की ओर उसे प्रवृत्त करती है। जैसे काँटों से काँटा निकलता है वैसे ही वैदिक काम, कर्म और ज्ञान से ही पाशविक काम, कर्म और ज्ञान की निवृत्ति होती है। “वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः ॥” (भाग० ११।३।४६) प्राणी वेदोक्त कर्मों को भगवदाराधनबुद्धि से निःसंग होकर करता हुआ सर्वकर्मनिवृत्तिमूलक ब्रह्मात्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है। विविध फलों की श्रुति तो केवल कर्मों में रुचि उत्पन्न करने के लिए ही है। उधर प्रवृत्ति करने के लिए अर्थवादों के द्वारा उन कर्मों की प्रशंसा और महत्त्व का वर्णन किया जाता है। उनके प्रभाव से और फल के लोभ से प्राणियों की कर्मों में प्रवृत्ति होती ही है। विविध लाभों के लिए ही तो प्राणी लौकिक कठिन से कठिन कर्मों में प्रवृत्त होता ही है। विविध कठिन भाषाओं, कठिन साइन्स आदि की शिक्षाओं में प्राणी प्रवृत्त होता ही है। कर्मों में लगने से आलस्य, प्रमाद एवं निरर्थक चेष्टाओं से विरति होती ही है। ब्राह्ममुहूर्त में उठने से प्रातःकालिक भगवत्स्मरण, स्नान, सन्ध्या, जप, अग्निहोत्रादि का नियम पालन करने से दो घण्टे दिन तक सोते रहने, उठते ही चाय पीने, गप-शप लड़ाने आदि की आदतें छूटती हैं। यही वेद कहता है- "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” प्राणी अविद्या (वैदिक काम, कर्म और ज्ञान) के द्वारा मृत्यु (पाशविक काम, कर्म और ज्ञान) का अतिक्रमण करके विद्या (उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त होता है। यद्यपि सभी ज्ञानवान् प्राणी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार काम करते हैं। उसमें किसी का कोई वश नहीं चलता है— “सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ (गीता ३।३३) परन्तु इस स्थिति में विधि-निषेधात्मक शास्त्र व्यर्थ होते हैं। जब सब अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही काम करेंगे तब फिर कोई किस प्रकार दुष्कर्म से बचकर स्वधर्म में प्रवृत्त हो सकेगा। फिर तो पापप्रकृतिवाला पुरुष अपनी प्रकृति के अनुसार पाप करेगा ही फिर उसकी निवृत्ति कैसे होगी ? इस तरह पुरुष के पुरुषार्थ के लिए कोई अवकाश ही नहीं रह जाता है। वासना और स्वार्थ के वशीभूत प्राणी पाप करेगा ही। तब परमेश्वर वेदादि शास्त्र पुरुषार्थ के लिए क्यों आविर्भूत करते हैं। इन्हीं सब शङ्काओं का उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं— “इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥” (गीता ३।३४) इन्द्रिय के इन्द्रियार्थ में राग-द्वेष व्यवस्थित होते हैं। उनके वश में न होना ही पुरुषार्थ का मूल है। मृत्तिका घट के निर्माण का हेतु है तथापि जल उसका सहकारी कारण है। जैसे जलरूप सहकारी कारण के विघटन से मृत्तिका घट नहीं बना सकती है, उसी तरह राग-द्वेषरूप सहकारी कारणों के बिना प्रकृति भी स्वानुरूप कर्मों में प्राणी को नहीं प्रवृत्त कर सकती है। अतएव हिंसाप्रकृतिवाला सिंह भी अपने बच्चे की हिंसा में नहीं प्रवृत्त होता है, क्योंकि द्वेषरूप सहकारी कारण वहाँ नहीं है। चोरी की प्रकृतिवाला चोर भी उसी वस्तु को चुराता है जिसमें उसका राग होता है। जिन हीरा आदि बहुमूल्य रत्नों को वह नहीं पहचानता है, जिनमें राग नहीं है, उन्हें नहीं चुराता। रागास्पद सुवर्ण, रजतादि को चुराता है। तस्मात् सत्पुरुषों के समागम और सच्छास्त्रों का अभ्यास करके स्वाभाविक राग-द्वेषों को मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाया जा सकता है और पुरुषार्थ को अवकाश मिल सकता है। भगवत्कृपा तो सर्वत्र सर्वोपरि है