भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 898

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२१ हो। फिर भी भगवान् सर्वत्र समान हैं। उनका किसी से द्वेष या राग नहीं है। किन्तु जो उन्हें भजते हैं। उन्हें भगवान् अनुगृहीत करते हैं— "यद्यपि सम नहि राग न रोषू। गहहिं न पाप पुन्य गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा०मा० २।२१७।२,३) यद्यपि सामान्यतया प्राणी अपने प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही उन-उन वातावरणों में उन-उन माता, पिता आदि से जन्म लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा संस्कारों के अनुसार प्रवृत्त होता है। वैदिक आस्तिक सनातनी वातावरण में उत्पन्न प्राणी की वैसे माता-पिता और बन्धुओं के सङ्ग तथा शिक्षा संस्कारों से वैदिक शिक्षा, दीक्षा एवं संस्कारों के अनुसार वैदिक कर्मों में प्रवृत्ति होती है। तथापि जहाँ वैसी स्थिति में विकार आ जाता है वहाँ भी प्राणी जब निष्पक्ष हृदय से अपने हित तथा अहित का विचार करता है और सत्पुरुषों के समागम और शास्त्राभ्यास का महत्त्व समझता है तभी से प्रकृति से छुटकारा पाकर अभीष्ट पुरुषार्थ सम्पादनार्थ शास्त्रीय राग-द्वेष उत्पन्न करके पाशविक राग-द्वेष को मिटाकर अधर्म से बचने और कर्मानुष्ठान करने में प्रवृत्त होता है। उससे बुद्धि शुद्ध होने पर और सूक्ष्म विचार उत्पन्न होने पर कामनाओं से रहित भगवदाराधनबुद्धि से कर्मों का आचरण करता है। निष्काम कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान् की भक्ति से बुद्धि और भी पवित्र हो जाती है। तब श्रवण, मनन, निदिध्यासन, भगवद्भक्ति, तत्त्वज्ञान और शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। तभी समूल वासना एवं स्वार्थ का विनाश होता है। परन्तु उसके पहले भी शास्त्रों का उपदेश कारगर होता ही है। राम ने कैकेयी और महाराज के सम्मुख कहा था, तत्रभवान् परम पूज्य पिताश्री के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है, प्राणों का भी परित्याग कर के वह सब करने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ। पिताश्री की शुश्रूषा और उनकी वचनक्रिया, आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं। माँ कैकेयी से भगवान् ने कहा था, अत्रभवान् पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं विजन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ। माँ, यदि आप मेरे गुणों में विश्वास रखतीं तो इसके लिए राजा से कहने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो आपकी आज्ञा से ही सब कुछ कर सकता था। हे देवि, मैं अर्थपरायण होकर लोक में नहीं रहना चाहता। मैं ऋषियों के तुल्य विमल धर्म का आश्रयण कर के स्थित हूँ, ऐसा समझकर आप आश्वस्त हों— "यत्तत्रभवतः किञ्चिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया। प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ नह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् । यथा पितरि शुश्रूषा तस्य च वचनक्रिया ॥ अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् । वने यास्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ न नूनं मयि कैकेयि किञ्चिदाशंससे गुणान् । यद्राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥" (वा० रा० २।१९।२१-२४) "नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे । विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥" ( वा० रा० २।१९।२० ) "पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः । अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥